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आज तो सरिता जी को बिस्तर से उठ कर बैठा भी नहीं जा रहा था पूरे बदन में जकड़न सी हो रही थी आंखें भी खोलने की इच्छा नहीं हो रही थी । उन्हें ऐसा लग रहा था मानो अब उनके जाने का समय नजदीक आ गया । वैसे भी अब तो उनका यही काम ही रह गया था, चुपचाप तनहाई में अपनी मौत का इंतजार करना...... पिछले पाँच सालों से वह इस वृद्धाश्रम में रहती आई है इन पाँच सालों में चार साल उन्होंने बस इस इंतजार में बिता दिए कि उनका बेटा और बहू उन्हें यहां से अपने साथ ले जाएंगे। तरह तरह के झूठे दिलासे अपने आपको वह देती रहती। बेटे-बहू ना सही पोते-पोतियों का तो मन जरूर करता होगा अपनी दादी से मिलने का और वह जरूर उससे मिलने आएंगे या लेने भी आ सकते हैं ........ सुबह से रात इन्हीं बातों को बोलते वह बिता देती थी ।वहां पर बाकी लोग भी उन जैसे ही थे। बेशक सब आपस में मिलकर खुश रहने की कोशिश करते थे पर हर आँखें अपनों को ढूंढती रहती ।सबको इंतजार था कि कभी तो उनके बच्चे उन्हें आकर ले जाएंगे या कम से कम मिल जाएंगे, पर उन सब का इंतजार अंतहीन था। जिन्हें अपने मां बाप को साथ रखना होता वह उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ेंगे क्या ......कभी नहीं। परंतु आज के भौतिकवादी समाज में यह दृश्य आम था । एक मां बाप मिलकर या कभी-कभी अकेले भी कई बच्चों को पाल पोस कर उनका जीवन बनाकर उन्हें अपने रास्ते लगा देते हैं पर उन बच्चों को मिलकर भी एक मां एक बाप या मां-बाप दोनों को रखना उनके सामर्थ्य का नहीं होता । बेशक बड़े-बड़े बंगले हैं उनके, कोठियां हैं पर वृद्ध मां बाप के लिए एक कोना मयस्सर नहीं होता । आखिर कहाँ जा रहा है हमारा समाज...... सबकी अपनी-अपनी कहानियाँ हैं, किसी के बच्चे विदेश चले गए, किसी के बच्चे हैं ही नहीं और किसी के बच्चे ने सब कुछ अपने नाम करवा कर उन्हें यहां लाकर छोड़ दिया।
सरिता जी भी उन्हीं में से एक थीं। उनके साथ भी यही सब हुआ ।दो बेटे दो बहुएं और उनका भरा पूरा परिवार सब कुछ था उनके पास पर नहीं था तो मां के लिए समय जगह, प्यार, अपनापन, कुछ भी तो नहीं था ।बेशक सालों उन्होंने उनका इंतजार किया,उन से उम्मीदें रखी पर अब उन्होंने अपने मन को मना लिया । वह जान गई थी कि अब उनके बच्चों को उनसे कोई सरोकार नही इसलिए वह उन्हें लेने कभी नहीं आएंगे। जब आप अपनी परिस्थिति के अनुसार पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं तो फिर न शिकायत रहती है ना दुख । वैसे भी सरिता जी किस से क्या शिकायत करतीं । उन बेटों से, जिन्हें दुनिया में लाने के लिए जाने कितने पाप बटोरे उन्होंने ,या फिर उस ईश्वर से जिसके फैसले कि उन्होंने खुले हाथों अवहेलना की..... तो फिर वह दुख क्या मनाएंगी। आज बस संताप है उनके मन में जो कुछ उन्होंने बोया वह फसल तो काटनी ही थी न।