कुछ रिश्ते कभी नहीं बदलते….

पता नहीं कब मुलाक़ात हुई पहली बार 
शायद माँ को गाते हुए सुना था पहली बार,
लता मंगेशकर जी की कोई गीत गुनगुना रही होएंगी वो
फिर रेडियो से शब्द निकलने लगे और आसपास चहकते हुए चेहरों को देख हम भी खुश होने लगे

स्कूल में पहली बार हमने “लकड़ी की काठी..काठी पे घोड़ा” गाना सीखा
लेकिन गाने का अर्थ समझ पाना, नामुमकिन हुआ करता था, उन दिनों 
जब हमारे हमउम्र पड़ोसी गाते — “मेरे सामने वाली खिड़की में इक चाँद का टुकड़ा रहता है” तो हम उनसे अक्सर पूछते, “अच्छा बताओ, चाँद के टुकड़े कैसे कर सकते हैं भला?”

कुछ सालों बाद फिर टीवी आ गया, और संगीत — असल में फ़िल्मी संगीत से हमारी पहली बार रस्मी मुलाक़ात हुयी.

फिर क्या था …..

दिल थम जाते थे हर बुधवार को — 8 बजे शाम जब चित्रहार शुरू होता

फिर शुक्रवार को भी चित्रहार आने लगा, और हम अनगिनत दलीलें ढूंढ़ने लगे — माँ को मानाने के लिए , कि किसी तरह से थोड़ी जल्दी टीवी देखने मिल जाए हमें.

टेप रिकॉर्डर खरीदने से घर में मनाही थी, तो भैया ने किसी तरह टेप रिकॉर्डर ‘assemble’ करना सीख लिया और ‘मिटटी की हांड़ी’ का स्पीकर बना डाला. तब वह हमारा जानी-दुश्मन भाई हुआ करता था पर उसके इन सब बेहतरीन कामों के लिए हम उसकी बेहद खुशामदी करते…..

और रिश्ता पक्का होता चला गया…

किशोर कुमार, मन्ना डे, लता मंगेशकर, मुकेश, RD बर्मन, बप्पी लाहिरी, मोहद. रफ़ी……

ऐसे ही वक़्त गुज़रा, दूरदर्शन से केबल, और केबल से वॉकमेन, Youtube, Spotify और अनगिनत FM

“आने वाला पल जाने वाला था”…और उसी पल में किसी तरह ज़िन्दगी गुज़ारनी थी

शामों को, गर्मियों की दोपहर में, बारिश में, हताश होने पर, ख़ुशी से उछलने पर, कभी थकान के दौरान, कभी जब ज़िन्दगी से अनगिनत सवाल हों, कभी जब लगे की दिल कहीं भटक रहा हो, कभी जब लगे की ‘crush’ हो रहा हो …

सब कुछ बदल गया ….

अब तो जब भी, जो भी, गाने सुनने का मन करे, सुन सकते हैं.
अब बुधवार का इंतज़ार करने की ज़रुरत नहीं, रेडियो को गले लगाने की ज़रुरत नहीं 
रात को वॉकमेन चला कर बैटरी उड़ाने की भी ज़रुरत नहीं…..

फिर भी “कबीरा” की ‘खुदगर्ज़ी’ सुनकर आँखें छलक जाती हैं; “पल पल दिल के पास” सुनकर इक धड़कन रुक जाती है…. 
“ऐ मेरे वतन के लोगों” को सुनकर अब भी देशभक्ति जाग जाती है
“हम्मा हम्मा” पर अब भी पैर थिरकते हैं, 
और ‘तम्मा तम्मा’ पर होंठ मुस्कुराते हैं…

कितने सारे धुन आये, और कितनो ने इनको शब्दों से संवारा, अपनी आवाज़ दी…..ज़िन्दगी बदल गई हमारी इन्हें सुनते-सुनते, ज़िन्दगी सवंर भी गई हमारी इन्हें सुनते-सुनते …

अतरंगी यारी है ये, रगबत की कहानी है ये.
 
…शुक्र है, कुछ रिश्ते कभी नहीं बदलते….

वो कहते हैं ना…”तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं, तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन ज़िन्दगी तो नहीं…”

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