पर मेरा रेप तो नहीं हुआ ना!

Kanchan Avchare
Jan 18, 2017 · 4 min read

कल मेरी माँ ने मुझे सुबह-सुबह नींद से उठा दिया, और शुरू कर दिये रोज़ के अपने घिसे पिटे सवाल;

“कल रात इतनी देर क्यों हो गई घर आने में?”

“कौन कौन गया था साथ में?”

“तुमने छोटे कपड़े तो नहीं पहने थे?”

“फोन क्यों नहीं किया घर आकर, चिंता होती है तुम्हारी!”

मैं उन लड़कियों का प्रतिनिधित्व करती हूँ जो अपने मध्यमवर्गीय परिवार से दूर बड़े शहर में, अकेले रह रही हैं.

ख़ैर, कल ही तो सुबह माँ से बात करके जब अपना फोन चेक किया तो तीन जगह हुए रेप के बारे में पता चला.

मुम्बई में चार साल की बच्ची का गैंग रेप!

दिल्ली में एक दर्ज़ी ने लगातार 12 साल तक बच्चियों का यौन उत्पीड़न किया!

बिहार में एक स्कूल प्रिंसिपल ने बच्ची का रेप किया!

ये सब मैंने एक ही दिन में पढ़ा, और अचानक माँ की याद आ गयी और उनकी बातें भी. सारे सवाल जो वो कर रही थीं, गलत नहीं थे. उन्होंने भी वो न्यूज़ ज़रूर देखी होगी, और जैसे मुझे वो याद आईं वैसे उन्हें मैं याद आई होऊँगी !

वो एक छोटे शहर में पली बढ़ी मध्यमवर्गीय परिवार की स्त्री हैं जिन्हें बचपन से हिदायतें मिली है — बोलने की, हँसने की, चलने की, पहनने-ओढ़ने की, और अपनी हदों को हमेशा याद रखने की.. वो यह सब मुझसे नहीं चाहती पर वो

ये ज़रूर चाहती है कि मेरा रेप न हो जाये कहीं!

इसलिए इस जद्दोज़हद में लगी रहती हैं कि मेरी आज़ादी (आज़ादी के मायने यहाँ है:वो शब्द जो आजकल इस्तेमाल किया जाता है उन लड़कियों के लिए जो वैसे ही जीती है जैसे कोई लड़का जीता हो! जो चाहे पहनना, कहना, खाना, पीना, घूमना, वग़ैरह-वग़ैरह - वैसे ऐसी लड़कियों के लिए समाज ने कुछ बहुत अच्छे नाम दे रखें है जो हम सब जानते हैं और इस्तेमाल भी करते हैं बड़े चाव से!) छीनते हुए भी मेरा रेप होने से बचाया जाए!

यह कहना मुश्किल है कि मेरा रेप मेरे छोटे शहर में होना आसान था या इस बड़े शहर में जहाँ मैं अब रहती हूँ.

बचपन में इतनी सतर्क नहीं थी न ही वाकिफ़ कि रेप होता क्या है. हाँ, कभी कोई अंकल यहाँ-वहाँ छू लेते थे तब अजीब ज़रूर लगता था, घंटों बाथरूम में बैठ कर रगड़-रगड़ कर नहाती थी. वैसा ही लगता है क्या रेप होने के बाद? ये सब माँ को नहीं पता चलता था और अगर चलता भी तो क्या होता! उन अंकल को थोड़े ही बोलतीं वो कुछ, कैसे बोलतीं ? बदनामी तो मेरी ही होती, घर की इज़्ज़त भी जाती क्या फायदा होता? फिर रेप से तो बच गयी ना!

बड़े होते-होते कुछ समझ आने लगा. भीड़ में, मेले में, किसी के छू लेने के बाद, खुद से घिन आती थोड़े दिन. पर चुप ही रहना होता था, पता नहीं क्यों, लगा कि चुप ही रहना चाहिये। माँ ने कभी नहीं कहा चुप रहने को, मैं खुद ही सीख गई और फिर, ये सब आम लगने लगा. अब रेप की न्यूज़ पर गौर करने लगी- मौसम की जानकारी की तरह ही टीवी पर आती थीं ये खबरें। कुछ वाकये हुए मेरे साथ, जिसके बाद मुझे गुस्सा आने लगा रेप की न्यूज़ पर.

पर मेरा रेप तो नहीं हुआ ना!

इस बड़े शहर में जहाँ मैं रहती हूँ, 2012 में आयी थी, ट्रेनिंग के लिये पहले गुवाहाटी गयी थी 26 जून 2012, और संजोग तो देखो मेरे ऑफिस के रोड पर ही 9 जुलाई 2012 को एक बार बाहर नाबालिग लड़की के कपड़े फाड़े गए ,उसे पीटा गया.

फिर मैं मुम्बई आ गयी, उसी साल 16 दिसंबर को निर्भया गैंगरेप हुआ. इस बार मैंने भी अपना गुस्सा दिखाया एक नुक्कड़ नाटक करके। लोग सामने आए , बहुत बातें हुईं।

अच्छा है, पर ये सब दिखावा ही था, क्योंकि इतने साल बाद भी न हम बदले, न रेप करने वाले, न रेप की संख्या। पर इन सबके बीच मेरा रेप नहीं हुआ ना!

कल भी सुबह न्यूज़ देखकर खूब गुस्सा आया, जैसे कुछ अंदर सूख गया. बच्चियों का रेप? इसका क्या मतलब है? औरतें और लड़कियाँ सुरक्षित है, क्योंकि अब तो बच्चियों का रेप हो रहा है, जिन्हें अपनी लड़की होने का एहसास भी ठीक से नहीं हुआ है.

पर मैं खुश हूँ कि मेरा रेप नहीं हुआ ना!

शायद एक दिन हो भी जाये ,पर तब की तब देखेंगे।

वैसे भी अब सबका रेप हो रहा है, नये -नये तरीकों से ,आँखों से, बातों से, एसिड से, शादी से , प्यार से, सेक्स से, दोस्ती से, हमदर्दी से, मेरा भी हुआ ही होगा किसी तरह से मैंने ही अंदर छुपा लिया होगा , लेकिन हमारे यहाँ रेप का मतलब होता है ‘इंटरकोर्स ‘ और इसलिए मैं हूँ ‘रेप वर्जिन ‘.

और तब तक मैं खुश रह सकती हूँ क्योंकि अभी मेरा रेप नहीं हुआ :) #feelingblessed #Iamlucky #RapeVirgin

Written by

A microscopic traveller in the vast universe.

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