अब सरिता जी को लगने लगा है कि उनका अंत नजदीक है और जैसे-जैसे इंसान का वक्त खत्म होने लगता है वह स्वयं अपने अगले पिछले कृत्यों का हिसाब करने बैठ जाता है ।सब कुछ शीशे की तरह साफ हो जाता है ।आज सरिता जी भी अतीत की यादों में खो गई पाँच भाई बहनों में सबसे छोटी थीं वह।उस जमाने के हिसाब से घर में लड़के लड़कियों में भेदभाव तो उन्होंने बचपन से ही देखा । लड़कों को पढ़ाना लिखाना आवश्यकता थी पर लड़कियों को नहीं, उन्हें तो दूसरा घर भेजना था। चूल्हा-चौका कर ले यही बहुत था। फिर अपने सामर्थ्य के अनुसार उन्होंने सरिता जी की शादी करा दी। सरिता जी मिडिल पास थी, पतिदेव अभी पढ़ाई कर ही रहे थे दो देवर थे घर में उनके पति की कोई बहन नहीं थी। सास अपने बर्ताव से अपने पद को पूर्णतया परिभाषित करती थी । उस जमाने के हिसाब से पति घरेलू मामलों से बिल्कुल निर्लिप्त रहते थे। बड़ा गुरूर था उनकी सासू मां को बेटों की मां होने का । बड़े गर्व से अपने किस्से वह बताती कि अपने परिवार में बेटों की वजह से उनका कितना रुतबा रहा । बेटियां तो मान घटाती हैं, बाप की पगड़ी उतरवा देती हैं बेटियाँ ......ये सोच उनकी सास की थी तो एक आगे की पीढ़ी की सोच में भी कुछ ज्यादा फर्क नहीं आया था।
जब वह माँ बनने वाली थी तभी से उनके दिमाग में उनकी सासू मां ने यह घुट्टी बिठा दी थी की बेटे की मां होने से इज्जत बढ़ती है और बेटी पैदा करने से मान घटता है अब वह भी दिन रात बस बेटे की मां बनने का ही सपना देखती तीसरा महीना लगते ही उनकी सासू मां का अपने बेटे को आदेश हुआ कि उन्हें ले जाकर यह जांच करवा लिया जाए कि वह बेटे को जन्म देने वाली है या बेटी को बिचारी अपना मान सम्मान पाने की आस में सब कुछ सहर्ष करने को तैयार हो जातीं पर उनकी खुशियों पर तुषारापात तब हुआ जब जांच में गर्भ में लड़की होने की पुष्टि हुई । घर की सारी खुशियां धरी की धरी रह गई पर यह वह लोग थे जो काल को अपने अनुसार मोड़ने का भ्रम पाले रखते थे। तुरंत यह निर्णय लिया गया सरिता जी का गर्भ गिरा दिया जाए भला ऐसे गर्वीले खानदान की नाक बेटी पैदा कर नीची करनी थी क्या ? सरिता जी को उस अजन्मी बेटी से थोड़ा बहुत तो मोह हो ही गया था,पर वह क्या करती.... अपने घर में अपना मान सम्मान बनाए रखने के लिए बेटे की मां बनना जरूरी था और उसके लिए यह बलिदान करना भी जरूरी था और इस तरह उनके खानदान को कहीं नीचा न देखना पड़े ,इस डर से उस अजन्मी को जन्म लेने ही नहीं दिया गया। घर के किसी सदस्य को देख कर ऐसा लगता ही नहीं था कि उस घर में कोई मौत हुई ह,ै हालांकि सरिता जी कभी कभी उसे याद कर दुखी हो जाते आखिर तीन महीने उसे महसूस किया था उन्होंने।
