बस स्टैंड — दूसरी कड़ी

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बस स्टैंड — पहली कड़ी

हां तो मैं कहाँ था?

उस रोज़ मैं रोज़ की तरह बस स्टैंड पर अकेला बस का इंतज़ार कर रहा था। और तब मैंने देखा की एक अंकल बड़ी तेज़ी से मेरी तरफ़ आ रहे है और उनके पीछे पीछे एक लड़की थी जो मेरी ही क्लास में पढ़ती थी। मुझे उसका नाम तो नहीं पता था लेकिन ये ज़रूर जानता था कि वो स्कूल बस वाली दुनिया से है।

बच्चों का मन बहुत मासूम होता है। वो झट से कुछ भी कल्पना कर लेते है। अंकल मेरी तरफ़ देख कर आगे बढ़ रहे थे तो मुझे पक्का लगा की वो मुझ से ज़रूर कुछ ग़लती हुई होगी क्लास में और उस लड़की ने अपने पापा से शिकायत की है। वो मेरे पास आ कर रुके और पूछा, “बेटा, तुम वीनू की क्लास में ही पढ़ते हो ना।”

मुझे ये समझ नहीं आ रहा था की मैंने क्या ग़लती की लेकिन ये मैं मान चुका था की आज तो पिटाई पक्का होगी। एक बार तो लगा की भाग जाऊँ लेकिन डर के मारे मेरे पैर जमे के जमे रह गए ज़मीन में। ज़ुबान तो मेरी कुछ जवाब नहीं दे पायी बस हल्के से सिर हिला कर मैंने अपनी ग़लती का इकरार कर लिया। थोड़ा अम्मी को भी कोसा की क्यों बेवजह मुझे इस स्कूल में डाल दिया। सरकारी स्कूल में जा रहा होता तो आज पिटाई नहीं होती।

हालाँकि ऐसी कोई बात नहीं थी। वीनू की स्कूल बस छूट गयी थी और गाड़ी ख़राब पड़ी थी। स्कूटर मिला नहीं कोई और उस ज़माने में ऊबर और ओला होती थी नहीं। स्कूल में देर ना हो जाए तो इसीलिए उस दिन उन्हें बस का सहारा लेना पड़ा।

(वीनू एक काल्पनिक नाम है। असली नाम उस लड़की का मैं बता नहीं सकता। अगर ग़लती से उस ने या फिर उस दौर के किसी और परिचित ने ये कहानी पढ़ ली तो ना जाने क्या सोचेंगे। इसीलिए इस कहानी में मैं एक काल्पनिक नाम से उसे सम्बोधित कर रहा हूँ।)

मैं ख़ुश था की पिटाई नहीं होगी मेरी। अंकल में मुझसे बस के बारे में पूछा। कितनी देर में आएगी और कितनी देर में पहुँचा देगी। वो सब सवालों का जवाब मुझे ढंग से मालूम था। वैसे तो बहुत सारी बसे हमारे स्कूल जाती थी लेकिन उन्मे से बेस्ट कौन सी है वो सब मुझे पता था। मैंने दो तीन बसो को जाने दिया, कहा कि अगली वाली में जाएँगे। अंकल के मन में हिचक तो थी मेरी बात मानने में लेकिन उन्हें लगा की मैं रोज़ जाता हूँ तो मुझे सही पता होगा। सात दस की रूट दो सौ साठ। वो थी बेस्ट चोईस। सीट खाली होती थी और ड्राइवर अंकल चलते भी तेज़ थे।

हम स्कूल बस से पहले स्कूल पहुँच गए और रास्ते में जिन बसो को बस स्टैंड पर जाने दिया था उन्हें भी पीछे छोड़ दिया था। अंकल में मेरी तरफ़ शाबाशी भरी निग़ाहो से देखा तो काफ़ी गर्व महसूस हुआ। वीनू पूरे रास्ते चुप रही। एक शब्द नहीं बोला उसके। वैसे उसमें कुछ अजीब भी नहीं था। हम एक क्लास में थे और एक दूसरे का नाम भी हमें उस दिन पता चला। हम दोनो अलग दुनिया से थे।

