अड़ोस-पड़ोस की बात

—प्रणय कोटस्थाने और हेमंत चांडक

Pranay Kotasthane
Jun 18 · 5 min read

This is a draft of an article that appeared first in Rajasthan Patrika on 18th June 2019

नई सरकार ने आते ही अपनी विदेश नीति के लिए एक नारा चुना — ‘नेबरहुड फर्स्ट’ | इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि भारतीय सरकार विदेश मामलों में अपने पड़ोसियों को प्राथमिकता देगी | इस सोच पर अमल करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री अपने पहले विदेश दौरे के लिए मालदीव और श्रीलंका गए जबकि विदेशमंत्री ने अपने पहले दौरे में भुटान के राजनेताओं से मुलाकात की | पड़ोसियों को प्राथमिकता देने वाली इस नीति से शायद ही किसी को ऐतराज़ हो सकता है और वास्तव में इस नारे में कुछ नया है भी नहीं | भारत के हर प्रधानमंत्री ने इसी नज़रिये को अलग-अलग लफ़्ज़ों में व्यक्त तो किया है पर दक्षिण एशिया की राजनैतिक संकल्पना फिर भी फेल होती रही है | तो इस बार इस नीति में ऐसा क्या बदलाव आना चाहिए कि नतीजे कुछ अलग निकलें — इसी मुद्दे पर कुछ विचार |

Patrika News, 18th June 2019

सबसे पहले हमें ‘पड़ोस’ शब्द को ही नए सिरे से सोचना होगा | पड़ोस को सिर्फ एक भुगौलिक संकल्पना के तौर पर देखना अनुचित होगा | असल में दक्षिण एशिया के बाहर भी भारत के कई सारे पड़ोसी है | आर्थिक तौर पर अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, क़तर, साऊदी अरब, और चीन भारत के पड़ोसी है | वैचारिक तौर पर इंडोनेशिया, यूरोप, और अमरीका भारत के पड़ोसी है और सुरक्षा मामलों के दृष्टिकोण से रूस, इजराइल भारत के पड़ोसी है | चूँकि भारत एक नहीं कई सारे ‘पड़ोस’ का अहम हिस्सा है हमारी विदेश नीति की प्राथमिकताएँ भी इस बहुभागी पड़ोस को ध्यान में रखकर बनानी चाहिए |

सबसे पहले, हमारे भुगौलिक पड़ोस के भीतर की प्राथमिकताएं बदलनी होगी | इसका मतलब है पाकिस्तान पर ध्यान कम और पूर्वी राष्ट्रों पर ध्यान ज़्यादा | पाकिस्तान एक ऐसी गुत्थी है जिसे हर प्रधानमंत्री वार्ता से सुलझाना तो चाहता है पर वार्ता के शुरू होते ही पाकिस्तानी मिलिट्री-जिहादी कॉम्प्लेक्स एक आतंकी घटना को अंजाम दे देती है और वार्ता प्रक्रिया ठप्प पड़ जाती है | और तो और इस झंझट में उच्च स्तर पर समय और संसाधन व्यर्थ हो जाते है | इसीलिए पाकिस्तान को विदेश सेक्रेटरी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) स्तरों पर छोड़ देना चाहिए जिससे उच्च स्तर पर विदेश नीति को नई दिशा देने का मौका मिल पाए|

अच्छा होगा अगर भारत उपमहाद्वीप में बांग्लादेश जैसे उभरते राष्ट्रों पर ध्यान दे | २०१८ में बांग्लादेश भारत में निर्मित दुपहिया वाहनों के सबसे बड़े निर्यात बाजार के रूप में उभरा | क्योंकि बांग्लादेश की आबादी १६ करोड़ से ज़्यादा है, वहाँ होने वाली आर्थिक वृद्धि का भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था पर भी सीधा असर पड़ता है | इस एक पहलू में बांग्लादेश भारत के दूसरे दक्षिण एशिआई देशों से हटकर है और इसीलिए भारत को बांग्लादेश पर फोकस करने की ज़रुरत है |

