सिम्मी — पहली कड़ी

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Typing in Hindi is difficult. Spellcheckers don’t work and proofreading is also hard. Apologies for typos and grammatical mistakes.

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सिम्मी — पहली कड़ी
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वैसे तो मैं मास्टरस करने के लिए पिछले एक साल से अमेरिका में रह रहा था बस क्रिसमस की छुट्टियों में दो हफ़्ते के लिए घर आया था। रात को जब मैं घर पहुँचा तो माँ ने खाना पहले ही बना रखा था। एक साल बाद घर का खाना मिला था मुझे। खाना खाते खाते माँ ने सवालों की झड़ी लगा दी। सब कुछ पूछ डाला। कॉलेज वालों और अमेरिका के लोगों की पूरी जन्मकुंडली निकाल ली। उनकी सबसे ज़्यादा बड़ी चिंता थी की कहीं मैंने वहाँ छुप कर शादी तो नहीं कर ली। माँ से सवाल जवाबों के बीच मैंने उन्हें बोला — “कल कहीं जाने का प्रोग्राम तो नहीं है ना? सोच रहा हूँ की कल सिम्मी मामी से मिल आऊँ। काफ़ी महीनो से उनसे बात ही नहीं हुई कोई।”

मेरी बात सुन कर माँ बोली — “ठीक है पहले खाना खा ले।” और उठ कर किचन में काम समेटने चली गयी। घर में उस वक़्त और कोई नहीं था। अंजलि दीदी की दो साल पहले शादी हो गयी थी और पापा ऑफ़िस के काम से पूना गए हुए थे। खाना खा कर मैं थोड़ी देर तक टीवी और उसके रिमोट से खेलता रहा लेकिन एक साल तक अमेरिका में रहने के बाद इंडियन टीवी कहाँ समझ आना था। मैंने ड्रॉइंग रूम से ही माँ को आवाज़ लगा कर बोला की मैं अपने कमरे में सोने जा रहा हूँ और बाक़ी बातें सुबह करूँगा।

माँ गीले हाथ अपनी साड़ी से पोंछतीं हुई किचन से बाहर आयी और बोली, “अरुण, सुन! एक मिनट बैठ तो ज़रा।” 
मैं अपने कमरे में जाते जाते रुक कर सोफ़े पर बैठ गया। माँ मेरे सामने वाले सोफ़े की साइड पर बैठी और बड़े सम्भल कर बोली — “सिम्मी की छः महीने पहले डेथ हो गयी।”
ये सुन कर पहले तो मुझे हँसी आने लगी लेकिन फिर लगा की माँ ऐसा मज़ाक़ क्यों करेंगी। लेकिन इससे पहले की मैं समझ कर कुछ कह पता, माँ ख़ुद ही बोल पड़ी — “दिल का दौरा पड़ा था। रात को नींद में सोती की सोती रह गयी।”

“मुझे बताया क्यों नहीं?”

“अब तुझे बता कर भी क्या करते।” माँ ने मुझे समझाने की कोशिश की। “सोचा की वहाँ इतनी दूर अकेला परेशान होगा। पढ़ने गया है और इस ख़बर से पढ़ाई का और नुक़सान होगा। यही सोच कर तुझे कुछ नहीं बताया।”

माँ को शायद लगा की मैं ग़ुस्सा हो जाऊँगा लेकिन मुझे ग़ुस्सा नहीं आया। मैं समझ गया की मुझसे ये ख़बर क्यों छुपाई गई। माँ को भी लगा की इस बात को अभी के लिए ख़त्म कर देते है — “तु सोने जा रहा था ना? जा कर सो जा। कल सुबह आराम से बात करेंगे।” मैंने माँ को गुड़नाईट बोला और ऊपर अपने कमरे में आ कर कमरा अंदर से बंद कर लिया।

बेड पर लेटने की वजाए मैं स्टडी टेबल के साथ रखी कुर्सी बार बैठ गया और सोचने लगा की अभी अभी जो माँ ने बताया उस ख़बर पर कैसे रीऐक्ट करूँ । सबसे पहले तो ये सवाल मन में आया की सिम्मी मामी की मरने पर रोयूँ या नहीं। ख़बर ज़रूर मुझे अभी मिली हो लेकिन बात तो छः महींने पुरानी हो चली थी। इतनी पुरानी बात आँसू बहाना सही होगा या ग़लत? मैं ये सोच ही रहा था की ख़्यालों में सिम्मी मामी का चेहरा आ गया और आँखों ने सारा सोच विचार त्याग कर आँसुयों की झड़ी गया दी।

