सजा

जैसे-जैसे रक्षबंधन का त्योहार नजदीक आ रहा था ,संजना की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।कहाँ तो पहले बाजार में राखियाँ आईं नहीं कि उसकी खरीदारी शुरु हो जाती थी।सस्ते महंगे की तो उसे परवाह ही न थी।माँ कितना भी समझाती कि जरा राखी नजदीक तो आने दो फिर दाम भी नीचे आएँगे पर वो कहाँ मानने वाली थी।वो कहती "अरे माँ संजना के भाई के हाथ में सबसे स्पेशल राखी सजेंगी।बाद में सस्ते जो मिलेंगे वो तो बचे-खुचे होंगे न।" सिर्फ राखियाँ ही नहीं और भी कहीं तैयारियां होती थी उसकी,जैसे कपड़े ,चॉकलेट,मिठाईयाँ और कुछ खास तोहफे भी।ज्यादातर चीजें वो अपने बचाए पैसों से ही खरीदती थी। अक्षत(संजना का भाई) को भी इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता।घर भर का दुलारा तो था ही पर संजना की तो बस जान बसती थी उसमें।जहाँ भी जैसे भी अपनी जेबखर्च से बचा पाती तो बस उसी के लिए कुछ न कुछ खरीद लाती। दोनों भाई बहन की जान इक दूजे में बसती थी।माँ अकसर कहती तेरे दहेज में अक्षत को ही भेज दुंगी।
और संजना भी हंसकर कहती ,"बिलकुल मैं तो शादी ही उससे करुँगी जो मेरे अक्षु को भी रखेगा"......।अक्षत भी बहन से चिपक कर कहता, "हाँ हाँ मैं तो दीदी के ही साथ ही रहुँगा।"ऐसे ही हँसते खेलते साल दर साल निकल गये।
 अब तो संजना अपनी पढ़ाई खत्म कर एक कॉलेज में पढ़ाने लगी।पर ये बीते हुए साल उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव लेकर आए।वह कॉलेज में थी तभी उसके पापा की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गयी।पूरे परिवार पर मानों दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।ये ही वो मौके होते हैं जब अपनों परायों की पहचान भली-भांति हो जाती है।इन लोगों से भी जल्द ही आनन-फानन सब रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया।खैर माँ-बेटी का संघर्ष और पिता की जमापूंजी सब मिलाकर घर वापस पटरी पर आ गया।संजना मेधावी छात्रा थी ।उसने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ ट्यूशन भी पढ़ाना शुरु कर दिया था।जल्द ही उसके पास काफी संख्या में बच्चे पढ़ने लगे जिससे घर चलाना माँ के लिए आसान हो गया था।अक्षत को तो उन्होंने किसी कमी का अहसास तक नहीं होने दिया।पढाई खत्म करते ही उसी शहर के प्रतिष्ठित कॉलेज में व्याख्याता बन गयी।
 वो दिन थे और आज का दिन है।संजना पुरानी बातों से आज पीछा नहीं छुड़ा पा रही थी।उस दिन जब अक्षय ने कॉलेज आने जाने के लिए बाइक की मांग की तो माँ ने साफ मना कर दिया पर संजना ने कुछ बचाए पैसे और किश्त भुगतान कर उसे उसकी मनपसंद बाइक दिला दी।वह उसे पिता की कमी नहीं महसूस होने देना चाहती थी। उसकी पढ़ाई का भी वह पूरा ध्यान रखती।शहर के नामी कोचिंग संस्थान से कोचिंग करके वह बी.टेक करने दूसरे शहर चला गया।उसके खर्चे बढ़ते जा रहे थे।वह बीच बीच में फिजुलखर्ची के लिए उसे टोकती भी पर वो हजार बहाने गिना देता।इधर माँ दिन-रात उसके लिए रिश्ता ढूंढने में लगी थी।