Why Indian States Must Have Their Own Foreign Policies

राज्यों की अपनी विदेश नीतियों का समय आ गया है

Pranay Kotasthane & Hemant Chandak

(This article first appeared in Rajasthan Patrika on 15th September 2018)

ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्रालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट का प्रकाशन किया है जिसका शीर्षक है ‘An India Economic Strategy to 2035’ | 18 अगस्त को ऑस्ट्रेलिया की भारत में राजदूत हरिंदर सिद्धू ने इस रिपोर्ट का दिल्ली में अनावरण किया | ऑस्ट्रेलिया की दूरदर्शी सोच का आप इसी बात से पता लगा सकते हैं कि भारत सरकार ने खुद अपनी २० साल की अर्थव्यवस्था रणनीति की कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है!

ऑस्ट्रेलिया का यह दावा है कि भारत अगले २० वर्षो में दुनिया के २-३ सबसे शक्तिशाली देशों में से एक होगा, और वो उसकी कामयाबी का हिस्सा बनना चाहता है | साथ ही चीन की घरेलु राजनीति में दखलंदाज़ी ने ऑस्ट्रेलिया को झकझोर के रख दिया है | इसके चलते ऑस्ट्रेलिया चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता कम करना चाहता है और इसीलिए भारत के ऊपर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है |

वैसे तो पूरी रिपोर्ट ज्ञानवर्धक है पर इसका एक अंक ख़ासा दिलचस्प है — ऑस्ट्रेलिया के राज्यों का राष्ट्रीय विदेश नीति में समावेश | भारत की तरह ऑस्ट्रेलिया भी राज्यों का एक संघ है | लेकिन भारतीय सिस्टम से हटकर ऑस्ट्रेलिया के राज्य अपनी अर्थव्यवस्था हेतु दुसरे देशों और राज्यों से सीधे संपर्क बनाते है | उदाहरण के लिए, भारत में ही ऑस्ट्रेलिया के छह राज्यों में से पांच के या तो अपने खुद के ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट ऑफिस हैं या फिर स्थायी प्रतिनिधि हैं | यह ऑफ़िस राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से दूर मुंबई, बैंगलोर इत्यादि में है |

‘India Economic Strategy to 2035’ रिपोर्ट ने इन रिश्तों को और सदृढ़ करने के उद्देश्य से अपनी कंपनियों और राज्यों को १० भारतीय राज्यों पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए है | ऑस्ट्रेलिया की सोच यह है कि अगले दो दशकों में भारतीय राज्य अर्थव्यवस्था में एक निर्णायक रोल अदा करेंगे और इसीलिए केंद्र सरकार के साथ साथ राज्य सरकार से सीधे संपर्क से ऑस्ट्रेलिया को बहुत फायदा पहुँचेगा|

ऑस्ट्रेलिया का यह रवैया भारत के राज्यों को विदेश नीति में सक्रिय होने का संदेश देता है | भारत में आम धारणा यह है कि विदेश नीति केवल केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है | भारतीय संविधान के तहत भी विदेश नीति केंद्र सरकार के विशिष्ट दायरे में आती है और इसीलिए १९९२ के पहले सिर्फ कुछ एक अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लगे राज्य — जैसे कि जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल — इस नियम के अपवाद थे | इस कालावधि में भारतीय विदेश नीति में राज्यों का योगदान न के बराबर होता था |

पर १९९२ के आर्थिक सुधारों के बाद इस व्यवस्था में काफ़ी बदलाव आया | केन्द्रीकरण के घटने से राज्य सरकारों का आर्थिक नीतियों पर संचालन बढ़ा और कुछ राज्य सरकारें विदेशी कंपनियों और सरकारों से निवेश लाने के लिए ‘इन्वेस्टर समिट’ का आयोजन करने लगी | चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में जब हैदराबाद का IT हब के रूप में पुनर्जन्म हुआ तो आंध्र प्रदेश सरकार ने कई विदेशी कंपनियों के साथ काम किया | वैसे ही नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने जापान, चीन और सिंगापुर के दौरे किए और विदेशी कंपनियों को गुजरात में निवेश करने के लिए आकर्षित किया | हाल ही में केरल और संयुक्त अरब अमिरात के बेहतर रिश्तों की झलक भी मिली |

