From memory Lane

…….यादों की कतरने…..

पूस की रात मे फूस का बिछौना,

सावन की बौछार का अंग अंग भिगोना।

चैत्र की रात मे पुरवाई सुहानी,

जेठ की दोपहर मे मटके का पानी।

गुप चुप छुप छुप आम तोड़ते मासूम बच्चे,

गोबर पुते मिट्टी के वो आलीशान घर कच्चे।

साँप सी मेंढ पे पह पग घट संभालती पनहारिन,

गारे से सुराही मे जान डालती चाक पे कुम्हारिन ।

बारिश मे काग़ज़ की कश्ती चलाना,

मक्का के खेत मे मचान से परिंदे भगाना।

गली नुक्कड़ पे हँसी ठट्ठो की आवाज़,

चम्मच से बजाते थाली और घड़े के साज।

नीम की छांव मे मुढो का तख़्तों ताज,

नीले आसमान मे पतंग की वो परवाज।

झूमते बैलों के गले मे धुन सुनाती टालियाँ,

इतराती सरसों को रिझाती गेहूँ की बालियाँ ।

भडभूजे के भाड मे भूने चने ज़ोर गरम,

कढ़ाई मे कढती रबड़ी सी खीर नरम।

हथेली की थाली, रोटी बनती दाल की कटोरी,

हाथ का चुल्लू, पीते मसक पानी बिन कसोरी।

गोचनी रोटी संग मुक्की लगा प्याज़,

मस्त अल्हड़ सा वो देहाती अंदाज।

यूँ तो यादो की हर क़तरन साथ है,

गोया हर वाकया जैसे कल की बात है।

पर कुछ ख़ाली, कुछ टूट सा गया है,

लगता है जैसे कुछ वही छूट गया है।

लौटा दे, वही आबो-हवा, वही सादगी,

‘प्रेम’ फिर चाहे, वो बेफ़िक्री, वो आवारगी..!