पर इससे क्या फर्क पड़ता है । फिर कवायद शुरू हुई मां बनने की इस बार तो पहले से ही कई तरह के मान-मनौव्वल तंत्र मंत्र सब कुछ आजमाया गया फिर जल्दी ही सरिता जी ने खुशखबरी सुनाई। इस बार तो सास बहू दोनों आश्वस्त थी कि पक्का बेटा ही होगा सरिता जी से लाड़ लड़ाते वे ना थकतीं । पर होनी तो कुछ और थी एक बार फिर उन सारी प्रक्रियाओं से उन्हें गुजरना पड़ा और इस बार फिर उन्हें निराशा हाथ लगी। पहले तो जी भर सरिताजी और उनके खानदान को सासूजी ने कोसा फिर बिना झिझक उसी जघन्यता की तैयारी हो गई । डरते डरते इस बार सरिता जी ने थोड़ा विरोध भी जताया , सासू मां से मिन्नते भी कीं कि शायद ईश्वर की यही इच्छा है कि उनके आंगन में एक बेटी खेले पर यहां उनके भावनाओं की कोई कदर नहीं थी । भला सालों से चली आ रही परंपरा को उनकी भावनाओं पर यह कैसे कुर्बान कर देते , कुर्बान तो उसे होना था जो शायद उन जैसी सोच वालों के लायक ही नहीं थी .......एक के बाद एक दो बहनें अजन्मी उस खानदान से रुखसत कर दी गईं ।
सरिता जी तन और मन दोनों से कमजोर हो चली थी पर इससे क्या फर्क पड़ता है, उन्हें तो खानदान का वारिस चाहिए था ऐसे या वैसे। सरिता जी को पता था अगर वह बेटे को जन्म नहीं देंगी तो उनकी सासू मां को थोड़ी भी देरी नहीं होगी अपने बेटे का दूजा ब्याह रचाने में। वहां कद्र इंसानों की नहीं थी इंसानी भावनाओं की नहीं थी ,झूठे ठसक की थी। अब की बार शायद ईश्वर को उन पर या शायद उन अजन्मी देवियों पर करुणा आ गई कि इस बार उन्होंने उसकी कोख में बेटे को भेज दिया। पूरे घर में रंगीनियाँ छा गईं। एक ही ईश्वर की कृति होते हैं बेटे और बेटियां,फिर उनमें ऐसा अंतर क्यों करता है इंसान?? कैसी विडंबना थी दो दो बेटियों को मारकर उनके तनिक शिकन न आई और उस अजनमे कुलदीपक क आने की खुशी में जश्न हो रहा था। कहते हैं औरत करुणा की मूरत होती है पर जब औरत अपन स्त्रीत्व से गिर जाती है तो फिर वह पुरुषों से कई गुणा क्रूर और संवेदनहीन हो जाती है।तभी तो दहेज हत्या हो या भ्रूण हत्या सब के पीछे मुख्यतया औरतों की ही भागी दारी होती है।यहाँ भी तो अबतक हुए अमानवीय कृत्यों को सरिता जी की सास ने ही अंजाम दिया।मन से या मजबूरन ,मूक सहमति तो उनकी भी थी ही वर्ना एक माँ अपने बच्चे के लिए तो किसी से भी टकरा जाती है। बेटे की माँ बनने की खुशी में जो मान सत्कार उन्हें मिल रहा था उसके आगे वह गम फीका था।कुछ ही महीने में एक हृष्ट-पुष्ट बेटे की माँ बनकर वे सातवें आसमान पर थीं।घर में खानदान में पति ,ससुरालवालों,सबकी नजर में उसका रुतबा बढ़ गया था। सास के ताने प्यार मनुहार में बदल गये थे।जाहिर है इतना सब पाने के लिए वो कीमत कुछ भी नहीं थी उसकी और उसके घरवालों की नजर में, जो उसने चुकाई थी। दो वर्ष बाद ही वह फिर से एक पुत्ररत्न की गर्विता माँ बनी।अब की बार शायद ईश्वर को भी हिम्मत न रही उनके पाषाणहृदयी कुचेष्टाओं को चुनौती देने की।
