बिहारी या बाहरी

मुझे नहीं पता है कि बिहार इस बार के चुनावों के नतीजों के बाद जागा है या नहीं। कुछ लोग तो यह भी कहेंगे कि हम तो सोये ही नहीं। पर मुझे उम्मीद है की बिहार जागेगा। एक छोटी सी कहानी बताना चाहूँगा। जब मैने अपनी पढ़ाई ख़तम कर रहा था, तो बैंगलोर में सॉफ्टवेयर इंगिनीर्स की बड़ी धूम थी। लोग पैसा कमा कर आते थे और खर्च किया करते थे। ऐसी गर्मी, मैंने पहले भी एक बार देखी थी। वह दौर अलग था। १९९२-९५ के बीच अचानक रांची में कुछ लोग पूंजीपति हो गए, रातों-रात। स्कूटरों पर चारा चुरा चुरा कर। मुझे मालूम है, की कुछ मित्रों को यह बात पसंद नहीं आएगी। पर थोड़ा झाँकने की जरूरत है। कुछ समझ में विषमता आ गयी थी, कुछ बदल गया था। और सामाजिक न्याय के नाम पर घोटाला करने वाले राजनेता एक छोटे बच्चे की संवेंदना को क्या समझ पाएंगे।

बहरहाल, मैं दुखी हूँ, पर अब कोई अचम्भा नहीं होता। रांची अब बिहार में नहीं है, थोड़ा बदल गया है, पर बहुत सारा काम बाकी है। काम सच पूछिये तो कुछ हुआ ही नहीं। कई बार मैं सोचता था की बिहार से अलग होना झारखण्ड के लिए सही नहीं रहा। कारण — नीतीश कुमार। वे काबिल प्रशाशक लगे मुझे। पर अंत में ऐसा लगा की वो एक बेहतर राजनेता हैं, और इस बार के चुनावी नतीजे इस बात का प्रमाण भी हैं। उम्मीद है की वह बिहार तो आगे ले जायेंगे, क्योंकि वहां मेरे पुरखे पैदा हुए, वहीँ मेरे पिता का जन्म हुआ, वहीँ के कोशी के बलान, गंडक और गंगा की नदियों के पानी में वे नाव से वे स्कूल भी गए। सत्तीघाट स्कूल पर उनके चाचा जी ने बहुत साल नौकरी की और परिवार का पोषण किया। मेरे पितामह और दादी तो छोटे में ही पिता को अकेला छोड़ गए थे। उनका देहांत टाइफाइड की वजह से हुआ था — कोई इलाज नहीं था। यह बात शायद १९५५ की है। मेरे पिता जीवित हैं, और अच्छी सेहत में हैं, पर वो अब बिहार नहीं जाते। उनका मन नहीं लगता है वहां, मैं भी नहीं जाता। तो क्योंकि

१९५५ के ५० साल के बाद, नितीश जी ने स्वास्थ्य की सुविधाएं कुछ ठीक करायीं। उनका धन्यवाद्। उम्मीद है की मेरे पितामह की तरह किसी जवान, घर के अकेले कमाने वाले सपूत की मृत्यु ना हो जाये। किसी बच्चे को अब नाव पर स्कूल ना जाना पडे। और शायद गाँव के लोगों को बाढ़ के बाद ३ महीने तक लौकी पका कर ना खाना पड़ेगा।

अगर आप १९५५-२००५ के काल खंड को देखें, तो आपको पता चलेगा, की बाकि राज्यों की तरक्की ज्यादा हुई है। कुछ धोका होता रहा है इस राज्य के साथ. बिकार के महान सपूत राजेंद्र प्रसाद भारत के राष्ट्रपति तो बने हैं, जेपी ने भारत को नई दिशा दी पर शायद हर एक बिहारी का कार्य क्षेत्र बिहार के बाहर ही रहा है। बाकी के देश ने, शायद ग्रामीण परिवेश, गरीबी और अति साधारण बात-चीत के तरीकों की वजह से लगभग नीचे के पॉयदान पर ही रखा है। बिहार की स्थिति कुछ ठीक नहीं रही है बीते हुए कुछ सालों में, वाम दलों ने गरीबी का इस्तेमाल कर, एक तरह की धारणा का संचार किया और कुछ हद तक उनको सफलता भी मिली है। अगड़ों और पिछड़ों की लड़ाई अगर कहीं मुखर कर आई है तो वह बिहार में। सामंतवाद का अंत भले ही बिहार में हुआ हो, पर कर्णाटक जैसे राज्य में, ऐसा कुछ नहीं हुआ। मुझे लगता है की भूदान के बावजूद, कर्णाटक में ज्यादा सामंतवाद पाया जाता है । कई सामाजिक अन्वेषक कहते हैं, कि बिहार सामाजिक न्याय बताती रही है, देश केइ लिए एक उदाहरण है। मैं नहीं जानता। कुछ २० साल पहले मैं अपने मौसी के गाँव गया था। पिछले साल मौसा जी के देहांत के बाद फिर से गया था। आश्चर्य की बात है, कि कुछ नहीं बदला था। इतने साल के बाद आप किताब के पन्ने को भी फेरेंगे, को वो हल्दी के रंग की मिलेगी, गुलाब की कलि सूखी हुई मिलेगी। पर गाँव में कोई बदलाव नहीं था। सड़क थी — पहले से थोड़ी बेहतर। नितीश जी — आपका धन्यवाद्। शराब की दुकानें बहुत सारी थीं।