पहले तो संजना ने साफ मना कर दिया था शादी करने से पर फिर माँ के बहुत ऊँच-नीच समझाने पर वह तैयार तो हो गयी पर अपनी शर्तों पर।शर्तें भी ऐसी जो हमारे वर्तमान पुरुषवादी समाज में तो कोई मानेगा ही नहीं।हमारे समाज में आज लड़कियाँ बेशक पुरुषों के बराबर या ज्यादा भी कमा रही हो पर लड़के वालों की मानसिकता कहाँ बदली है।कमाऊ बहू भी चाहिए और दहेज भी।ऐसे में भला संजना को कौन अपने घर की बहू बनाता जिससे दहेज मिलना तो दूर उसकी शर्त थी कि शादी के बाद भी जबतक अक्षत आत्मनिर्भर नहीं हो जाता उन दोनों की पूरी जिम्मेदारी वही उठाएगी।अब ऐसी अपवाद सोच वाला पुरुष और परिवार कहाँ मिलते हैं सो माँ तो निराश ही हो गयी थी । पर संजना की किस्मत में उसके जैसा ही अपवाद सोच वाला भला मानस था ,जो कब चुपके से उसके जीवन में घुसकर उसकी जिम्मेदारियाँ साझी करने लगा उसे खुद पता नहीं चला।उसे तो संजना की सारी शर्तें,जिम्मेदारियाँ, परेशानियाँ सब शिरोधार्य थीं।माँ, अक्षत सब उसकी अच्छाइयों के और स्वभाव के कायल थे।
 बस सबके आशीर्वाद से चट मंगनी पट शादी हो गयी।अजय बेहद नेक और संवेदनशील इंसान था।माँ बाप के प्यार से वंचित उसे भी मानो भरा पूरा परिवार मिल गया।अजय बिलकुल अकेला था और छोटा सा घर किराए पर लेके रहता था इसलिए शादी के बाद माँ के आग्रह करने पर वो उनके घर में रहने को राजी हो गया इससे संजना को बेहद सुविधा हो गयी। दिन तेजी से बीतते गये,अब माँ और अक्षय की पूरी जिम्मेदारी संजना के साथ मिलकर अजय निभा रहा था।कुछ ही दिनों अक्षत आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे शहर चला गया।माँ के पास तो बेटी दामाद थे ही ।समय पंख लगाकर उड़ता रहा ।इस दौरान संजना प्यारी सी बेटी की माँ बन गयी।उधर अक्षत की पढ़ाई पूरी होते होते उसकी एक अच्छी कम्पनी में नौकरी भी लग गयी।सबकी खुशियाँ देख माँ ईश्वर का धन्यवाद देते न थकती।अबतक घर की सारी जिम्मदारियाँ संजना ही उठा रही थी।अब अक्षत कमाने बेशक लगा था पर उसकी खुद की ख्वाहिशें ही उसके वेतन पर भारी थी तो वह घर के खर्चे कहाँ उठाता।दूसरी ओर संजना और अजय ने हमेशा उनसब को अपनी ही जिम्मेदारी समझा।संजना ने बेशक अपने शौक अरमानों पर पर्दा डाल उसकी हर इच्छा का ध्यान रखा पर अक्षत को हमेशा लगता कि पिता के न होने के कारण उसका जीवन बलिदानों से भरा है।दूसरी तरफ माँ को लगता कि बेटी ने तो अपने सारे अरमान उस घर पे न्योछावर कर दिया है तो जल्दी बेटे की गृहस्थी बसे जिससे उनके प्रति संजना की जिम्मेदारियाँ कम हो और वो अपने जीवन में आगे बढ़े।इसी मंशा से उन्होंने अपनी सहेलियों को बोल रखा था कि अक्षत के योग्य लड़की बताएँ,पर व नौबत आती इससे पहले ही अक्षत एक दिन निशा को उनसब से मिलाने ले आया।दरअसल वे एक दूसरे को कॉलेज से ही पसंद करने लगे थे।सो माँ बेटी को उसकी पसंद पर मुहर लगाना ही था। बस बज गयी शहनाई और आ गयी निशा बहू बनकर।शुरुआती दिन तो उनके बहुत अच्छे बीत रहे थे।किचन की जिम्मेदारी से मुक्त बस घूमना ,सिनेमा ,होटल मायके जाना।पर परेशानी तब हुई जब अचानक माँ की तबियत खराब हो गयी।