Omesh Meena
Feb 23, 2017 · 6 min read

Quality education vs Good intentions

70000 वर्ष पूर्व शुरू हुई ‘संज्ञानात्मक क्रांति’ से मानव समाज की ‘ज्ञान यात्रा’ वैज्ञानिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति, सूचना क्रांति जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरती हुई आज के दौर में पहुँची हैं और शिक्षा इस लंबे मानव जीवन की सहचारिणी रही हैं। हालाँकि प्रारम्भ से ही शिक्षा ‘स्वतंत्र समाज’ का हिस्सा रही हैं लेकिन जबसे ‘राज्य-राष्ट्र’ के सिध्दान्त का उदय हुआ हैं; सभी देशों मे यह सरकारी व्यवस्था के एकाधिकार का शिकार बनकर रह गयी हैं। चूँकि किसी भी देश में उपलब्ध गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही वहाँ के मानव संसाधन की गुणवत्ता निर्धारित करती हैं इसलिए शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की उपस्थिति को लेकर कम प्रश्न उठे हैं लेकिन प्रमुख उदारवादी चिंतक और नोबेल विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सरकारी एकाधिकार की बजाय ‘प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था’ को ज्यादा सक्षम बताया था। मैं इसी सरकारी एकाधिकार के अधीन पब्लिक स्कूलों की शिक्षा गुणवत्ता का 'प्रजा फाउंडेशन' के द्वारा 'दिल्ली में पब्लिक स्कूलों में शिक्षा की स्थिति' पर रिलीज़ किये श्वेत-पत्र के माध्यम से विश्लेषण करूँगा।

हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था के प्रमुख मूल्य और उसकी नीति को लेकर सरकार की क्या राय हैं उसे दिल्ली सरकार की शिक्षा निदेशालय की वेबसाइट पर दिए गए परिचय से जानते हैं। इसमें लिखा हैं -“शिक्षा के पास आर्थिक विकास, सामाजिक परिवर्तन, आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय एकता की चाबी है। शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति का उद्देश्य एक स्तर तक सभी छात्रों को एक तुलनीय गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करना। सभी चरणों में इसकी गुणवत्ता सुधार करने के लिए और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर अधिक ध्यान देने के लिए, शिक्षा प्रणाली के एक क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत पर यह जोर देता है। शिक्षा निदेशालय आग्रह-पूर्वक इस नीति को लागू करने के लिए प्रयासरत है।”

शायद ही कोई शिक्षा नीति के उपर्युक्त इरादों से असहमति जाहिर करे लेकिन क्या ‘अच्छी शिक्षा’ के लिए ‘अच्छे इरादे’ ही काफी हैं? क्या वर्तमान शिक्षा व्यवस्था आधुनिकीकरण की चाबी हैं? क्या सरकार वाकई गुणवत्त्ता के प्रति जागरूक हैं? यदि सरकार वाकई में शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रही हैं तो इन सवालों का जवाब इस नीति के उद्देश्यों में नहीं बल्कि नीति के ‘क्रियान्वयन’ और उससे प्राप्त ‘परिणामों’ में दिखना ही चाहिए। लेकिन समय समय पर आने वाली रिपोर्ट हमारी ‘शिक्षा गुणवत्त्ता‘ पर सवाल खड़े कर जाती हैं।

OECD के PISA सर्वे में 74 भागीदारों में से दो भारतीय राज्य 72 और 73 वें पायदान पर रहे। हर साल प्रकाशित होने वाली ‘असर रिपोर्ट’ हमारी ग्रामीण भारत में दी जा रही शिक्षा की गुणवत्ता की पोल खोल देती हैं और तेजी से ‘पब्लिक स्कूल’ का विकल्प ‘प्राइवेट स्कूलों’ के होने का संकेत देती हैं। असर रिपोर्ट के मुताबिक 2006 से 2013 में ग्रामीण भारत में प्राइवेट स्कूलों में नामांकन 19% से बढ़कर 29% हो गया हैं। FICCI और EY की मार्च 2014 की संयुक्त रिपोर्ट में देशभर के सम्पूर्ण विद्यार्थियों का 40% नामांकन प्राइवेट स्कूलों में बताया गया हैं। सरकारी विद्यालयों में इस प्रकार घटते नामांकन पर केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आर्थिक सर्वे 2015-16 ने भारी चिंता जताते हुए इसे न सिर्फ 'रोकने की अपितु वापस मोड़ने' की वकालत की हैं।

