धर्म और इंसान

इस दुनिया में हर रोज़ हज़ारों बच्चे मरते हैं, और ना जाने कितनी ही अनगिनत औरतें मरती हैं;

और इनके साथ एक मरती है एक पीढ़ी , एक इतिहास , एक साम्राज्य , एक सभ्यता|

क़त्ल चलते रहते हैं और उनके साथ मुक़दमे भी दर्ज़ हो जाते हैं।

कोई कहता है आदमी गुनहगार है तो कोई उसकी मजबूरी की दुहाई देता है; पर सजा किसे मिलती है, उस बच्चे को, उस औरत को, जो अब एक लाश है।

इतिहासकार कहते हैं की राज धर्म सब धर्मों से बड़ा है, फिर क्यों रोमन एम्पायर से लेकर मुग़ल तक और मुग़ल से लेकर ब्रिटिश तक मौत हुई तो सिर्फ धर्म की, जंग हुई तो सिर्फ धर्म की।

और हर जंग के बाद जब लाशें गिनी गईं तो लोगों को मिली उसी बच्चे और औरत की लाश।

शर्म आती है ऐसे इंसान पे और उसे बनाने वाले भगवान् पर।

इन्हे कौन बचाएगा, ख़ुदा बचाएगा या भगवान बचाएगा|

अरे ख़ुदा तो कब का ख़ुदा को प्यारा हो गया और भगवान् भी शायद किसी शमशान की राख बन चूका होगा|

ये इंसान की लड़ाई है, कोई इंसान का बच्चा ही बचाएगा।