वो भी क्या शाम थी।

थी आँखों में नमी तुम्हारे।

जुल्फ़े भी कहा कुछ कह रही थी मुरझाये फूल की तरह।

रुंह भी ज़िन्दा हो गई थी मिली जब तुम्हारी रुंह से।

उस सर्द शाम में बदन भी राजी कहां था थरराने को तुम्हारा।

तरस जाता था उस वक़्त जब पलकें तुम्हारी झपका करती थी।

जहन मेरा ना जाने क्या कह रहा था समाई जब तुम बाँहों में।

हो गया था मजबूर, सहने को तेरे हिस्से की , ठंड, बदन तेरा ढककर।