बिजली। मैं और कई बिहारी आपके आभारी। पर ऐसा क्यों? एक बार पर्दा हटा कर देखने की जरूरत है। पता लगेगा की बिहार के माह पुरूषों के सोच की बहुत कद्र हुई, पर उनके शक्ति एवं सामर्थ्य से, बिहार का विकास कभी नहीं हुआ। समाज का सुधार सिर्फ समाज का सुधार कर नहीं किया जा सकता है। समाज को नै दिशा की ऊर्जा मिलनी चाहिए। एक उदाहरण के तौर पर — हमारे ऑफिस में, कोई किसी से यह नहीं पूछता की आप — ब्राह्मण हैं या ओबीसी. क्योंकि कर एक साथी, अपनी बुद्धि की वहस से हमारे साथ है, और वह हमारा उतना ही आंकलन कर रहा है, की जितना हम उसका। बिहार को ऐसा कोई काम नहीं मिला, कोई कार्यक्षेत्र ही नहीं मिला जहाँ समाज के अलग वर्गों को एक साथ काम करने को मिला हो। रांची, बोकारो, सिंधरी जैसी जगहों पर सरकारी कंपनी ने विषमता को खरतम करने में कुछ हद तक सफलता प्राप्त की है। जब बच्चे एक साथ खेलते हैं, तो उनको यह नहीं पता होता है की कोई कायस्थ है या कुर्मी। पर बिहार को चाणक्य का राज्य बताने वाले यह राजनेता इस तरह के किसी प्लेटफार्म को लाने में असफल रहे हैं। तो अब अगर बिहार को बिजली मिली है तो आभार प्रकट करना जरूरी ही है। बिहार अलग राज्य है — मुसहर को सुब-ह्यूमन बताया गया है। वह १९९० और २००० के दशक में, दूसरो के साथ, बैठने में डरते थे। इसलिए, शायद वहां बिजली, पानी और सड़क नहीं थीं।

धीरे धीरे, बिहारी चले गए बाहरी बनने, और बिहार में रह गए १९५०-१९९५ (गरीब और मंडली) नारों से प्रभावित / उत्साहित और गरीब लोग।

क्या कहा जाये, वही बिहारी जब बाहरी होता है, तो २०० किलो की बोरी उठा लेता है, पर अपने खेतों में हल चलाने से कतराता है। उसके राजनेता उसको मजबूर करते हैं, उसको बिजली नहीं मिलती, सिंचाई की व्यवस्था नहीं हो पाती। शहर की सुविधा न दें, अस्पताल न खुले, बच्चे न पढ़ें, महिलाएं अशक्त रहे. मुझे नहीं लगता की सच्चाई में बिहार में कोई बदलाव आया है। दिल्ली में रिक्शा वाला, कोलकाता में टैक्सी वाला और कूली, दक्षिण में हर एक गगन चुम्बी इमारत में, काम करने वाला बिहारी, बाहरी बन गया है। क्योंकि बिहार में उसकी जरूरत नहीं है। और अब वह मेरे पिता की तरह बाहरी ही रहना चाहता है। उसने गरीबी और भूख को देखा है, और अब वह अपनी ग्लानि को हर महीने पैसे भेजकर, पी सकता है। नज़र तो मिला नहीं सकता क्योंकि अब वह बाहरी है। कुछ सालों में वह छठ के महीने में ट्रैन के धक्के कहना बंद कर देगा, शिव सेना की लाठियों को चुप छाप खा कर, वह अपने यथार्थ को मान कर आहे बढ़ जायेगा। कल की सोच कर। क्योंकि जिस कल की कल्पना उस बाहरी ने की है, वह बिहारी बन कर नहीं पायेगा। बिहारी समझो गालियों की सूचि १९९० के दशक से जुड़ गया। जो इस ग्लानि को नहीं पी पाते हैं, उनको शराब और अन्य चीज़ों ने पी लिया है।

अब अगर इस बिहार के चुनाव का कुछ देर अँधेरी कोठरी में बैठ कर मंथन करें, तो लगेगा की अब शायद कुछ नहीं हो पायेगा। राजनेता उन्हें गरीबी पर मजबूर कर, उनको अपना — वोट बैंक, आदमी, समाज, पिछड़ा, अति-पिछड़ा बता कर रखेंगे। पत्रकार उनके इस साहस की तुलना जेपी की सोच से करेंगे, वाम धरना को प्रसारित करने वाले बुद्धिजीवी उनको फ़ासी मोदी का अंत भी बताएँगे। चूँकि चुनाव में निर्णायक निर्णय आया है। यह एक सच है। एक सच तो यह भी है — अंतहीन गरीबी, और वह रहेगा बिहारी। अगर सवाल पूछना है, तो यह पूछिए कि — तमिल नाडु की तरह बिहार की सड़कें क्यों नहीं? कर्णाटक और आंध्र प्रदेश, की तरह उच्च शिक्षा का इंतज़ाम क्यों नहीं हुआ? और यह १-२ साल की बात नहीं है। सोचिए और जरूर सोचिये।

मैं नहीं जानता की बिहार की नींद कब टूटेगी, पर जब चुनाव बाद जागेंगे तो सोचना होगा, की अब क्या बाहरी आएगा बिहारी बनने?

- बाहरी

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