अक्स

कुछ लकीरें खींचते खींचते कागज़ पर 
एक तस्वीर नुमाया हुई
लगा कोई अपना है पहचान वाला 
बिछड़ा हुआ घमखवार कोई

उसकी आँखों में अपना माज़ी दिख रहा था मुझे
उसकी खुशबू गुज़रे वक़्त का एह्साह दिला रही थी

उसके वजूद से मुकामल लग रहा था जहाँ सारा
बहुत देर सोचता रहा देखता रहा मैं उसको

अचानक वो तस्वीर बोल उठी
सुनी सुनाई लग रही थी आवाज़ उसकी
बातों में गुज़रे माज़ी का अक्स दिख रहा था
घंटों गुफ़्तगू करता रहा मैं उस से
वो भूले बचपन की कहानी सुना रही थी मुझे

तेरा ज़िक्र आते ही आँखें भर आई उसकी
कुछ ऐसी बरसात हुई कि सब लकीरें धुन्दला गई
मैं खामोश बस देखता रह गया
यह सोच कर की आंसू पोंछ दूं उसके
मैं उसकी हस्ती ही मिटा बैठा

आज भी उसी कागज़ को देखता रहता हूँ
ढूंढता रहता हूँ अक्स कोई
शायद फिर कोई तस्वीर उभर आऐ कहीं
फिर कोई ले जाये मुझे गुज़रे वक़्त में
फिर कोई हाल-ए-दिल सुन ले मेरा