ऐ चाँद! ….. (O Moon…)

ऐ चाँद!

चाँदनी पे तुझे ग़ुरूर नाहक,

तू तो सूरज के दम पर चमकता है;

तेरे वजूद तलक पर नहीं तेरा हक़,

धरती का साया तेरा क़द तय करता है।

गड्ढे तेरे जिस्म पे बेसुमार

क्यूँ तू बेपनाह ख़ूबसूरती का फ़रिश्ता है;

ज्वार-भाटे का तू सबब,

क्या सही मे, लहरों पे तेरा ज़ोर चलता है।

मुफ़्तख़ोर परजीवी,

तो एक आसान डगर;

ख़ुद को भस्म कर जग रोशन करना,

बहुत मुश्किल सफ़र।

चल चले बदले नक़्शे क़दम पर,

‘प्रेम’ कर मुश्किल फ़ैसले अपने दम पर।

@ Premjit Lal