कब कुर्सी से उठ कर मैं बेड पर तकिए में मुँह छुपा कर रोने लगा पता ही नहीं चला। शायद कहीं रोने के आवाज़ माँ तक ना चली जाए इसीलिए मैंने ऐसा करा। मैंने कमरे की लाइट बंद की और सोने की कोशिश करी लेकिन रह रह कर दिमाग़ में सिम्मी मामी का चेहरा और आवाज़ गूँज रही थी। आँसू रुक रुक कर निकल पड़ते थे। पूरा तकिया गिला हो गया।

मामी की उम्र ज़्यादा नहीं थी यही कोई पैंतालिस साल रही होगी लगभग, इस उम्र में कौन मरने के बारें में सोचता है। एक साल पहले जब मैं अमेरिका गया था तब मामी मुझे छोड़ने ऐयरपोर्ट आयीं थी। मुझे क्या पता था की उनसे वो मेरी आख़िरी मुलाक़ात होगी। अगर पता होता तो शायद में जाता ही नहीं। ना जाने आँसू इस बात के थे की वो अब इस दुनिया में नहीं है या फिर इस बात के की एक आख़िरी बार उनसे मिल नहीं पाया मैं। पता भी कब चला उनके मरने का, छः महीने बाद। शरीर में थकान तो महसूस हो रही थी लेकिन ये सब सोच सोच कर आँखों से नींद ग़ायब पूरी तरह ग़ायब हो गई।

मैं दबे पाव नीचे गया और ड्रॉइंग रूम से फ़ोटो अल्बम वाला बॉक्स अपने कमरे में ले आया। उसमें सिम्मी मामी और जीतू मामा की शादी की अल्बम निकाल कर देखने लगा। उनकी शादी मेरे पैदा होने से पहले हुई थी। इक्कीस-बाईस साल की रही होंगी मामी शादी के वक़्त। उनका नाम सिमरन था लेकिन सभी उन्हें सिम्मी बुलाते थे। मामी बहुत ही सुंदर थी और शादी के लाल जोड़े में बिलकुल गुड़िया के तरह लग रही थी। किसी फ़ोटो में वो धीमी धीमी मुस्कुरा रही थी तो किसी में शर्म से आँखे झुकी हुई थी। फ़ोटो देखते देखते ना जाने अल्बम के कितने पन्ने आँसुयों की टपकती बूँदो में गीले हो गए। शादी की फ़ोटो से लेकर ऐयरपोर्ट पर आख़िरी मुलाक़ात तक मैंने बस उन्हें हँसते हुए देखा। स्वभाव की सरल और बोली की इतनी मीठी थी की लगता था कानों में मिश्री घोल रहीं हो। ये विश्वास करना मुश्किल था की वो इस दुनिया में नहीं रहीं। रह रह कर ये बात दिल को कचोट रही थी।

घर में कोई भी फ़ंक्शन हो या शादी मामी हर काम में आगे से आगे हाथ बटाती थी। सब से हंस कर मिलती और बात करती थी। ख़ासकर बच्चों से। बच्चों को खिलौने दिलाना, नए नए पकवान बना कर खिलने में उन्हें बहुत मज़ा आता था। बच्चों के साथ बच्ची बन कर खेलती थी और गोद में उन्हें उठा कर प्यार करती थी। वो ख़ुद माँ नहीं बन सकती थी। शादी के बाद काफ़ी कोशिश करी, काफ़ी इलाज भी करवाया। व्रत, हवन, सब तरह की मन्नतें कर के देख ली लेकिन भगवान से उनकी झोली औलाद से नहीं भरी। इसीलिए जब भी मौक़ा मिलता तो अपने आँचल में ख़ुद की औलाद के लिए दबा हुआ प्यार दूसरों के बच्चों पर लुटाती थी।

