आज़ाद भारत और आज़ादी

मणिपुर में एक बाप अपने बेटे का इलाज कराने के लिये उसको ट्रैक्टर में डाल कर म्यानमार ले जा रहा होता है जहाँ रास्ते में ही उसका बेटा, उसके आंखों के सामने दम तोड़ देता है।

यह बिल्कुल सच्ची घटना है और देखिये इसमें कितनी सारी बातें ध्यान देने लायक है।

ट्रैक्टर क्यों? एम्बुलेंस क्यों नहीं? म्यानमार क्यों? भारत क्यों नहीं? क्योंकि भारत में, मणिपुर में, कामचलाऊ मेडिकल फैसिलिटीज उपलब्ध नहीं हैं। क्योंकि सड़क नहीं हैं। अस्तपताल है पर डॉक्टर नहीं हैं। क्यों शासन है पर साधन नहीं हैं।?

क्यों भारत के अगर आप टॉप पाँच सबसे ज़्यादा लिटरेट राज्यों के नाम देखें तो तीन नार्थ ईस्ट के हैं, इसके बावजूद यहाँ भूखमरी है, बेरोज़गारी है पर इंडस्ट्रीज़ नहीं है? 70 साल बाद भी क्यों सिर्फ दो ही सेक्टर्स ने भली भांति इस प्रदेश को पेनिट्रेट किया हुआ है - टेलिकमनिकेशन्स और बैंकिंग? क्यों चाय के बागान भी विदेशी कंपनियों के ही नाम हैं पर दशकों से काम करने वाले मजदूरों के खानदान आज भी यहाँ ग़रीब ही परलोक सिधारते हैं?

आप कहेंगे क्योंकि रेल्वेज़ नहीं है? भैया रेल्वेज़ बाकी भारत में भी इसलिए ही पहुँचीं थी क्योंकि अंग्रेजों को वहाँ से मतलब था। यहाँ वो नहीं आ पाये तो रेल भी नहीं आयी। पर आज़ाद भारत में ऐसी क्या रुकावटें हैं? अब क्यों नहीं हो पा रहा विकास?

किसी भी आम नागरिक से पूछ लीजिये कि पिछले 2-3 दिनों में भारत की मुख्य समाचार या घटनाएं क्या रहीं? ज़्यादा से ज़्यादा आपको दिल्ली के इर्द-गिर्द घूमते खबर ही मिलेंगे। गोरखपुर मिलेगा। कश्मीर मिलेगा। मतलब जो जो खबरें दिल्ली में उठायी जाती हैं, बस वही पूरे देश के लिये ख़बर हो जाती हैं। बाकी के देश का क्या?

हमारे संग एक और परेशानी है कि हम मिडल क्लाज़ लोग अपने आप को आम आदमी कंसीडर करते हैं। अरे हम कब के मिडल से हाई क्लाज़ हो गए हैं, हमें पता भी नहीं चला है। हमारे पास ऐसी ऐसी प्रिविलेज़ है कि हम गिनती भी भूल चुकें हैं। आज भी हम जब यह डिसाइड करते हैं कि आज मौसंबी नही, केले का जूस पियेंगे तो वहीं किसी गांव में कोई परिवार साफ़ पानी को तरस रहा होता है।

जब हम स्टाइलिश खाने की कूल फ़ोटो इंस्टाग्राम में डाल रहे होते हैं तो कोई माँ अपने बच्चे को दूध के नाम पर आंटे में पानी घोल कर पिला रही होती है। पर हमें ना इन सब का कोई इल्म होता है और ना ही फर्क पड़ता है।

कहते हैं भारत व्होलिस्टिक राष्ट्र है, हमारा कल्चर महान है क्योंकि हम सब मिल जुल कर एक हो कर रहते हैं। पश्चिम के तरह इंडिविज़ुअलिस्टिक नहीं हमारा देश। अरे कैसे नहीं है इंडिविज़ुअलिस्टिक? बिल्कुल है। सोच कर देखिये। अगर इतनी ही हमें दूसरों की फिक्र होती तो भाई भाई की जान लेता क्या? चाचा भतीजी का रेप करता क्या?

कुछ साल पहले मैं दिल्ली में एक बार मेट्रो से कहीं जा रहा था। एक स्टेशन में एक महिला चढ़ीं। उनके हाथ में गेन्धे के फूल की माला थी। शायद किसी मंदिर से आ रही थी। मैंने अपनी सीट उन्हें ऑफर की तो उन्होंने लेने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि क्योंकि मैं उनके बेटे समान हूँ तो वो एक माँ होने के नाते पहले अपने बेटे को बैठाती। मैंने भी यही लॉजिक लगाई कि अगर मेरी माँ होतीं तो मैं पहले उन्हें बैठाता। वो मान गयीं पर फिर उन्होंने मेरा बैग अपने गोद में ले लिया यह कहते हुए कि माँ होती तो इतना तो करती ही।

मतलब यह कि जस्ट बिकॉज़ हमें कुछ मिल रहा है, इसका मतलब यह नहीं कि हम कृतघ्न बन जाएं। हमारी भी जिम्मेदारियां हैं और हमें उन्हें निभाना चाहिए। सिर्फ मांगें मांगना हमारा हक़ नहीं। जो प्रिविलेजें हमें मिली हैं, उसका उपयुक्त इस्तेमाल करना, ना सिर्फ खुद बल्कि दूसरों के हित के लिये भी, हमारा फ़र्ज़ बनता है।

वर्ना शावर ना होने पर भी हम नहा कर तो आ ही जाते। रोते नहीं रह जाते। ऐसे ही एक एक कर बाकी समस्याओं का हल भी हम करना चाहें तो कर सकते हैं। समस्याएं भी कमेंगी और रोजगार भी बढ़ेगा। पर उसके लिए सर्वप्रथम बिस्तर से उतरना तो हमें ही पड़ेगा ना।