अबतक तो किचन वही संभालती थीं ,बाकी संजना कॉलेज से आकर मदद करती थी।उसे तो अपनी बेटी को भी समय देना पड़ता था सो ऐसे हालात में तो कम से कम उससे अपेक्षा की ही जा सकती थी कि वो सास का ध्यान रखे और किचन थोड़ा बहुत तो संभाले।बस यहीं से बात बिगड़नी शुरु हो गयी।दरअसल उस दिन जब संजना थोड़ी जल्दी फ्री हो गयी तो झटपट घर आ गयी ये सोचकर कि निशा बिचारी अकेली परेशान होगी तो उसकी मदद कर देगी।पर यहाँ तो नजारा ही कुछ और था।माँ हांफती हुई खाना बना रही थी।उनकी हालत ऐसी थी कि वो बार बार थकान और कमजोरी से बैठ जा रही थीं।दूसरी ओर निशा मजे से अपने कमरे में इयरफोन लगा कर फोन पे लगी थी।ये देखकर संजना को बहुत गुस्सा आया सो उसने निशा को समझाया कि उसे भी घर के काम में हाथ लगाना चाहिए।बस इतना कहना ही संजना के लिए पाप हो गया। निशा ने रो-धोकर सारा घर सर पर उठा लिया।वह हैरान देखती रह गयी।इससे भी बड़ा झटका तो उसे तब लगा जब शाम में आकर अक्षत ने भी आकर उल्टा उसे ही सुना दिया।फटी आँखों से देखती रह गयी वो.......ये वही अक्षत था जिसकी उसमें जान बसती थी???ये तो गनीमत थी कि उस वक्त अजय वहाँ नहीं था वर्ना क्या कहती उसे।संजना के परिवार के लिए अपना आत्मसम्मान ताक पर रख वह उस घर में रह रहा था।माँ ने दबी आवाज में अक्षत को असलियत समझानी चाही पर न उसे सुनना था न समझना था।उस पर तो निशा की खुमारी इस कदर छाई थी कि किसी बात का भान न था। उसके बाद संजना ने उसे कुछ भी कहना छोड़ दिया।अगले दिन से वही सामान्य दिनचर्या थी ,पर भीतर ही भीतर बहुत कुछ दरक गया था। माँ की तबियत को देखते हुए उसने पूरे वक्त के लिए आया रख दी जो खाना भी बनाती थी।अब उसे अपने पिता के बनाए उसी घर में घुटन सी होने लगी।निशा के व्यवहार से साफ झलकता था कि वो संजना को पसंद नहीं करती।जब कभी आस-पड़ोस वाले आते तो अकसर उसी की बातें करते कि किस तरह पिता की मौत के बाद उसने पूरे घर को संभाला और माँ और भाई को कोई तकलीफ नहीं होने दी।बस ये सब बातें सुन सुनकर निशा के भीतर संजना के लिए और कड़वापन भर जाता,या शायद हीन भावना से भरकर वो ऐसी प्रतिक्रियाएँ देती थी।जबकि संजना तो इन बातों से अनभिज्ञ अपने दुलारे भाई की पसंद से आई निशा पर उतना ही प्यार लुटाती थी।पर अब उसने धीरे-धीरे खुद को समेटना शुरु कर दिया।गाहे-बगाहे अगर कभी अक्षत भी पुरानी बातों का जिक्र छेड़ कर दीदी की तारीफ कर देता तो तुरंत उसके चेहरे के भाव बदल जाते और किसी भी बहाने सारा आक्रोश अक्षत पर उतारती।
 ये सब माँ भी बखूबी समझ रही थी बस कुछ कह नहीं पाती थी।इसलिए जब संजना ने बेटी का स्कूल दूर होने का बहाना कर अलग दूसरे घर में रहने का फैसला सुनाया तो प्रतिवाद किसी ने नहीं किया।बस अक्षत के लिए ये वज्रपात जैसा था क्योंकि वह तो निशा के मोहिनी रुप का कायल था ,भीतर का विकृत चेहरा तो न देखा न महसूस किया था।या किया भी था तो उसे गलत सही समझाने की परिस्थिति में नहीं था।खैर कुछ ही दिन में वो दूसरे घर में शिफ्ट हो गयी।