इसराइल-भारत के रिश्तों को सामान्य बनाने में भी राज्यों का बुनियादी योगदान था | भारत सरकार इसराइल-फिलिस्तीन झगडे में लिप्त हुए बिना इसराइल से गहरे रिश्ते स्थापित करना चाहती थी | राष्ट्रीय राजनीति की चकाचौंध से दूर, ऐसी स्थिति में इसराइल से संबंध बनाने का बीड़ा आया राज्य सरकारों पर | १९९२ से २०१३ तक भारत की राज्य सरकारों के उच्चस्तरीय प्रतिनिधियों ने १७ बार इसराइल का दौरा किया और कृषि, जल संसाधन, आईटी जैसे कई क्षेत्रों में दोनों देशों को कनेक्ट किया | यह प्रक्रिया जो १९९२ में शुरू हुई थी, आज और भी स्थापित हो चुकी है |

Rajasthan Patrika, 15 September 2018

आज तक़रीबन हर बड़ा राज्य ‘ग्लोबल इन्वेस्टर समिट’ का आयोजन तो करता ही है, कई मुख्यमंत्री भी विश्व के आर्थिक केंद्रों में सालाना दौरे कर कंपनियों को आमंत्रित करते रहते हैं | केरल और पंजाब जैसे राज्यों ने NRI मामलों पर सरकारी विभाग भी शुरू किये हैं क्योंकि इन राज्यों से बड़ी संख्या में लोग विदेश में बसे है | वहीँ भारत का सबसे नया राज्य तेलंगाना भी अब इसी तर्ज पर अपना विदेश सचिवालय खोलने की ताक में है | दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया के अलावा अनेक देश भारत के राज्यों में रूचि ले रहे है | जर्मनी, साउथ कोरिया, जापान, अमेरिका आदि देशों के राज्यों ने कई भारतीय राज्यों में अपने दूतावास खोल रखे है |

आगे राज्य और केंद्र सरकार क्या कर सकते हैं?

ऑस्ट्रेलिया की ‘An India Economic Strategy to 2035’ रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत का आर्थिक भविष्य दिल्ली से दूर उसके राज्यों और शहरों द्वारा परिभाषित किया जाएगा | और एक समृद्ध भविष्य के लिए केंद्र और राज्य सरकार दोनों को विदेश संबंधो के साधन का भरपूर फायदा उठाना चाहिए | ऐसा करने के लिए कुछ मूलभूत सुधारों की ज़रुरत है |

पहला, राज्य सरकारों को विदेश के कुछ एक जगहों पर अपना स्थायी प्रतिनिधित्व रखने की पहल करनी चाहिए | उदाहरण के लिए कर्नाटक को कैलिफ़ोर्निया में एक ट्रेड ऑफिस की स्थापना करनी चाहिए, जिससे आईटी और बायो-टेक्नोलॉजी के इन दो ध्रुवों का आदान प्रदान बढ़ सके | मुख्यमंत्रियों के सालाना दौरे एक अच्छी शुरुआत है पर दौरों के बाद भारतीय राज्य आँखों से ओझल हो जाते है और अपना ब्रांड विश्व स्तर पर नहीं बना पाते | जो राज्य यह पहल उठाते है, केंद्र को उन्हें सहयोग देना चाहिए | हो सके तो भारतीय दूतावासों में ही राज्यों को अपनी मर्ज़ी और क्षमता के अनुसार प्रतिनिधित्व रखने की छूट मिलनी चाहिए |

दूसरा, राज्य सरकारों को विदेश संबंधों से होने वाले फ़ायदे समझाने की ज़रुरत है | अमरीका स्थित “ईस्ट-वेस्ट सेंटर” नामक शोध संस्था ने अमरीका और दक्षिण कोरिया के राज्यों के बीच संबंधों से उभरने वाले रोज़गार अवसर, पर्यटन राजस्व इत्यादि का मूल्यांकन किया है | भारत में भी कुछ ऐसा करने की ज़रुरत है जिससे राज्य सरकारों की विदेश नीति में रुचि बढ़ाई जा सके |

तीसरी और सबसे ज़रूरी बात है भारत के नागरिकों की सोच में बदलाव | हमारी राष्ट्रीय सरकारें राज्य सरकारों के शासन-क्षेत्र वाले विषयों में लिप्त रहती है, वहीँ राज्य सरकारें मुनिसिपालिटी सरकार के स्तर के कामों में लिप्त रहती हैं | इसका बड़ा कारण है नागरिकों की सरकारों से गलत अपेक्षाएँ | हमें समझना चाहिए कि भारत के राज्य विश्व के कई राष्ट्रों से जनसँख्या और क्षेत्रफल में बड़े हैं | हमारी राज्य सरकारों से अपेक्षाएँ भी उसी स्तर की होनी चाहिए; उनके बर्ताव में परिवर्तन तभी आ पायेगा |