घर से मुश्किल से दस मीटर की दूरी पर एक छोटा सा जंगल , उसके अंदर छोटी सी इंसानी बस्ती और इस जंगल के किनारे एक छोटी सी मज़ार.

कई नए नए अपार्टमेंट उग आए हैं जंगल के इस किनारे पर . अपार्टमेंट की तरफ आने के लिए मुड़ते ही सड़क छोटी सी गली में तब्दील हो जाती है, और शहर पीछे छूट जाता है . आए दिन छोटे बच्चे वहाँ दौड़ते भागते खेलते नज़र आते हैं, आम ईमली के दिनों में पेड़ों पे पत्थर फेंकते और जो थोड़े मज़बूत और बड़े बच्चे वो पेड़ो की डाल पर बैठे!! कभी कभी कुछ बड़े भी अपनी बोतल और खाना अपनी कांख में दबाए वहाँ आ बैठते हैं , पेड़ के नीचे सोते लोग, भरी दोपहरी मे. देखकर ही सुकून और जलन दोनो ज़िंदा हो उठते हैं अपने अंदर . इंसान बड़ा विचित्र जीव है !!

जॅंगल, हर मौसम में अपनी आवाज़ो, रंगों और खुश्बुओं से अपनी मौज़ूदगी का अहसास करवाता रहता है . ज़िंदगी थोड़ी धीमी लगती है शहर के इस कोने में , आबादी का जो हिस्सा यहाँ दिखता है वह शहरी थोड़ा कम और इंसानी ज़्यादा लगता है .

मज़ार किसी पीर फकीर की , पता नहीं कितनी पुरानी, पर गाँव के लोग उसकी साफ सफाई और रख रखाव करते रहे हैं. होली दीवाली के दिनों में रंग रोगन और ईद में चादर चढ़ा जाते हैं . सफेद और हरे रंग से रंगने और बिजली के छोटे बल्ब से सजने के बाद मज़ार नई सी हो जाती है, मौत के ऊपर खड़ी मज़ार पे ज़िंदगी के रंग बिखर जाते हैं जैसे बूढ़ी दुल्हन सोलह सिंगार किए बैठी हो ! छोटे बच्चों का ख़तना, दुआ पढ़ता हुआ कोई जोड़ा और बस यूँ ही बैठे हुए कुछ लोग, औरतें, सब उस मज़ार का हिस्सा से लगते हैं, और ज़िंदगी यहाँ मौत को मात देती हुई दिखाई देती है. लोग अपनी श्रद्धा और विश्वास लेकर आते हैं, दुआ पढ़ते हैं मज़ार के चारो ओर घूमते हैं, चादर चढ़ाते है, और बैठकर थोड़ा समय बिताते हैं, इन क्षणों में बड़े पवित्र लगते हैं वे सब, कहीं झुका एक सिर, और दुआ के लिए उठी एक जोड़ी आँखें बड़ी ताक़त देते हैं .

बीच जंगल में बना किसी पीर फकीर का मज़ार, जिसकी हड्डियाँ कीड़े कुतरकर खा चुके हैं, अक्सर क़हक़हे, हँसी और इंसानी ज़िंदगी का केन्द्र बन जाता है, कुछ घंटों के लिए ही सही ! पता नही कौन दफ़न है उस मज़ार के नीचे, कैसी ज़िंदगी जी उसने, ऐसा क्या कर दिया उसने कि आज भी, उसके मरने के बाद लोग लोग अपनी कुंठाएं, आकांक्षाएँ, सपने और तकलीफें इतने विश्वास से उसे सौंप जाते है. कितनी रातों का चैन है, एक छोटा सा उपेक्षित मज़ार ! कितनी ज़िंदगियाँ वहाँ आकर एक छोटी से दुआ के बाद थोडा सा विश्वास - कठोर सी ज़िंदगी से दोबारा लड़ने का विश्वास अपने साथ वापस लेकर जाती हैं! और कैसे हैं ये लोग, कितनी हिम्मत है इनमें जो अपनी ज़िंदगी के छोटे बड़े झमेले, तकलीफ़ मुसीबत और मौत तक को ऐसी ही दुआओं के सहारे लड़ने की हिम्मत पा जाते हैं !

शामें अक्सर बाल्कनी में गुज़रती हैं, वहाँ मेरे पौधे हैं, Leo है, और दूर नज़र आती छोटे छोटे बिजली के रंगीन बल्बों की रोशनी से नहाई, दिन भर की दुआओं और मन्नतों को अपने काँधे पे उठाए, रहस्यमयता की चादर ओढ़े, झींगूर की आवाज़ों के बीच ठहरी हुई मज़ार, जैसे समंदर के बीच लंगर डाले रुका कोई जहाज़ ! चुपचाप बैठी देखती हूँ तो लगता है, मज़ार की ख़ामोशी मेरे भीतर उतर आई है और दिन को विराम मिल गया है . होली और दीवाली के दिन जगमगाता, बच्चों की किल्कारियों से गूँजता, कभी औरतों की चिल्ल पों से गुलज़ार, लोबान की खुश्बू से महकता मज़ार रात होते ही चुप, अकेला सो जाता है — पर फिर भी जगा रहता है, दिखता रहता है, किसी ऐसे इंसान के लिए, जो कभी नींद की बग़ावत से बेचैन कहीं कोई ज़िंदगी ढूंढता होता है, जब दुनिया सो चुकी होती है और सन्नाटा खटकता है, तब जंगल के बीच खड़ा छोटा सा टिमटिमाता मज़ार साथी बन जाता है .

