गुरु-शिष्य परंपरा
ज्ञान दीप से कर रौशन
अपने शिष्यों का जीवन
उन्हें सत् मार्ग दिखलाते हैं
तभी प्रभु से भी ऊँचा दर्जा
स्वयं प्रभु से वह पाते हैं
शत्-शत् नमन है उनको आज
जो शिक्षा की अलख जगा कर
स्वयं दीपक सम रह तम में
अशिक्षा अज्ञानता की तोड़ बेड़ियाँ
जगमग जीवन कर जाते हैं
जन्म दे,संस्कार से सज्जित कर
माँ प्रथम गुरु बन जाती है
फिर ज्ञान मार्ग पर उन्हें बढ़ाने
सद्गुरु चरणों में लाती है
आगे जीवन के हर सोपानों पे
सद्गुरुजन ही राह दिखाते है
जो गुण ज्ञान से कर सुशोभित
आदर्श व्यक्तित्व गढ़ पाते हैं
गुरु-शिष्य परंपरा की ये रीत
संस्कृति की पहचान है अपनी
जहाँ संतान से ऊपर शिष्य का दर्जा
और प्रभु से पहले गुरु आते हैं
पर आज हो रही धुमिल कहीं
वो परंपरा जो थी मिसाल
वर्तमान परिपेक्ष्य में अब
गुरु शिष्य दोनों हैं बदले से
रिश्ते पहले से कहाँ रहे अब
कहीं शिष्य तो कहीं गुरु
नित मर्यादा अपनी खोते हैं.......
फिर वह स्वर्णिम गौरव लौटाने
इस रिश्ते का सम्मान बचाने
शिष्य गुरु दोनों को अपना
इक-इक कदम बढ़ाना है
शिक्षा बस व्यवसाय बने ना
ऐसा कोई जतन लगाना है
ले संकल्प इसी राह चल
तक्षशिला नालंदा का फिर
इतिहास चलो दुहराते है
सारे जग में फिर से अपनी
सांस्कृतिक परचम लहराते हैं...........
-रश्मि