रही बात दुसरे दक्षिण एशिआई देशों की | अक्सर कहा जाता है कि भारत जब तक अपने हर भुगौलिक पड़ोसी से अच्छे रिश्ते न स्थापित कर ले, वह एक शक्तिशाली देश नहीं बन सकता | यह विचार शैली इस बात को नज़रअंदाज़ करती है कि साऊथ एशिया के हर छोटे राज्य के लिए भारत और चीन के प्रभाव को संतुलित रखना बेहद लाभदायक है | इसीलिए अपेक्षा करना कि ऐसे देश भारत से घनिष्ठता बढ़ते ही चीन से दूरी स्थापित कर लेंगे यह व्यर्थ है | अगर ये दक्षिण एशियाई राज्य भारत की सुरक्षा चिंताओं और आर्थिक हितों के प्रति संवेदनशील हैं तो भारत को चीन की दक्षिण एशिया में उपस्थिति से चिंतित होने की ज़रुरत नहीं है |

हाल ही में प्रधान मंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बिम्सटेक (BIMSTEC) देशों को आमंत्रित किया गया । यह एक अच्छा कदम है क्योंकि सार्क (SAARC) में पाकिस्तान की बेरुखी के कारण हर विषय पर असहमति बनी रहती थी| बिम्सटेक बंगाल की खाड़ी के तटवर्ती या समीपी देशों का एक अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग संगठन है ।इस संगठन को स्थापित करने के लिए इसके तहत शुरू की गयी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को पूरा करने पर भारत को विशेष ध्यान देना होगा। आखिर पड़ोसी भी अपना हित देख कर ही दोस्ती करते हैं |

ध्यान से देखें तो दक्षिण एशिया के बाहर भारत के कई समुद्री पड़ोसी भी है | एक सशक्त नौसेना और सदृढ़ व्यापार संबंध के सहारे समंदर दो देशों के बीच बाधा नहीं बल्कि उन्हें जोड़ने का ज़रिया बन जाते है | इस कल्पना में इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया के कई राष्ट्र एकाएक नज़दीक लगने लगते है | नौसेना की इस उपेक्षित भूमिका पर ध्यान देने से भारत और भारतियों के लिए नई संभावनाएं खुल जाएंगी |

साथ ही भारत को आर्थिक पड़ोसियों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करने की सख़्त ज़रुरत है | अभी चल रहे अमरीका-चीन के आर्थिक झगडे का कारण राजनैतिक है और यह आने वाले कुछ सालों तक चलता रहेगा | दोनों देश विश्व में अपना प्रभुत्व ज़माने की प्रतिस्पर्धा में है | ऐसी हालत में भारत (या कोई और तीसरा देश) इन दोनों को रोकने के लिए कुछ ख़ास नहीं कर सकता | लेकिन एक उपाय है जिससे भारत इस संकट को ख़ुद के लिए मौके में तब्दील कर सकता है — व्यापार शर्तों का उदारीकरण | इससे अमरीका हो या चीन, हर देश भारत जैसे बड़े मार्केट में और तेज़ी से निर्यात करना चाहेगा और भारतीय ग्राहक को फायदा पहुँचेगा |

आर्थिक तौर पर पड़ोसियों को जोड़ने का एक और रास्ता है — राज्यों का विदेश नीति में योगदान बढ़ाना | भारत का आर्थिक भविष्य दिल्ली से दूर उसके राज्यों और शहरों द्वारा परिभाषित किया जाएगा | पंजाब के लिए कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ज़रूरी है, उत्तरप्रदेश और केरल के लिए अरब देश ख़ास महत्त्व रखते है तो आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के लिए अमरीका स्पेशल है | इसी लिए राज्य सरकारों को विदेश के कुछ एक जगहों पर अपना स्थायी प्रतिनिधित्व रखने की अनुमति मिलनी चाहिए |

वैचारिक तौर पर नए पड़ोसी बनाने के लिए भारतीय सरकार को कुछ वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए प्रस्ताव देने का बीड़ा उठाना चाहिए । क्लाइमेट चेंज, आतंकवाद, और परमाणु ख़तरे से सुरक्षा — ऐसे कई विषय है जिन पर भारत एक नई सोच ला सकता है | अंतराष्ट्रीय गुटों में भारत की छवि एक समस्या निवारक रूप में तब्दील होते ही अन्य कई देश भारत से जुड़ना चाहेंगे |

पड़ोस को एक नए सिरे से सोचना भारतीय विदेश नीति के लिए ज़रूरी है | अस्सी के दशक से भारत को महज़ दक्षिण एशिया की एक शक्ति के रूप में देखा जाने लगा था | अब समय आ गया है इन मानसिक बेड़ियों को तोड़ने का | आख़िर भारत एक बहुभागी पड़ोस का हिस्सा है |

Pranay Kotasthane

Written by

Research Fellow @TakshashilaInst. Writes on Geopolitics, Public Finance, and Public Policy. VLSI professional turned Policy Researcher.

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