•• NOMAD ••
“जैसे कमर पर मेरी…
तुम्हारा हाथ है बाक़ी अब तक?
क्या बालों में तुम्हारे…
मेरी उँगलियाँ भी बाक़ी हैं?
जैसे बाक़ी रहती है कमरे में…
ख़ुशबू चंदन की,
“रात के दो बजे नींद टूटने का…
अजीब सिलसिला चालू हुआ है,
पिछत्तर दिन हुए हैं,
कुछ न कुछ लिखना जैसे ज़रूरत हो,
ठीक वैसे ही…
सुनों!
ज़रा सी बात करनी है,
हाँ, तुमसे ही।
ज़रा सा हालचाल लेना है,
हाँ, हमेशा की तरह,
‘कैसे हो तुम? कैसा रहा दिन?’
फिर इंसान ही तो है आख़िर,
कब तक आस लगाए?
हिम्मत जुटाए?
ऐसे भी तो नहीं हो सकता की…
ख़ुद ही को गले लगाए,
ख्वाब भी हैं,
हैं ख्वाहिशें भी,
पूरी हो सारी,
दुआ करना,
रंजिश न हो,
हो परे दुनियादारी,