जाग मुसाफिर जाग

संवाद का अभाव है या संवाद पर विवाद है|

अखंडता पर प्रश्न उठें, ये कैसा राष्ट्रवाद है!

सरहदों पर खून बहाता, सैनिक लहूलुहान है!

कफ़न पर राजनीति करे, ये कैसा हिन्दुस्तान है|

कोई जाट है, कोई दलित है तो कोई यहाँ मुसलमान है|

नफरतों का खेल खेलते पत्रकारिता संस्थान हैं|

आलोचना की भर्त्सना पर मचा यहाँ संग्राम है!

लोकतंत्र के मंदिर में क्यों छाया घमासान है|

मौत आएगी हरा देंगे उसे , समझो हमे कमजोर नहीं|

चंद नारों से बिखर जाये ये वो देश नहीं|

खून की स्याही से लिख देंगे, इश्क़ की बोलियां|

मत चलाओ मौका परस्तो नफरतों की गोलियां|

है तिरंगा स्वाभिमान तो ये कभी भूलो नहीं|

हरे को केसरिया से कर जुदा फूलो नहीं|

मन आहत है ये सोच के, हाय भाग हमारे क्या खोटे हैं?

हम बड़े बहुत बाहर, लेकिन भीतर छोटे के छोटे हैं|

छोड़ दो पीटना परंपरा को अंधी लाठी से, शब्दों से नहीं जीते जाते युद्ध हल्दी घाटी के|

है अभी भी वक़्त जो जीवित है संभाल लो, इश्क़ के तुम तीर चुन लो, त्याग नफरत के भाल दो|

सत्य और असत्य में संघर्ष को चलने दो, आग लगी है तो सुखी टहनियों को जलने दो|

फर्क इतना है समझ में संघर्ष ये बाहरी नहीं, जो खुद को बेहतर करे वो अंतरध्वंद चलने दो|

है धरम की कोई मंजिल नहीं , धरम तो जीवन भर चलने में है|

फैला कर पथ पर इश्क़ की ज्योति, दीपक सामान जलने में है!!