हर रोज की तरह उस दिन भी लौट रहा था सूरज अपने घर को।
इस कदर वो संध्या भी डूबी जा रही थी गाड़ियों की उड़ती धुल में।
ना जाने ठंडी हवाएँ भी थी क्यों खुश इतनी उस दिन?

कोई उत्तर की ओर, तो कोई दक्षिण, कोई पूरव तो कोई पश्चिम।
कोई थी किसी की माँ तो कोई अर्धांगनी।
था कोई किसी का भाई तो थी कोई किसी की बहन।
सोहर भी थे वहां और पिता भी।

याद है खुदा तुझे, थे ना मासूम बच्चे भी वहां?
कोई था कोख में तो था कोई माँ की गोद में।

लौट तो…


थी आँखों में नमी तुम्हारे।

जुल्फ़े भी कहा कुछ कह रही थी मुरझाये फूल की तरह।

रुंह भी ज़िन्दा हो गई थी मिली जब तुम्हारी रुंह से।

उस सर्द शाम में बदन भी राजी कहां था थरराने को तुम्हारा।

तरस जाता था उस वक़्त जब पलकें तुम्हारी झपका करती थी।

जहन मेरा ना जाने क्या कह रहा था समाई जब तुम बाँहों में।

हो गया था मजबूर, सहने को तेरे हिस्से की , ठंड, बदन तेरा ढककर।


O dream, what gave you birth?
- E soul, a human hope of seeing heaven on earth.

O dream, why do you overwhelm my mind?
- E soul, I extend a helping hand to mankind.

O dream, what do you pray for in eternity?
- E soul, mankind’s peace and prosperity.

O dream, why do we walk hand in hand?
- E soul, together we can help humans conquer the land.

O dream, why do you dazzle like sapphire?
- E soul, to empower humans to build and rule an empire.

O dream, how you help human life?
- E soul…

Raj Suthar

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