माँ ऊपर से तो सामान्य थी और बेटी के लिए खुश भी पर अंदर उनके कुछ बिखर रहा था। दोनों माँ-बेटी अपने अपने दुख को दबाने की असफल कोशिश कर रही थीं। बीच-बीच में जब समय मिलता वह माँ से मिल आती।सारा कुछ करने के लिए कामवाली थी तो माँ को थोड़ा आराम था पर अब उम्र भी स्वास्थ्य पर हावी हो रहा था।फिर तन के रोग से मन का रोग पहले मारता है,वही उनके साथ हो रहा था।अक्षत का बिलकुल निर्लिप्त रहना निशा की मनमानी को और बढ़ावा दे रहा था।घर में रहते हुए घर का कोई काम हाथ न लगाना,बस हर बात में बहस करना यह दिनचर्या थी उसकी।ऊपर से उसके मायके वालों की अनावश्यक टीका-टिप्पणी यहाँ तक कि उन्हीं के घर में आकर उन्हें नसीहत देती कि क्या करना चाहिए क्या नहीं।धीर-धीरे अक्षय की खुमारी उतरी तो वह निशा को कुछ टोकता भी तो लड़ाई शुरु हो जाती।फिर हर बात की कसर वह सास पर निकालती।बेचारी शायद पति के जाने पर भी इतनी दुखी नहीं हुई होगी जितना अब थी।ऐसे ही में एक दिन संजना से बात करते हुए वह रो पड़ीं तो संजना से बर्दाश्त न हीं हुआ।उसनेअक्षय से बात की ये कहकर कि कुछ दिन मेरे पास रहने दो।मान तो वह तुरंत गया पर उसके चहरे की उदासी और बेचारगी देख संजना का मन भर आया।कैसी दूरी हो गयी कि न वह अपनी प्यारी दीदी से खुल कर बात कर पा रहा था न माँ स्वरुपा बहन उसे अधिकार से डांट पा रही थी।क्यों ये नये रिश्ते पुराने और गहरे रिश्तों को इतना बेजान कर देते हैं।पर दूसरे ही पल उसे अक्षत पर क्रोध भी आया ।आखिर ऐसी भी क्या बेबसी।गलत बातों को चुपचाप सहना उसे बढ़ावा देने जैसा ही है और ऐसा करने वाला भी उस गलती में बराबर का शरीक कहलाता है। आखिर बात बात में अपने मन की करवा लेने वाला उसका सरचढ़ा भाई इतना मजबूर क्यों हो गया था कि गलत को रोकना तो दूर उसे गलत कह तक नहीं सकता। हमारे समाज को पुरुषप्रधान माना जाता है तो ऐसी स्थिति में अगर कोई स्त्री है तो भी उसकी लाचारी कुछ हद तक समझी जा सकती है ,खासकर तब जब वो आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर न हो।पर लड़के क्यों ऐसे हो जाते हैं एक रिश्ते के पीछे बाकी सारे पुराने रिश्तों से कैसे अन्याय कर सकते हैं वे।बाकी तो फिर भी ठीक है पर माँ-बाप?????कम से कम उन्हें तो इस तराजू में न तौलें।पर यही हो रहा है आजकल। खैर संजना अपनी माँ को अपने घर ले आई।उस घर में कौन खुश हुआ कौन गम में डूबा पता नहीं पर नन्ही रिया तो नानी को देखते ही खुशी से नाचने लगी।संजना भी इतने दिन बाद माँ का साथ पाकर बहद खुश थी।पर माँ .....एक तरफ बेटी के घर पूरा मान सम्मान पर बेटे से बिछड़ने का गम हावी हो रहा था,पर उपाय भी क्या था।अक्षत को तो कितनी बातों का अंदाजा तक न था जो बहु के हाथों उसकी माँ को झेलना पड़ रहा था। वो बीच-बीच में मिलने आता रहा पर अपने घर चलो ये कहने का साहस नहीं था उसे।चपल वाचाल अक्षत गुमसुम रहता।पर कौन था इन सब का जिम्मेदार.....पूरी तरह न सही पर काफी हद तक वह स्वयं जिम्मेदार था इन परिस्थितियों का।
