ट्रेन वाली दीवाली

9 :00 pm

छाया मत छूना मन

होता है दुख दूना मन….

ट्रेन एक और घंटा लेट हो चुकी है। मतलब करीब करीब आधी रात हो ही जाएगी घर पहुँचते पहुँचते। दिवाली की रात। कितने शौक से वो सजावट वाली लाइट ली थी, चांदनी चौक की मार्किट से। और फिर खद्दर का कुरता भी लिया था सीपी से। सब गुड़ गोबर :( । बड़ी बेध्यानी में रहता हूँ आज-कल। अब भला हर दिन लोग थोड़े ही न अजमेर-सियालदह की जगह सियालदह-अजमेर में चढ़ पड़ते हैं। करीब करीब 10 घंटे अधिक “सफर” कर रहा हूँ। डाटा पैक खत्म हो गया। फ़ोन की बैटरी भी खत्म होने के कगार पे है। पावर बैंक तो पहले ही जवाब दे चुका है। रह रह कर ध्यान दो बातों पर अटक रहा है — किस बात की सज़ा भुगत रहा हूँ और नायिका ने क्यों याद दिलाई उस गाने की। थोड़ी देर पहले बाहर दरवाज़े से कई फतिंगे अंदर आ गए। अब वो ट्यूबलाइट के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं। चलो, कम से कम बैठने की जगह मिल गयी है, नीचे खिड़की के बगल में न सही, तो ऊपर सामान रखने वाले रैक पे ही सही। ज़रा सुनूं तो कि यह नीचे खड़ी जनता किन बातों पे चर्चा कर रही है।

10 :00 pm

ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ

मैं दिल को उस मुक़ाम पे लाता चला गया

मैं ज़िन्दगी का साथ…

एक और घंटा खत्म हुआ। साथ अधलेटे ये लड़के पता नहीं कैसे इतनी देर तक एकटक निहार सकते हैं, शुन्य को। मुझे तो बड़ी कोफ़्त होने लगती है थोड़ी ही देर में। कितना अच्छा होता ना, कुछ नहीं सोच पाने की क्षमता होना। ख़ैर, क़िताब पे वापस लौटते हैं। कृष्णमूर्ती की बातों के थोड़े थोड़े मायने तो समझ आ रहे हैं। और अपने जीवन से जोड़ कर देख भी पा रहा हूँ। बड़ी ज्यादती करता हूँ मैं, घर वालों के साथ।

अगर काम के सिलसिले में इस तरफ़ नहीं आना होता, तो घर का चक्कर तो नहीं लगने वाला था इस दीवाली भी। ऐसा नहीं है कि अपने घर-शहर की याद नहीं आती। अभी दो-चार दिन पहले ही सपने में पापा से जलेबी के लिए पैसों की जिद कर रहा था। बिलकुल जीवंत हो उठी थीं वो मोहल्ले की गलियां जहाँ कितनी ही बार त्योहारों के इसी सीजन में कड़कबीम खत्म हो जाने पर निकल पड़ते थे, अगली खेप खरीदने। हाँ मम्मी-पापा कम ही आया जाया करते हैं सपनों में। मतलब यही की बचपन छूट जाना खलता है, जिन्होंने बचपन दिया वो नहीं। भईया इस मामले में हम निपट स्वार्थी ठहरे, मम्मी-पापा की ख़ुशी की कतई चिंता नहीं करते। अरे मलतब गर्व नहीं कर रहे हैं। बिना लाग-लपेट के, जो जैसा है, वही बता रहे हैं। और ये देखने के लिए बहुत पाण्डित्य तो चाहिए नहीं कि जब उनके पास होता हूँ, तो अच्छा लगता है उन्हें। यह बिलकुल वैसी ही बात है, जो मैं नायिका के संदर्भ में खुद को कहता हूँ। उसके इर्द-गिर्द होना, उसके पास होने एहसास होना, उसकी एक झलक देख कर खुश हो जाया करना। शायद मम्मी-पापा भी ऐसा ही महसूस करते होंगे। लेकिन मैंने कभी पूछने की जहमत नहीं की। ये हर्गिज़ नहीं है कि बातें नहीं होती हमारी। और सिर्फ “खाना खाया”, “काम कैसा चल रहा है”, “इतनी रात को घर के बाहर क्या कर रहे हो” तक ही नहीं। मम्मी तो गाहे बेगाहे कह तो देती ही है — “नहीं पटेगी कोई लड़की तुमसे”। पापा ने भी कितना अप्रत्याशित और सहज रिएक्शन दिया था, जब शराब पीने के बारे में उन्हें बताया था — “बुरा तो लगा, लेकिन अच्छा भी लगा कि तुम स्पश्टवादी हो”। हाँ बातों के केंद्र में लगभग मैं ही होता हूँ। शायद ही कभी मैंने पुछा हो पापा से की लगन की बिक्री कैसी रही इस बार, या मम्मी से कि इन दिनों कैसा है उनका पैरों का दर्द।