कभी सोचती हूँ क्या मिलता है उस मज़ार को देखने से मुझे . पूजा, मंदिर, मस्ज़िद, चर्च मेरी समझ में अब नहीं आते, कोशिश भी नहीं करती, मंदिरों में जाती हूँ तो वहाँ इंसानों, और मंदिरों की बनावट ही देखती रहती हूँ . थोथा आडंबर और कमज़ोर लोगों को हांकने की साजिश ! पर जब वहाँ श्रद्धा में झुके सिर देखती हूँ, बुदबुदाते होठों की आशा देखती हूँ तो सिर्फ़ इंसान नज़र आता है - कोरा इंसान . बिना किसी छल और लगावट बनावट के आवरण में लिपटा — इंसान, नन्हे से बच्चे सा, सहारा ढूंढता इंसान, जो भीड़ में कोई हाथ ढूंढता है और विश्वास पाता है किसी मज़ार, किसी मंदिर और किसी चर्च में !

क्या हक़ है हमें उनसे उनका विश्वास छीन लेने का ? समाधान तो हमारे पास भी नहीं है, समाधान न भी मिले पर सहारा तो मिलता है ! ज़िंदगी — बड़ी मनहूस और भद्दी शक्ल वाली ज़िंदगी को ऐसे ही छोटे छोटे विश्वासों के सहारे खींच ले जाते हैं , न जाने कितने हो लोग . क्या अपराध है उनका ? इंसान होना ? इंसान जो अपनी छोटी छोटी कमज़ोरियाँ छिपा ले जाता है, अपने छोटे छोटे स्वार्थों के लिए जद्दोजहद करता है, छोटे छोटे सुख दुख हैं जिसके . मोटी मोटी किताबें , बड़े बड़े सिद्धांत, परिभाषाएं , टीवी न्यूज़ चॅनेल, अख़बारों के पन्ने उससे उसकी ये उम्मीद भी छीन लेने को बेचैन !

कभी कभी सोचती हूँ क्या फ़र्क है मेरे और उन लोगों में जो वहाँ दुआ माँगते हैं ! मैं — जिसे ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार करने में जद्दोजहद करनी पड़ती है, और एक वो लोग हैं जो अपना बहुत कुछ एक दुआ के हवाले करने की हिम्मत और जज़्बा रखते हैं. कौन ज़्यादा डरा हुआ है, वो या मैं ?

नकार और विद्रोह में जो ताक़त है , उसमें एक दंभ, एक अहंकार भी तो है . ज़रूरी तो नहीं ये ताक़त हर किसी के पास हो, पर क्या ताक़त का होना ही मानव के अस्तित्व और उपस्थिति को परिभाषित करता है ? और ताक़त भी कैसी, जो देश काल और परिस्थिति के हिसाब से बदल जाती है ! क्या सहजता ही जिंदगी जीने की ज़्यादा महत्वपूर्ण शर्त नहीं होनी चाहिए ? क्या सतत, अनवरत यात्रा ही जीवन की सबसे पहली और आख़िरी सच्चाई नहीं है ? अपने गंतव्य की ओर, आकार या निराकार की ओर , मूर्त या अमूर्त की ओर ! यात्रा के प्रति ईमानदारी ही तो एकमात्र शर्त होती है ! हम कौन हैं किसी की ईमानदारी को नापने तौलने वाले, सही ग़लत का फ़ैसला करने वाले !

ईश्वर की सत्ता में उनका विश्वास एक विचार ही से तो उपजता है, और ईश्वर जैसी किसी सत्ता पर अविश्वास भी तो एक विचार ही है अपने आप में . एक ही सिरा नही होता किसी धागे का, किसी भी सिरे से चलें क्या फ़र्क पड़ता है, यात्रा होती रहे क्या ये अधिक ज़रूरी नही ?

‘राह पकड़ तू एक चलाचल पा जाएगा मधुशाला’. अनायास ही ये पंक्तियाँ मुखर हो उठी हैं मेरे भीतर.

चैन तो हम दोनों ही पाते हैं वहाँ , अपने अपने कारणों से . कहाँ के सवाल और कहाँ के जवाब ! इंसान तो इंसान ही है, या वो मज़ार में दुआ माँगता हुआ हो या दुआ को नकारता हुआ .

बहरहाल, अभी कल ही देखा वहाँ एक लाल रंग की तख़्ती लगा दी है लोगों ने . कुछ लिखा हुआ है उसमे सफेद रंग से, पढ़ने की कोशिश नहीं की मैने .

बच्चे तो अब भी दिख रहे हैं खेलते, औरतें भी! पर क्या पता कब तक.

पास जाकर देखने का साहस नहीं हैं मुझमें !