अनकही
Aug 8, 2017 · 1 min read

सन्नाटा छलकाती दीवारों के बीच
हम ऐसे अंधेरे में बैठे हैं,
जैसे मातम हो किसी जनाजे का
हम जिंदा शैया पर लेटे हैं।
अनकही बातों का जुलूस है आज,
अपने हालातों का नासूर है पास,
मुसलसल रोकते रहे जिन जज्बातों को,
आज फूटते लावे सा हो रहा आगाज।
मेरे वक्त से मेरा वक्त चुरा कर
किसी वक्त तू बेवक्त हो गया,
ना जाने कब मेरा यह चंचल पन
खामोश मिजाजी में बदल कर रह गया।
आज तक थामें रहे जिन यादों के दामन को
आज उनकी आहट भी अजीयत दे रही है,
इन आंखों से छलकती हर एक बूंद
मुझे दुबारा जीने की नसीहत दे रही है।
न जाने क्यों, किस लिए,
किस अास में बैठे हैं
जैसे मातम हो किसी जनाजे का
हम जिंदा शैया पर लेटे हैं।
~naagin 🐍❤️
