कौस-ए-कुज़ह (इंद्रधनुष)

वो एक आंसू जो छलक पड़ा
वो मेरी चाहत का खुमार था
वो जो एक दिल में उतर गया
वो हमारे रिश्ते का करार था
तुम आज आगे निकल गए
मैंने समेटा जो पीछे छूट गया
जो हमने ख़्वाबों में पिरोया था
वह ख्यालों का जहाँ आज टूट गया

ज़िन्दगी के किसी मुक़ाम पर
मुड कर जब भी कभी देखूंगा
वो आंसू दिल के किसी कोने से
बन कर कौस-ए-कुज़ह छा जाएगा
उस गुज़रे वक़्त की खनक पर
मैं एक पल को ठहर जाऊंगा
पर मैं ज़रूर मुस्कुराउंगा

कभी किसी महफ़िल में
जब तुम पुराने किस्से सुनाओगे
मेरी ज़िक्र जब भी कभी आएगा
तुम भी एक पल को ठहर जाओगे
आसमान में देखना ज़रूर
एक कौस-ए-कुज़ह तुम भी पाओगे
तुम भी फिर ज़रूर मुस्कुराओगे