वो दिन मैं कब का भूल चुका होता अगर दो दिन बाद फिर से वीनू बस स्टैंड पर नहीं आयी होती। उसकी बस फिर से छूट गयी थी। अंकल बार बार अपनी अपनी घड़ी देख रहे थे, शायद उन्हें देर हो रही थी। उन्होंने वीनू से पूछा की क्या वो मेरे साथ अकेले चली जाएगी स्कूल। और उसने हाँ बोल दी। अंकल में मुझ से पूछा की मुझे तो कोई दिक़्क़त नहीं होगी और मैंने कहा बिलकुल नहीं। उन्होंने बस की टिकट के पैसे मुझे दिए और वीनू को बाय बाय बोला और गालों पर किस करा और चले गए।

उस दिन पहली बार वीनू ने मुझसे बात करी। मैंने उस से पूछा की उसकी बस फिर से कैसे मिस हो गयी। उसने मझे बताया कि उसकी मॉम कुछ दिनो के लिए उसकी नानी के पास गयी है और सुबह उसके डैड नाश्ता बनाने में लेट हो गए। अब मुझे ये तो याद नहीं है की और क्या बातें की हमने लेकिन आधे घंटे का बस का सफ़र बातों में कब निकला पता ही नहीं चला। स्कूल पहुँच कर वो फिर से अपनी अलग दुनिया में चली गयी। लेकिन थोड़ी ही सही हमारी जान पहचान हो गयी थी।

दो-चार दिन बाद वो फिर फिर सुबह बस स्टैंड आयी। और इस बार उसकी मॉम थी साथ में। मुझे लगा की शायद उसकी बस फिर से छूट गयी है लेकिन ऐसा नहीं था। वो मुझे अपने बर्थ्डे पार्टी में बुलाने आयी थी। उसने एक कार्ड निकाला अपने बैग से और मुझे दे दिया। बोला की शाम को पक्का आना है। उसकी स्कूल बस आने वाली थी इसीलिए वो जल्दी से वापस चली गयी। आंटी ने भी बड़े प्यार से बोल की ज़रूर आना। मैंने स्कूल बस का इंतज़ार करते हुए बच्चों और उनके पेरेंट्स के बीच में कार्डस का आदान प्रदान देखा तो बहुत था लेकिन ये पहली बार था जब किसी ने मुझे भी कार्ड दिया हो। उसकी लिखाई में अपना नाम देख कर मैं तो मानो सातवें आसमान पर पहुँच गया था। उसने मुझे स्कूल में फिर से याद दिलाया की शाम को पार्टी में आना याद रखना।

चूँकि ये वाक़या उसके जन्मदिन के पास का है, इसीलिए मुझे वो जून का दिन और तारीख़ आज भी ढंग से याद है। लेकिन उस दिन मैं उसकी पार्टी में नहीं गया। जाना तो चाहता था लेकिन जा नहीं सकता था। ना तो पार्टी के लायक नए कपड़े थे और ना ही गिफ़्ट ख़रीदने के लिए पैसे। इन्विटेशन कार्ड मिल गया मैं तो उसी में ख़ुश था। केक खाने के लिए पुराने कपड़ों में खाली हाथ जाना अच्छा नहीं लगता।

पर अगले दिन उसने मुझे स्कूल में पकड़ लिया और पूछा की मैं क्यों नहीं आया। क्या जवाब देता उसे? सच तो बता नहीं सकता था तो झूठ बोल दिया कुछ। और आप अब वो झूठ सुन कर भी क्या करेंगे। लेकिन वो लड़की भी बहुत चालक थी। मेरा बहाना तो मान लिया उसने लेकिन जाते जाते बोली की, “पार्टी में नहीं आया तो कोई बात नहीं लेकिन बर्थ्डे गिफ़्ट तो देना पड़ेगा।” मैंने भी मुस्कुरा कर कह दिया, “पक्का!”