आखिर प्राइवेट स्कूलों की तरफ बढ़ते मोह का क्या कारण हैं? 1999 में प्रकाशित PROBE report के अनुसार अभिभावकों द्वारा प्राइवेट स्कूलों को प्राथमिकता दिए जाने का कारण सरकारी स्कूल व्यवस्था में ‘उत्तरदायित्व श्रृंखला’ का कमजोर होना हैं; जबकि प्राइवेट स्कूल में ‘स्कूल प्रबंधन’ के माध्यम से शिक्षक बच्चों और उनके अभिभावकों के प्रति उत्तरदायी होते हैं। चूँकि कई अध्ययनों से शिक्षा में किये गए निवेश और उससे प्राप्त निजी और सामाजिक लाभों के मध्य सकारात्मक सम्बन्ध पाया गया हैं। सिंघारी और मधेस्वरन के वर्किंग पेपर 'The Changing Rates of Return to Education in India: Evidence from NSS Data' में दुनियाभर के सैंकड़ों अध्ययनों के आधार पर स्कूलिंग पर लगभग 10% का लाभ पाया गया हैं और साथ ही ‘श्रम बाजार’ और ‘आय उपार्जन’ में भी विद्यालयी शिक्षा का सकारात्मक प्रभाव आँका गया हैं। इसलिए खासकर गरीब अभिभावक भी बेहतर शिक्षा के लिए अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजने के लिए तत्पर रहते हैं। इन्ही सभी सवालों के मद्देनजर ‘प्रजा फाउंडेशन‘ ने ‘दिल्ली में पब्लिक स्कूलों की शिक्षा स्थिति’ पर एक श्वेतपत्र जारी किया हैं जो दिखलाता हैं कि सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं दिल्ली जैसे शहर की भी शिक्षा व्यवस्था गुणवत्त्ता के स्तर पर सवालों के घेरे में हैं। भारी भरकम ‘पब्लिक खर्च’ के बावजूद भी ड्राप आउट की उच्च दर और सरकारी स्कूल में जाने वाले बच्चों में से आधे से ज्यादा द्वारा प्राइवेट ट्यूशन पर खर्च, शिक्षा और शिक्षक दोनों की गुणवत्ता से अभिभावकों की असंतुष्टि जैसे मुद्दे सामने आये हैं।

विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता का सबसे प्रमुख पैमाना उनमें होने वाले नामांकन हैं लेकिन 2013-14 से 2014-15 के बीच दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार दोनों के विद्यालयों में लगभग 1 लाख 50 हजार नामांकन कम हुए हैं। यदि पहली कक्षा के नामांकन पर नजर डाले तो 2010-11 और 2015-16 के बीच लगभग 45 हजार की कमी आयी है। नामांकन में गिरावट साफ़ तौर पर राजकीय विद्यालयों द्वारा बच्चों को अपनी और आकर्षित नहीं किये जाने का संकेत हैं। यहाँ तक की राज्य सरकार के स्कूलों में 2013-14 और 2014-15 के बीच दाखिला लेने वाले कुछ छात्रों में से 0.7% विद्यार्थियों ने नामांकन के अगले साल वहाँ पढ़ाई जारी नहीं रखी।

ड्रॉपआउट भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ी समस्या रही हैं और दिल्ली में यह जारी हैं। दिल्ली के नगर निगम और राजकीय स्कूलों में सत्र 2015-16 के दौरान 1 लाख 45 हजार विद्यार्थी ड्राप आउट हुए हैं जो कि बहुत चिंताजनक हैं। पूर्वी दिल्ली नगर निगम में तो ड्राप आउट दर लगभग 18% रही हैं। यूरोपीय कमीशन की शिक्षा गुणवत्ता का एक बड़ा मानक ‘सफल और संक्रमण‘ हैं जहाँ प्राथमिक शिक्षा से उच्च माध्यमिक शिक्षा की ओर सफल गमन जरुरी हैं। इस पैमाने के अनुसार देखे तो 2014-15 में 45% कक्षा 9 से कक्षा 10 में और लगभग 35% कक्षा 11 से कक्षा 12 में नहीं जा सके। ये बहुत ही निराशाजनक आंकड़े हैं क्योंकि ये सभी विद्यार्थी ‘सतत और समग्र मूल्यांकन’ के दौर को पार करके पहुँचे हैं। इससे यही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि सरकारी विद्यालयों में उनको स्तरीय शिक्षण नहीं मिला था।

