पित्रसत्ता से परे, मै उड़ चली !

Mamta Vishwakarma, Amlokhi Gram Panchayat, Samaguri Block, Nagaon District Assam

“मुझे लेकर सात लोग थें मेरे घर में, चार भाई और एक मै और माँ बाप| मुझे कॉमर्स पड़ने का मन था,वैसे मै उतनी अच्छी नहीं थी पढने में, लेकिन धीरे धीरे सीख ही लेती थी| सीखने से फायदा यह होता था कि अपने सहेलियों को कुछ थोडा बहुत मै बता पाती थी, जो मुझे अच्छा लगता था| वैसे तो मै अपने भाइयों से ज्यादा काम करती थी, वो जल्दी थक कर खाने बैठ जाते थे, और मै ही उन्हें खाना परोसती थी अक्सर मेरे हिस्से में भात ही आता था सारा तो ये लोग ही ख़तम कर देते थे| 15 साल की उम्र तक मैंने अपने भाइयों और पिता को माँ और बेटे का सुख दिया था लेकिन जब उन्हें ऐसा लगा कि मै शादी लायक हो गयी हूँ तो मुझे मुझसे 17 साल बड़े मर्द के साथ बाँध दिया मुझसे शादी से कोई परेशानी नहीं थी, मुझे यह मालूम था कि मैं आठ दिनों बाद वापस आ जाऊंगी, फिर मै हायरसेकण्ड्री की पढाई करूंगी, लेकिन शादी के बाद मेरे ससुराल वालों ने मुझे पढ़ाने से मना कर दिया, मै अक्सर रातों को पति से पुछा करती कि अरे कब एडमिशन करा रहे हैं मेरा आप! वो बोलते थे की करा दूंगा, और हम सो जाते थे| एक दिन मेरा मन नहीं माना और मैंने अपने ससुर जी से अपने एडमिशन के बारे में पुछा, तो उन्होंने ने यह बोलते हुए दुत्कार दिया कि मुझसे शादी करके उन्होंने गलती कर दी , मेरे घर वालों ने कुछ दिया ही नहीं और मै काम करूंगी या पढाई | इसके साथ ही मेरा पढाई का सपना टूट गया, खैर तब तक मै प्रेग्नेंट हो गयी थी| मुझे लगा कि चलो बच्चे के साथ मेरा जीवन गुजर जाएगा, लेकिन भगवान् को वो भी पसंद नहीं आया, मेरा पहला बेटा गुजर गया, सास ससुर लोग मुझे हॉस्पिटल तक भी नहीं ले गए|

छ: महीने बाद एक गावं के एक व्यक्ति ने (लखी नाथ कालिंदी) मुझे बताया की मुझे एक गुट (SHG) बनाना चाहिए, क्योंकि मैं पढ़ी लिखी हूँ और इससे बहुत फायदा होगा| मैं ग्राम पंचायत के मुखिया से मिली, उन्होंने ने मेरी अच्छी खासी मदद की, जो औरत घर के चार दिवारी में घूंघट के आड़ में रहा करती थी, वो घर से बाहर निकली| मैंने अपने सास को बताया कि मैं गुट खोलना चाहती हूँ और इसकी वजह से कुछ पैसे मिलेंगे, सास ने हामी भर दी, पति और ससुर ने भी बोला अगर कुछ पैसे मिलेंगे तो गुट खोलने में कोई बुराई नहीं हैं |

मेरे घर से बाहर निकलने की बात हमारे बिहारी समाज को खटकने लगी, लोगों ने कहा, की बिहारी बहु हो के बाहर निकल रही है, चल रही हैं, कैसी है ये! इस ने हमारी इज्जत दाव पर लगा दी हैं | मेरे समाज को, मेरा घर से बाहर जा कर कुछ करना, मेरे चरित्रहीन होंने का सबूत रहा हैं| मेरे घर वालों ने मुझे पीटा, कमरे में बंद किया, मेरे समाज के लोगों ने मेरे साथ जाने वाले और मुझसे बात करने वालों पर 501 रूपये के फाइन का भी प्रावधान किया, लेकिन मै डरी नहीं, मै ब्लाक प्रमुख से भी मिली, उन्होंने ने मुझे ग्राम पंचायत प्रेसिडेंट और वार्ड प्रमुख का टिकट भी देने की बात करी| खैर टिकट तो नहीं मिला लेकिन, कुछ अच्छा करने का प्रयास जारी रहा| मेरा मेरे ससुर का घर छोड़े लगभग तीन साल हो गए, मै किराये के मकान में रहती हूँ, मेरी एक सात साल की बेटी है, वो पढने में बहुत अच्छी है, नाचती भी अच्छा है, और तो और पेंटिंग प्रतियोगिता में दिल्ली भी गयी थी| वो ही एक है जो मुझे काम करने और जीने के लिए एक उर्जा देती है|

मेरा बिहारी समाज मेरे चत्रिहीन होने का प्रमाण अक्सर देता रहा हैं, खैर अब तो पिछले कुछ सालों से यह कम हो गया है क्यों कि उनकी बहु बेटियां मेरा जिक्र अक्सर करती हैं कुछ तो मेरे साथ गुट में हैं |

खैर कोई बात नहीं अगर ये लोग मुझे चरित्रहीन कहते हों, इनका सुनते सुनते मेरे २५ साल बर्बाद हो गये| मेरे ससुराल वालों ने तो मुझसे केवल काम कराने के लिए शादी की थी, अगर वो पढाई का झूठा दिलासा भी दे देते तो भी मुझे अच्छा लगा होता | लेकिन कोई बात नहीं अब तो लड़ते लड़ते सब सही हो गया हैं, मै और वो दोनो धीठ हो गये हैं| मै अपने उन्नति को लेकर तो वो मेरी |”

शायद जो सपने मैंने देखे थे, वो तो नहीं पूरे कर पाऊँगी, लेकिन उन सपनों को लेकर मै आगे ज़रूर बढ़ी हूँ, मै कहाँ एक छोटे से बंद कमरे की चार दीवारी में चौका-बर्तन करती थी, और आज लोगों के लिए शौचालय बनवा रहीं हूँ| मुझे सरकारी नौकरी करने का मन रहा हैं, लेकिन अभी तक नहीं मिली हैं, मेरी एक 10 साल की बेटी हैं, टैलेंटेड हैं, अच्छी चित्रकार हैं, दिल्ली भी गयी थी एक प्रतियोगीता में भाग लेने के लिए| मै अब अपना पूरा समय उस पर ही बिताती हूँ| मै चाहती हूँ कि वो कुछ अच्छा करे, वो आगे बढ़े| वैसे समस्याएं तो लगी रहती हैं, लेकिन हिम्मत नहीं हारना है |”

— (By Adarsh Kumar: Student at Indian Institute of Technology, Guwahati)