उनके दिल ममता सब बच्चों पर बरसती थी लेकिन मुझे पर सबसे ज़्यादा। जब वो ख़ुद के माँ बनने की उम्मीद वो छोड़ चुकी थी, उसके बाद उन्हें पता चल की मेरी माँ, उनकी भाभी, दोबारा एक और बच्चे को जनने वाली है। ये ख़बर उनकी ठुकराई हुई ममता का सहारा बनी। जब ज़िंदगी धोखा दे देती है तो मन को किसी तरह तो समझना पड़ता है। माँ बनने का जो सफ़र वो ख़ुद तय ना कर सकी उसका सुख उन्होंने मेरी माँ को देख कर लेने की कोशिश करी। घर में सब से ज़्यादा मेरे सही सलामत होने की चिंता उन्हें थी। जब मैं पैदा हुआ तो वो हॉस्पिटल में थी और नर्स से सबसे पहले उन्होंने ही मुझे अपनी गोदी में लिया। अपने ख़ुद के बच्चे को पहली बार गोदी में लेने की इच्छा उन्होंने मेरे से पूरी करी थी। मेरे होने के बाद वो माँ का ध्यान रखने के लिए दो तीन महींने हमारे घर में ही रुकी थी। उन दिनों मेरा पूरा ख्याल मामी ने रखा। मेरा नामकरन भी मामी ने ही किया था। माँ बताती है की जब वो मुझे छोड़ कर अपने घर वापस गई तो उस दिन इतना रोई जितनी अपनी विदाई पर नहीं रोई थी।

यूँ तो भाभियाँ अपनी नंदों के मयाके आ जाने पर मुँह चढ़ा लेती है। लेकिन एक सिम्मी मामी थी की पलकें बिछा कर हमारा इंतज़ार करती थी। जब हम रहते थे उनके पास तो अपने सारा पाक कौशल नए नए पकवान बना कर हमें दिखाती थी। पंजाबी, साउथ इंडियन, गुजराती, चायनीज़, इटालीयन, फ़ास्ट फ़ूड, और ना जाने क्या क्या। दुनिया के सारे कुइजिन मामी हमारे लिए बना डालती थी। नए नए खिलौने और पार्क की सैर और सिनमा हॉल में मूवीज़। लाड़ में उन्होंने अंजलि दीदी और मुझे क्या क्या नहीं दिया। माँ की शिकायत रहती थी — “भाभी, तुम इनकी आदत ख़राब कर रही हो। वापस जा कर मुझ से भी ये सब करके के लिए कहेंगे।”

“दीदी! एक काम करो आप इन दोनो को यहीं छोड़ जाओ मैं संभाल लूँगी।” मामी हमें अपने गले लगा कर ये जवाब दे देती।

मज़ाक़ में या पता नहीं गम्भीरता से, वो मुझे गोद लेने की बात माँ से बोल देती थी। माँ हंस कर उन्हें टाल जाती थी। माँ ने कभी मामी की किसी बात का बुरा नहीं माना। मामी भले ही हमेशा हँसती मुस्कुराती दिखती थी लेकिन उनके दिल की टीस माँ से छुपी नहीं थी। मामी को उन्होंने हम पर प्यार बरसाने का पूरा अधिकार दे रखा था।

जब हम अपने घर पर होते थे तो मामी बार बार फ़ोन पर पूछती रहती थी — “दीदी! कब आओग़े आप सब? छुट्टियाँ कब से है।”, “नालायक! मामी की याद आती है या नहीं? इतने दिन हो गए है मिले हुआ। ज़िंदा…”

सारी यादें एक बाड़ की तरह फिर से मन पर हावी हो गयी और एक बार फिर आँसु बाँध तोड़ कर बह पड़े। “ज़िंदा है मामी या मर गयी इसकी भी कभी चिंता कर लिया कर।” उनके ये शब्द कानों में गूँजने लगे।

कमरे में मेरा दम घुटने लगा। लगा की एक मिनट और वहाँ रुका तो मर ही जाऊँगा। माँ सो चुकी थी तब तक और गेट खोल कर मैं उनकी नींद ख़राब नहीं करना चाहता था। इसीलिए मैंने नीचे ड्रॉइंग रूम की खिड़की से बाहर कूद कर जाने का सोचा। मुझे सिगरेट की लत तो नहीं थी लेकिन अमेरिका जा कर कभी कभी सिगरेट पीने लगा था। चलते चलते मैंने बैग में छुपा हुआ सिगरेट का पैकेट और लाइटर भी साथ में ले लिया। नीचे ड्रॉइंग रूम की खिड़की से गार्डन में कूद कर मेन गेट से बाहर चला गया। और फिर मैं आधी रात को सड़क पर सिगरेट पीते पीते अकेले घूमने लगा।

जारी रहेगी…
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आज के epilogue में ख़ामोशी रहने देते है।

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