बच्चों की शिक्षा के प्रमुख निवेशक और शेयरहोल्डर बच्चों के अभिभावक ही होते हैं और ऐसे में उनकी 'विद्यालय की शैक्षिक गुणवत्ता' के प्रति राय बहुत मायने रखती हैं। प्रजा फाउंडेशन ने ही हंसा रिसर्च के लिए पब्लिक स्कूलों में जाने वाले बच्चों के अभिभावकों पर किये गए सर्वे में पाया कि 52% अभिभावक अपने बच्चों को प्राइवेट ट्यूशन भी करवाते हैं। सरकार द्वारा प्रत्येक बच्चे पर लगभग 43 हजार खर्च किये जाने के बावजूद भी यदि उन्हें प्राइवेट ट्यूशन की दरकार हैं तो निस्संदेह जन-संसाधनों के सार्थक उपयोग नहीं किये जाने की समस्या को सामने आती हैं। अभिभावकों ने पब्लिक स्कूलों से नाखुश होने के 3 प्रमुख कारणों में बेहतर भविष्य की कम गुँजाइश होना, शिक्षा की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं होना और शिक्षकों के अच्छे नहीं होना बताया हैं। यही पर शिक्षा के क्षेत्र में ‘चयन और प्रतिस्पर्धा’ की जरुरत महसूस होती हैं जिससे शिक्षा में गुणवत्ता आ सके और शिक्षकों की ज़िम्मेदारी बच्चों और अभिभावकों के प्रति हो सके। अनीता जोशुआ ने 16 जनवरी 2014 को THE HINDU में अपने लेख में प्राथमिक शिक्षा में प्राइवेट ट्यूशन पर योजना आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की चिंता को निम्न शब्दों में जाहिर किया हैं-" जबकि राज्य को स्कूल शिक्षा में पैसा लगाते रहना चाहिए, क्या यह सब सरकारी स्कूल में ही जाना चाहिए?" ऐसे में 'सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी' द्वारा सुझाए गए वाउचर व्यवस्था और कम लागत वाले सामुदायिक और बजट स्कूल बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं जो कि RTE की चपेट में आने से बंद होने की कगार पर हैं!

इस श्वेत पत्र में एक चौंकाने वाला खुलासा हमारे जन-प्रतिनिधियों का शिक्षा के प्रति अनुत्तरदायी और उपेक्षित रवैया। पब्लिक सर्विस का महत्वपूर्ण विषय होने के बावजूद भी 31% पार्षद (अप्रैल 2015 से मार्च 2016) और 40% विधायकों (मानसून और शीतकालीन सत्र 2015) ने शिक्षा से संबंधित कोई सवाल नहीं पूछा जबकि ड्राप आउट पर सिर्फ एक सवाल पूछा गया। प्रजा फाउंडेशन का यह श्वेत-पत्र निस्संदेह दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम की लोक शिक्षा व्यवस्था में बेहतर उत्तरदायित्व और पारदर्शिता की माँग बढ़ाएगा और ‘गुणवत्तापूर्ण' शिक्षा के आग्रह को बजट प्लानिंग से जोड़े जाने पर जोर देगा ताकि जन-संसाधनों का कुशल एवं लाभप्रद उपयोग किया जा सके। 2015-16 के 'आर्थिक सर्वेक्षण' ने जिस प्रकार 'असर रिपोर्टों' का संज्ञान लेते हुए 'शिक्षा की घटती गुणवत्ता' पर चिन्ता जताते हुए सरकार द्वारा तुरंत प्रभाव से सार्थक कदम उठाने के लिए आह्वान किया हैं वैसे ही प्रजा फाउंडेशन के इस श्वेत-पत्र का संज्ञान दिल्ली सरकार और दिल्ली नगर निगम को लेना चाहिए। भारी भरकम सरकारी खर्च के बावजूद भी अभिभावकों द्वारा प्राइवेट ट्यूशन पर खर्च करना 'लोक सेवाओं में अविश्वास' को बढ़ावा देता हैं इसलिए शिक्षा नीति के हर पहलू में अभिभावकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए और 'विद्यालय प्रबंधन समिति' को क्रियाशील और सक्षम संस्था के रूप में बनाये जाने का प्रयास किया जाना चाहिए। चूँकि शिक्षा का अधिकार भारतीय संविधान के अनुसार 'जीवन के अधिकार' का अभिन्न हिस्सा हैं ऐसे में कमजोर या गुणवत्ताहीन शिक्षा नागरिकों के मूल अधिकार का हनन होगा और यह राज्य की ज़िम्मेदारी हैं वह सिर्फ सुलभ और सस्ती शिक्षा ही उपलब्ध करवाकर ही अपनी जिम्मेदारी से मूंह न मोड़े बल्कि उस शिक्षा में गुणवत्ता को भी सर्वसुलभ और सस्ता बनायें।

(First published on Aazadi.me on 23 Jan 2016 )

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