मौन क्यों हो महात्मा , जग सवाल करता है। सामने कोई नहीं है ,मानव खुद से ही डरने लगा

Rakesh kumar
Sep 5, 2018 · 2 min read


मौन क्यों हो महात्मा , जग सवाल करता है
कौन से चिंता में डूबे , मग सवाल करता है

अपनी बात अपने पास रखो , कोई नहीं कहता है
बाँट दो गम सारे अपने , जो हर कोई सहता है


उड़ना चाहता था गगन में , सुन चूका था, गीत मधुर सारे
मिलना चाहता था समंदर से , देख चूका था, वचन कटु सारे

कहाँ का पता था तुम्हारे पास , आये नहीं अभी तक
पूछना मुनासिब नहीं समझा , गए नहीं अभी तक

आये क्यों थे इस जगह पर , कुछ याद भी है तुम्हे
बताया नहीं उन्होंने मुझे , प्रतिपालक जाना जिन्हे

भरोसा गैरो पर था खुद से ज्यादा , हार होनी थी
समाज पूछता क्यों नहीं है उनसे , कहानी जिनकी थी

भूल कर भुला देना आदत नहीं , पुछा मगर, जानना चाहा नहीं
सोचो की कौन करता है शिकायत सबकी , कोई समझता नहीं


नहीं मुश्किल है फैसला लेना , आगे बढ़ना और बढ़ते जाना
कई एक बार तो कई लोग , भूल जाते पीछे मुड़ कर देखना

खोने लगा जब अस्तित्व , अंधेरा है घिरने लगा
सामने कोई नहीं है ,मानव खुद से ही डरने लगा
१०
हज़ारों सपने देखे , हर सपने पर मिटने को तैयार था
कमीं उसी में थी , दुनिया मिटाने को तैयार मगर था


Originally published at hindikavitagram.blogspot.com.

Welcome to a place where words matter. On Medium, smart voices and original ideas take center stage - with no ads in sight. Watch
Follow all the topics you care about, and we’ll deliver the best stories for you to your homepage and inbox. Explore
Get unlimited access to the best stories on Medium — and support writers while you’re at it. Just $5/month. Upgrade