शुक्रिया

आज भी नहीं भूली वह दिन,

जब छोड़कर मुझे कालेज,

कर गए थे अलविदा।

एक कदम बढ़ाकर जो पलटी,

तो हुआ एक एहसास,

एहसास की यही थी अब सच्चाई,

यही था किस्मत का खेल,

इतिहास दुहरा रहा था फिर एक बार,

दिशाएँ वही थी; समय अलग था।

बचपन में जब गए थे आप बॉम्बे,

तो महसूस किया था कुछ अलग,

आज एक बार फिर वह पल याद आया,

फिर से अन्दर ही अन्दर ये दिल घबराया,

कि क्यूँ होना पड़ता है अपनों से अलग?

फिर से मन में सुनी आपकी पुकार,

फिर से सुनी आपकी डाँट,

फिर से देखा आपको हँसते,

फिर से सुनी आपकी रेडियो की आवाज़,

फिर से सुना रात को गज़ल,

फिर से देखा आपको आँगन में टहलते,

फिर से रोकी आपने गाड़ी,

फिर से खेला मैंने ढेलियों से,

फिर से जी लिए मैंने कुछ अनमोल लम्हे।

कभी कभी,

हो जाती है मुझसे कुछ गलतियाँ,

रह जाती है मुझसे कमियाँ,

जानती हूँ की जुड़ी हैं मुझसे कितनी आशाएँ,

इसलिए गलतीं सुधारने का हमेशा करती हूँ प्रयास।

बचपन से आज तक,

सिखाया है आपने बहुत कुछ,

आज, जब रहती हूँ अकेले,

तो याद आतीं हैं आपकी बातें,

आता है अब समझ,

की जिन्दगी नहीं आसान,

और माता-पिता ही है सहारा,

क्योंकि इस अठारह वर्षीय मनुष्य में,

आज भी छुपा है एक हसीन बचपन।

शुक्रिया।

- स्मृति झा