समय अपनी गति से बढ़ता रहा।इतने प्रपंच से पैदा हुए उन नौनिहालों का लालन-पालन भी उसी नफासत से हो रहा था।दिन बीतते गये।जैसे-जैसे दोनों चिराग बड़े होते गये उनके नाज नखरे बढ़ते गये।सरिताजी के सास-ससुर अब बूढ़े हो चले थे उनमें अब पहले वाली ठसक नहीं रह गयी थी।उनका स्थान अब सरिताजी और उनके पति ने ले लिया था और उन्हें पूर्णतया हाशिये पर रख छोड़ा था।समय का चक्र यूं ही चलता है सबका पद,स्थान बदलता रहता है पर जब वह अपने सर्वोच्च पद पर रहता है तो बिलकुल भूल जाता है कि कल वहाँ कोई और आएगा। फिर जब उसे सत्तामुक्त किया जाता है तभी वह इस सत्य को समझ पाता है पर तबतक बहुत देर हो चुकी होती है।यही सरिताजी के साथ भी था।दो योग्य बेटों की माँ होने का गुरूर उन पर उम्र के साथ हावी होता गया।बेटों की पढ़ाई लिखाई पर भी जी खोलकर खर्चा किया था उन दोनों ने।बेटे भी अच्छे निकले पढ़ाई में तो नौकरी भी अच्छी मिली उन्हें।कुल मिलाकर सब अच्छा चल रहा था जीवन में।एक बेटे ने तो अमेरिका की राह ली दूसरा उसी शहर में रहा । नौकरी उसकी कुछ खास नहीं थी पर अपने ही घर में रहने के कारण खर्चे कम थे उसके।अब तो सरिताजी असली बेटे की माँ के किरदार में आ गयीं थीं।रोज कोई न कोई उनके बेटों के लिए रिश्ते लेकर आने लगा।बड़े चाव से कुछ एक फोटो छांट कर उन्होंने बड़े बेटे को भेजा पर जो जवाब आया उससे उनके सारे अरमान चकनाचूर हो गये।उसने अपनी जीवनसंगिनी को चुन लिया था बस विवाह की औपचारिकता शेष थी जो उसके भारत आते ही पूरी करने की योजना थी।अब यहाँ उनकी मर्जी हो या नहीं उससे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था।आते ही चट मंगनी पट शादी होटल में संपन्न हो गयी।इस शादी से तो उनके सब अरमान धरे के धरे रह गये,न दान दहेज, न मन माफिक बहू, न लड़के वाले होने का रौब रुतबा........बेटा बहु सब रस्मों की खानापूर्ति कर कुछ ही दिनों में वापस चले गये।बहू से तो एक दिन भी ढंग से बात भी न हुई तो लगाव क्या होता।उसकी भी इन लोगों में कुछ खास दिलचस्पी न थी,उसका तो पूरा खानदान ही वहीं बसा हुआ था तो भारत आने की कोई ललक भी न थी।बेटा भी पूरी तरह वहीं का होकर रह गया था। अब सब आस छोटे से थी।उसकी शादी अपनी पसंद की लड़की से की, सारे अरमान पूरे किए उसकी शादी में।बहू पर भी बड़ा प्यार लुटाती।शुरु में तो सब ठीक रहा पर धीरे-धीरे जबरन चढ़ाई चाशनी की परत घुलती जा रही थी।बड़े बेटे को तो अब न देश न घर किसी में दिलचस्पी रह गयी थी, वह पूरी तरह वहीं का होकर रह गया।भाई की शादी में भी अकेला बस एक हफ्ते के लिए आकर चला गया।छोटा चालाक था , खुद तो कुछ खास कमाता था नहीं तो बड़ी चालाकी से मीठा मीठा बोलकर ,पिता के स्वास्थ्य का हवाला देकर धीरे-धीरे घर, दुकान सब अपने नाम करा लिया।