गिफ़्ट के लिए अम्मी से पैसे तो माँग नहीं सकता था और गुल्लक में पैसे जमा करने की मेरी आदत थी नहीं। बारह रुपए थे मेरे पास कुल मिला कर। बंटी को अपना क्रिकेट बैट और कॉमिक बुक्स दे कर पचास रूपे जुगाड़े। गिफ़्ट की दुकान पर गया तो कोई भी गिफ़्ट सौ-डेड सौ से कम का नहीं था। फिर अपनी बहन सरला से किसी बहाने से पैसे माँगे। उसने पैसे एक शर्त पर दिए की मैं दो महीने तक घर में क्रिकेट मैच नहीं देखूँगा। उस वक़्त सत्तर रूपे के लिए ये शर्त बहुत मामूली लगी। दो तीन दोस्तों से पाँच दस रूपे उधार और ले कर एक सो साठ रुपए का पेन्सल बॉक्स और उसके लिए गिफ़्ट वाला काग़ज़ ख़रीदा। ये सब हिसाब किताब मुझे याद है क्योंकि दिन रात दिमाग़ में पैसे जोड़ जोड़ कर देखता था कि गिफ़्ट के लिए अभी कितने कम पड़ रहे है।

ख़ुद कभी पाँच रुपए वाली डिब्बी भी नहीं रखी अपने पास लेकिन वीनू के बर्थ्डे गिफ़्ट में कोई कमी नहीं की। पर ये भी डर था का अगर मेरी अम्मी या बहन को इसका पता चल गया तो मेरी ख़ैर नहीं। लेकिन दिक़्क़त ये थी की वीनू को गिफ़्ट दूँ भी तो कैसे। हर वक़्त तो अपने दोस्तों के साथ रहती थी, उस से मैं बात करता भी तो कैसे? उसकी स्कूल बस वाली दुनिया में क़दम रखने की मेरी हिम्मत तो नहीं होती थी।

उसका पेन्सल बॉक्स मेरे बैग में स्कूल से घर और घर से स्कूल घूमता रहा। घर में अम्मी और सरला का डर की कहीं ग़लती से बैग में देख लिया उसे तो मुझे घर से निकाल देंगी और स्कूल में उन बच्चों का डर की अगर उन्हें पता चल गया की मैं उनकी दुनिया की एक लड़की को गिफ़्ट दे रहा हूँ तो वो मेरी दुर्गति कर देंगे। खामखां की परेशानी मोल ले ली थी मैंने।

जारी रहेगी…

देखिए जब मैंने ये कहानी बतानी शुरू की तो लगा था था कि चंद पंक्तियों में ख़त्म हो जाएगी। लेकिन लिखते लिखते यादें इतनी हावी हो जाती है की पता ही नहीं चलता की कब और कैसे वो कहानी में अपनी जगह बना लेती है और कहानी खामखां लम्बी हो जाती है। वो अंकल से पिटाई का डर, पैसों का हिसाब किताब, बस का रूट नम्बर और वक़्त, और भी काफ़ी सारी ग़ैर ज़रूरी बातें यादों में छुपी पड़ी थी कहीं। रोज़ रोज़ की ज़िंदगी में तो बड़े बड़े वाक़या भी मुश्किल से याद रहते है, लेकिन लिखते लिखते ये छोटी छोटी बातें भी अपने आप निकल आती है। फिर उन्हें बताए बिना भी रहा नहीं जाता। इस कहानी की ज़बरदस्ती खीचने के लिए क्षमा चाहता हूँ। उम्मीद है कि भविष्य में कम शब्दों में पूरी कहानी कहना आ जाएगा।