 फिर आया रक्षाबंधन का त्योहार जो दोनों भाई-बहन को सबसे अजीज था।संजना सब कड़वाहट भूल कर तैयारी में लग गयी,भाई भाभी दोनों के कपड़े,राखियाँ,मिठाईयाँ.....सबकुछ।दोनों को बारी बारी फोन करके आने का निमंत्रण दिया।दोनों आए भी।अक्षत माँ को घर चलने की जिद करने लगा,इस बार निशा भी आग्रह कर रही थी तो माँ तैयार हो गयी उनके साथ जाने को।संजना ने भी नहीं रोका क्योंकि उसने भले प्यार और आराम से माँ को रखा था पर जीवन के इस तीसरे प्रहर में अपने घर में रहने क लालसा तो थी उन्हें भी।
 बस वही आखिरी कदम थे माँ के उस घर में।संजना की आँखों से आँसू ढुलक पड़े। फिर कुछ अच्छा हुआ भी कहाँ आगे।रिश्ते इस कदर परत दर परत नंगे होते चले गये कि हर रिश्ते से भरोसा उठने लगा था उसका।कैसे यकीं करती वो माँ की बातों पे।वह बार-बार माँ को समझा रही थी कि जरुर उसे समझने में गलती हुई होगी ,अक्षत किसी हाल में माँ को धोखा नहीं दे सकता पर माँ तो अपनी ही बात पर अड़ी थी।बात ही कुछ ऐसी थी की यकीं कोई न करे फिर संजना तो अक्षत पर आँख मूंद कर भरोसा करती थी। फिर घर में उसकी भी जान बसती थी।हुआ दरअसल ये कि अक्षत के घर माँ के जाने के बाद हर हफ्ते तो माँ से वह मिल ही आती थी ,सब सहज सामान्य दिखता था बल्कि निशा का अब उसे प्रति पहले से ज्यादा अपनापन दिखता था ।संजना ये सोचकर खुश हो जाती कि चलो उम्र के साथ समझदार हो रही है।अक्षत तो खैर हमेशा दीदी को देख खिल उठता।रोज शाम में एक बार माँ से बात भी हो जाती थी।यानि सब सामान्य तरीके से चल रहा था कि एक दिन वह कॉलेज में ही थी कि माँ का रोते हुए फोन आया।वह घबरा कर उसी वक्त माँ के पास भागते हुए पहुँची।वो अकेली थीं घर में। फिर जो उनहोने बताया ये सुनकर तौ उसके पैरों तले भी जमीन खिसक गयी। उसके बेटे-बहू ने धोखे से पॉवर ऑफ अटॉर्नी पर साइन करवाकर फिर उस घर का सौदा कर लिया था जिसमें उन सब की जान बसती थी।बस इसलिए कि निशा को पॉश इलाके के आधुनिक साज-सज्जा वाले फ्लैट में रहने की तमन्ना थी जिसे अभी खरीद पाने की आर्थिक स्थिति नहीं थी अक्षत की।संजना को तो मानो काठ मार गया।माँ को मुश्किल से चुप कराया उसने और अक्षत को फोन करके तुरंत घर आने को कहा।उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये वही उसका भोला अक्षत है जो उसकी हर बात मानता और हरेक बात उसे बताता।वह पागलों की तरह घर की दीवारें निहार रही थी।कैसे-कैसे पाई-पाई जोड़कर पापा ने वो घर बनाया था।जब उसे ऐसा लग रहा है तो माँ पर क्या बीत रही होगी।वो तो वैसे ही निढाल पड़ी थीं।तभी वो दोनों आए। उन्हें तो पता ही नहीं था कि माँ ने उनकी बातचीत सुन ली थी।संजना ने जब इस बारे में पूछा तो उसके चेहरे का रंग बदलने लगा।शायद कुछ शर्म अब भी बाकी बचा था उसमें इसलिए बेशर्मी से जवाब दे नहीं पा रहा था तो मोर्चा उसकी बीवी ने सम्भाला।आखिर" शांति निवास"का अंतिम संस्कार उसी की ख्वाहिशों को परवान चढ़ाने के लिए हो रहा था न।बड़ी बेशर्मी से उसने कहा,"चलिए अच्छा हुआ वैसे भी हम जल्द ही बता देते।क्या करते मजबूरी थी बताते तो माँ साइन थोड़ी न करती।और फिर नये घर में वो भी तो रहेंगी।ये भी कोई जगह है, इस सोसाइटी में अपने फ्रेंड्स को बुलाने में भी शर्म आती है।"माँ के जीते जी उसके मंदिर को तोड़ने की सोची कैसे तुमने अक्षत ???? कम से कम उसके मरने का ही इंतजार कर लेते" पर अक्षत के पास जवाब था ही नहीं तो देता कहाँ से। पर निशा की बेहयाई पूरे शबाब पर थी,"आखिर कल को तो ये सब हमें ही मिलना था फिर इतना अच्छा सौदा पटता या नहीं कौन जाने। ऐसे भी जब तक नया घर नहीं मिलता रह लें जी भर इस मंदिर में"।