लेकिन आज ये अनर्गल-नुमा वार्तालाप क्यूँ कर रहा हूँ खुद के साथ। कृष्णमूर्ति तो प्यार के बारे में बता रहे हैं कि कैसे जहाँ क्रोध, भय, उपभोग और द्वेष है, वहां प्रेम नहीं पनप सकता। लेकिन प्रेम के सन्दर्भ में मम्मी-पापा कहाँ से टपक पड़े। दरअसल वो दूसरी परिभाषा भी तो कौंध रही है जेहन, जो नायिका ने सुझाई थी। जब उसने रोमांटिक प्रेम को इस वाले स्नेह से इतर नहीं माना था। और फिर आज गाने के बोल से जैसे फ्लैशबैक में चला गया हूँ। उन दिनों गुनगुनाया करता था -

बस इक खयाल उसका

है दिल की

फितरत बदल दे

दिल देने का केह ज़रा फलसफा…..

और हकीकत ने करीब वहीँ ला कर फिर पटक दिया है। वही रूखा बर्ताव। वही “फॉर ग्रांटेड” लेना। कई बार कोफ़्त तो इतनी होती है कि….. । घर जा ही रहा हूँ, सेकंड क्लास में धक्के खाते खाते। टांगें फैला कर लेटना तो दूर, पालथी मार कर जब बैठना भी दूभर हो उठे, तो ऐसे गहन चिंतन का सही माहौल बनता है :/ । बिंदुओं को जोड़ना बहुत कठिन नहीं हुआ कि जिस बेतकल्लुफ़ी की शिकायत मुझे नायिका से है, मैं वैसा ही व्यवहार कर रहा हूँ मम्मी-पापा के साथ। सेहत के बारे में पापा की हर सलाह को दरकिनार करना। नाश्ते के बारे में मम्मी की राय को बिलकुल तवज़्ज़ो ना देना। यह स्वीकारोक्ति आदर्श सन्तान का तमगा नहीं दिलवाएगी मुझे। लेकिन ये सच से करीब करीब उतना ही निकट है, जितना शायद हुआ जा सकता है। आज जब अमुक गानों के बोलों को फिर से देखा, तो दिल मानो बल्लियों उछलने को हुआ। एक पल को ऐसा लगा, जैसे मैं उसके जीवन में पूर्णतया नगण्य नहीं हूँ। उसके जीवन में अपनी मौजूदगी का इतना भी एहसास पाना सुकून देता है। वही सुकून जिससे मैंने बहुत समय से मम्मी-पापा को महरूम रखा है। हमेशा अपने सोचने का नज़रिया, जो कई बार अधपका ही होता है, थोपा है उनपर। चाहे उनके शादी की सालगिरह पे पापा को मम्मी के लिए कविता लिखने का टास्क देना हो या फिर मम्मी का डिनर के लिए बाहर जाने से मना करने पर मुँह फुला कर बैठ जाना हो।

ऐसा नहीं है की आशा की कोई किरण नहीं है। बाकी पहलुओं की तरह यहाँ भी नायिका का नज़रिये क़ाबिले गौर है। नायिका के जीवन की कई शुरुवाती परेशानियों की जड़ उसका अपनी माँ के साथ वैचारिक मतभेद है। उसके बावजूद, नायिका हमेशा उन्हें ख़ास महसूस कराने का कोई मौका चूकती नहीं है। मैंने आख़िरी बार कब किया था ऐसा कुछ! चलो इस दीवाली बदलते हैं ढर्रे को। उनसे पूछूंगा की वो क्या चाहते हैं। उन्हें किस बात से सबसे ज्यादा ख़ुशी मिलती है। काम मुश्किल है लेकिन फिर दुष्यंत कुमार के शब्दों से हिम्मत बंधती है-

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

11:00 pm

थोड़ी ही देर में गाडी गया स्टेशन पहुँच जायेगी। इसी लिए सफ़र पसंद है मुझे। यह ठहराव कहाँ मिल पाता। बाहर की दुनिया से इतनी दूर होता ही नहीं अक्सर, कि अंदर की दुनिया में झाँक सकूं। जब काम का शोर थोड़ा कम हो, तब तो ख्याल आये इन बातों का। इतना बुरा भी नहीं था गलत ट्रेन में बैठना। पता नहीं कब यथार्थबोध होता नहीं तो। अरे ये क्या! मैं इधर डायरी बैग में डालने को घुमा तो एक आतिशबाज़ी पे नज़र पड़ी ऐन वक़्त पे। फटने के तुरंत बाद, उसकी रौशनी छितरा गयी आसमान में, और मेरे अधरों पे भी पूरी मुस्कुराहट बिखर गयी। अच्छी रहेगी यह दीवाली भी।

वो कहते हैं ना

जो होता है,

अच्छे के लिए होता है

सही कहते हैं…