बहू भी खूब मीठा मीठा बोलती और धीरे धीरे पूरा घर अपने हिसाब से चलाने लगे और अब देखते ही देखते सरिता जी और उनके पति बस मेहमान की तरह कोने में रह गए । परेशानी तो तब शुरू हुई जब उन्हें छोटी-छोटी चीजों के लिए और जरूरतों के लिए उसी बेटे-बहू के सामने हाथ फैलाना पड़ता बदले में दस बातें भी सुननी पड़ती । शानो-शौकत से जीवन जीने के आदी उन दोनों के लिए ऐसा अपमानित जीवन जीना दुश्वार था। भीतर भीतर गम के साए में उनके पति जो सोए तो कभी उठे ही नहीं । अब तो सरिता जी का जीवन और भी दुश्वार हो गया था कितने चाव से बहु चुन कर लाई थी इतनी जल्दी उसी बहू ने उन्हीं के घर में उनकी कोई हैसियत में रहने दी। पिता की अंतिम क्रिया तो दिखावे के लिए खूब धूमधाम से हुई । दो दिन के लिए बड़ा बेटा और बहू भी आए और चले गए। उनका कहना था कि जब सबकुछ छोटे ने लिया है तो माँ की जिम्मेदारी भी वही संभाले । एक तो पति के जाने का गम ऊपर से बेटे-बहू का ऐसा व्यवहार सरिता जी दिन रात घुलती रहती थीं ...... न वो किसी से अपनी मन की बात कर पाती न किसी से दुख साझा कर सकती थीं।आज मुझे एहसास हो रहा था शायद एक बेटी होती उनकी तो कम से कम अपना दुख तो साझा करती उससे, पर उस वक्त बेटे की मां बनने के जुनून में उन्होंने खुद बेटी से पल्ला झाड़ लिया था......
उन्हें याद आता कि कैसे उनके यहां नवरात्रि की पूजा होती थी धूमधाम से मां की स्थापना कर कन्याओं का पूजन होता था और मन्नत क्या मांगी जाती थी,कि भगवान उन्हें बेटा दे और उसी घर में जहां दुर्गा की पूजा करते थे वे लोग वहीं दो दो बेटियों की नृशंस हत्या .......ऐसे भक्तों की पुकार क्यों सुनेगी भला ???? पर दे दिए उन्होंने दो बेटे और जी भर कर उसका सुख(?) भी भोग लिया उन्होंने पर अभी उनकी सजा की अवधि कहां खत्म हुई थी । इस जीवन में अभी उन्हें और भी बहुत कुछ देखना था।अब उस घर में उनकी वजह से दिन रात कलह होती। दो रोटी भी खाने को मिलती तो अपमानित होकर और अंततः बेटे और बहू ने उन्हें यहां इस आश्रम में ला छोड़ा । हालांकि वहां की लानत भरी जिंदगी से यहां गैरों के बीच रहना ज्यादा अच्छा था। फिर भी अपने कितना भी बुरा करें हम उन्हीं के साथ रहना चाहते हैं,इसलिए कहीं ना कहीं वह अपने बेटों का इंतजार करती रहती थी पर देखते देखते पाँच साल बीतने को आए पर एक बार भी कोई उनसे मिलने नहीं आया ।अब उनकी सारी आशाएं दम तोड़ चुकी थी...... तन मन सब खोखला हो गया था परंतु शिकायत भी नहीं थी किसी से क्योंकि जो पाप उन्होंने किया था शायद उसी का भुगतान था यह। ये एहसास उन्हें दिन-रात और मौत के करीब ले जा रहा था।
आज फिर से अपने अतीत में जीकर उनका मन शांत हो गया था और कुछ ही पलों मे उनकी आत्मा ने भी उस नश्वर शरीर से भी विदाई ले ली । शाम में मुक्तिधाम में उनका अंतिम संस्कार आश्रम के लोगों द्वारा किया जा रहा था , एक लावारिस की तरह ........दो बेटों की गर्विता माँ की ये परिणति थी...........
-रश्मि