 संजना के मन में आया कि एक झन्नाटेदार तमाचा लगा दे निशा को।पर उस पर क्या हक था उसका।जिसके जीवन को दिशा देने के लिए उसने अपने सारे शौक अरमान ताक पर रख दिए थे आज उसने भी उसे उस हक से मरहूम कर दिया था। माँ पापा संजना सबके बलिदानों का ये सिला दिया था उसने।निशा से तो अब किसी शिकायत की गुंजाईश ही नहीं थी।वो अक्षत जिसके जीवन में आते ही माँ पापा ने जाने क्या-क्या सपने देखे थे।वो अक्षत, जिसकी सारी जिम्मेदारी उठाने में वो अपने उम्र की लड़कियों से यकायक कई साल बड़ी हो गयी थी।वो अक्षत 
जिसने ऐसे समय पिता को खो दिया था जिसके बाद अमूमन घर बिखर जाता है पर उसे तो माँ और बड़ी बहन ने कुछ पता तक नहीं चलने दिया।वो अक्षत ऐसा कर सकता है। क्या एक रिश्ता निभाने के लिए बाकी सारे रिश्ते की कुरबानी देते वक्त उसकी आत्मा ने धिक्कारा नहीं उसे। जिस निशा की मनमानी पूरी करने के लिए वह माँ की संजोई यादों की राख पर महल बना रहा है उस महल में नींद आएगी उसे चैन की? शायद आ जाएगी क्योंकि ऐसा करने के पहले उसे अपनी आत्मा को पूरी तरह मारना पड़ा होगा।फिर जब आत्मा ही मर गयी तो उस छह फुट की काया को कैसा अपराधबोध?????
 संजना खुद को संभालती हुई माँ की ओर मुखातिब हुई,"चल माँ अब तुम मेरे साथ रहोगी। वैसे भी तुम्हें अपने पास लाने का प्रयोजन इनका पूरा हो चुका ,अब किसी काम की नहीं तुम इनके लिए।" उसने एक नजर उन दोनों पर डाली फिर चल पड़ी माँ के कमरे की ओर उनका सामान पैक करने।उसने देखा निशा की आँखों में कोई भाव नहीं थे पर अक्षत की झुकी पनीली आँखें उसकी बेचारगी दर्शा रही थी।आज तो घिन हो आई उसे अक्षत पर। कमरे में गयी तो माँ पीछे-पीछे आ गयी।बेटा अब जितने दिन बचे हैं मुझे जी लेने दे इसमें।इसके हर कोने में तेरे पापा और तुमसब मुझे नजर आते हो।इस बार मेरी बात मान ले।माँ की याचना भरी आँखें देख वह रो पड़ी।कैसे इस हालात में यहाँ जी पाएगी तू माँ?पर अपने भीतर के तूफां को भरसक छुपाते हुए व संजना को आश्वस्त करती रहीं कि बस वह अपने घर में शांति से जीना चाहती हैं।मजबूर होकर भारी मन से वह अपने घर लौट आई।घर आकर उसे लगा मानो उसने माँ को तभी खो दिया।वह हर हाल उन्हें अपने साथ रखना चाहती थी। पर माँ की उस इच्छा का भी मान रखना था उसे। पर जीवन के इस पड़ाव पर लाडले से मिले इस गहरे जख्म का भरना आसान न था।धीरे-धीरे नासूर बन कर वही जख्म उन्हें गलाता गया।वैसे भी शरीर पर लगे जख्म भरना आसान है पर हृदय पे लगे का उपचार मुश्किल था। संजना हर हाल समय निकाल कर माँ के पास आकर काफी देर रहती ।पर वो तो पाषाण तुल्य निर्विकार हो गयीं थी।जिस रिया को देख वो भी बच्चा बन जाती थीं अब उसके होते भी चुपचाप रहती।