सत्यपथ कल्पना ने जीना सिखाया

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छुपकर कहाँ तक पहुँच पाओगे 
 कभी तो किसी के सामने आओगे 
 २ 
 छोर नहीं इसका कोई है 
 यहाँ मित्र कोई नहीं है
 ३ 
 पराजित मन अंतर ढूँढ़ता है 
 पुराने गीत अब कौन सुनता है 
 ४ 
 निश्चय ही यह कठिन घड़ी है 
 अब विश्राम की किसको पड़ी है 
 ५ 
 जाते हो तो कुछ बनकर आना 
 बदला हुआ कुछ नया दिखाना 
 ६ 
 हिम्मत और सबूत दोनों साथ नहीं है 
 मुझसे सच कहो डरने की बात नहीं है 
 ७ 
 सितारा अब रोज़ यहीं चमकता है 
 धुरी अपनी मगर रोज़ बदलता है 
 ८ 
 कृतघ्न बनकर कौन जीना चाहता था 
 बाह्य-अंतर का अन्तर समझना था 
 ९ 
 निर्विरोध मत कुछ रास नहीं आया 
 सत्यपथ कल्पना ने जीना सिखाया 
 १० 
 आगे अँधेरा पीछे गहरा कुहरा है 
 सच अपना आज अँधेरे में छुपा है


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