कहीं न कहीं अक्षत की आँखों में कभी कभी अपराधबोध भी नजर आता था ,इसलिए अपनी तरफ से माँ का पूरा ध्यान रखने की कोशिश करता।पर जो वह कर गुजरा था क्या उसे बदलना आसान था।माँ की आत्मा पर धोखे से घात किया था उसने जिसकी माफी जुबानी माँ दे भी देती तो भी उसकी आत्मा ऐसा न कर पाती।किसी के धोखे,अपमान सब कुछ इंसान भूल सकता है पर जिस पर सबसे ज्यादा भरोसा हो वही जब धोखा दे तो उससे उबरना मुश्किल है। दूसरी तरफ निशा थी जिसे कोई फर्क नहीं कोई सरोकार नहीं था इन बातों का।सच है एक बार अपने जमीर को मार लो तो जीना बहुत आसान हो जाता है, वही था उसके साथ। धीरे-धीरे माँ ने खुद को अपने कमरे में कैद कर लिया था।चुपचाप रहती बस सारी पुरानी चीजें निकाल कर उलटती-पुलटती रहती।माँ की खातिर एक बार फिर वह ढीठ बनकर उस घर में आकर रहने लगी । हर जतन किया उसने माँ को सामान्य करने के लिए पर असफल रही।फिर एक दिन चुपचाप वो इस दुनिया से रुखसत हो लीं।
 सब खत्म हो गया.........। पत्थर बनकर वो तेरह दिन काटकर अपने घर लौट आई संजना।घुटन होने लगी थी उसे मृत्योपरांत हो रहे आडंबरों को देख-देख कर।पर अब उसका मन शांत था क्योंकि माँ ने उस असीम वेदना से मुक्ति पा ली थी जो उसके ही अंश ने दी थी। आज कॉलेज से लौटते वक्त रास्ते में लटकी राखी की लड़ियाँ देख कर सारी पुरानी बातें ताजा हो आईं। पांव स्वतः उस दुकान की ओर बढ़े फिर जाने क्या सोचकर वह लौट गयी वापस।
 बहुत बेचैनी में कटे कुछ दिन फिर वह दिन भी आया जिसका पहले महीनों इंतजार करती थी।आज किसी काम में मन नहीं लग रहा था।अनमनी सी वह देर से उठी।अभी चाय बनाने जा ही रही थी कि दरवाजे की बेल बजी। खोला तो सामने अक्षत खड़ा था मिठाई और गिफ्ट लेकर।वह समझ नहीं पा रही थी क्या करे।उसने तो अक्षत के नाम की राखी खरीदी ही नहीं।भाई को सामने देख जमाने भर की ममता उमड़ पड़ी उसकी, जी चाहा गले लगाकर खूब रोए, स्नेह करे पर दूसरे ही पल वो सारा मंजर आँखों में तैर गया। वो धोखा,फरेब, वो माँ का तिल-तिल मरना.........सब कुछ। कितने ही भाव उसके चहरे पर आए गये फिर एक शांत मगर कठोर भाव आकर ठहर गया।बड़े संयत शब्दों में उसने कहा...."माफ करना अक्षत अब शायद मैं तुम्हें कभी राखी नहीं बाँध पाऊँगी। माँ का दिल बहुत बड़ा होता है उसने शायद तुम्हें माफ कर दिया हो पर मैं इतनी महान नहीं कि तेरा पाप भूल जाऊँ। हाँ, क्षमा गल्ती की होती है जो अन्जाने होती है पर पाप का प्रायश्चित होता है या सजा।मेरी तरफ से तुम्हारी यही सजा है कि हर राखी तेरी कलाई सूनी रहेगी।जब मुझे लगेगा कि तेरी सजा पूरी हो गयी तो मैं स्वयं आऊँगी राखी लेकर तेरे उस आशियाने में जिसके लिए तूने उस मंदिर को नीलाम कर दिया"।ऐसा कहकर वह अंदर चली गयी। अब कहीं कुछ कहने सुनने की गुंजाइश नहीं थी। उड़ते परदे से थके कदमों से लौटते अक्षत की झलक दिख रही थी। उसकी सजा की अवधि आज से शुरु हो गयी थी। दूर कहीं रेडियो में गाना बज रहा था - भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना..................

-रश्मि