कहानी हिंदी दिवस की

चौदह सितंबर! जिस तरह किसी मनुष्य के अपने जीवन में कुछ तिथियाँ महत्वपूर्ण होती हैं, उसी तरह किसी देश के इतिहास में भी कुछ तिथियाँ महत्वपूर्ण होती हैं। हम अपने जीवन की ख़ास तारीखों को भी उत्सव की तरह मनाते हैं, इतिहास की ख़ास तारीखों को भी राष्ट्रीय उत्सवों के रूप में याद किया जाता है। 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्तूबर — भारत के इतिहास की वे महत्वपूर्ण तिथियाँ हैं जिन्हें हम स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गांधी जयंती के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर उत्सव के रूप में मनाते हैं। इसी तरह की एक और महत्वपूर्ण तारीख है — 14 सितंबर। इसे ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

क्या महत्व है 14 सितंबर का? इसे ‘हिंदी दिवस’ क्यों कहते हैं? इसे किस रूप में मनाया जाता है? इसे मनाना क्यों जरूरी है? इन सवालों का उत्तर देने के लिए हमें अपने देश के इतिहास में झाँकना होगा।

वैसे तो सरल शब्दों में यों कहा जा सकता है कि 14 सितंबर 1949 ई. को हिंदी ने भारत की ‘राजभाषा’ का पद प्राप्त किया इसलिए उस दिन को ‘हिंदी दिवस’ के रूप में जाना गया। पर इस जवाब से तो नए सवाल खड़े हो गए। ‘राजभाषा’ किसे कहते हैं? कोई भाषा ‘राजभाषा’ का पद कैसे प्राप्त करती है? हिंदी राजभाषा क्यों बनी? कैसे बनी? तो आइए, इन सवालों के जवाब खोजें।

जिस भाषा के माध्यम से शासन-प्रशासन के काम अर्थात राजकाज चलाए जाते हैं, उसे राजभाषा कहते हैं। भारत में एक जमाने में राजकाज संस्कृत और दूसरी पुरानी भाषाओं में होता था। जब शासन पर विदेशियों का कब्जा हुआ तो फारसी और अंग्रेजी भारतीय जनता की भाषाएँ नहीं थी, इसलिए वे शासन करने वालों की भाषा के रूप में सम्मानित तो हुईं लेकिन आम लोगों के जीवन का हिस्सा नहीं बन सकीं।

यहाँ यह भी याद किया जा सकता है कि हमारा देश भाषाओं के अजायबघर की तरह है। इस देश में सदा ही अनेक प्रकार की विविधताएँ रही हैं लेकिन उन्हें जोड़ने वाली एकता भी सदा रही है। हमारे यहाँ अलग अलग क्षेत्रों में लोग जिन भाषाओं को अपने परिवार में ‘मातृभाषा’ के रूप में प्रयोग करते हैं, उनकी संख्या 1652 है — 1961 ई. की जनगणना के अनुसार। फिर इनकी अनेक बोलियाँ और शैलियाँ भी हैं। पहले संस्कृत और बाद में हिंदी तथा देशकृत अंग्रेजी ने इन सब भाषाओं के बोलने वालों के बीच अखिल भारतीय मान्यता प्राप्त करके संपर्क का काम किया है।

इतनी सारी भाषाओं वाले देश में जब 19वीं शताब्दी में नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रचार की समस्या सामने आई तो जनता के आंदोलन की अखिल भारती भाषा के रूप में किस भाषा को चुना जाए, यह भी समस्या उठी। भारत की सबसे अधिक संपर्कशील भाषा होने के कारण हिंदी ही भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सर्वमान्य भाषा के रूप में खुद-ब-खुद उभरी। इस भाषा के बोलने वाले और जानने वाले तो संख्या में अधिक थे ही, बाकियों के लिए भी इसे सीखना काफी आसान सिद्ध हुआ। इसलिए देश भर में राजनैतिक जागरूकता पैदा करने की दृष्टि से इसे ही सबसे अधिक उपयोगी पाया गया। दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति भारतीय जनता के मन में परायेपन का भाव पैदा हुआ क्योंकि वह विदेशी थी। उसके स्थान पर स्वदेशी भाषा के रूप में हिंदी को भारत भर की भावनात्मक स्वीकृति अपने आप ही मिल गई।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर, केशवचंद्र सेन, दयानंद सरस्वती और भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस तक ने हिंदी को राष्ट्रभाषा का मान दिया। गांधी जी ने राष्ट्रभाषा के पाँच गुण बताए वह कर्मचारियों के लिए आसान हो, उसमें भारत का विविध विषयों का आपसी कामकाज हो सके, उसे ज्यादातर लोग बोलते हों, वह राष्ट्र के लिए आसान हो, उसका विचार दूरगामी प्रभाव की दृष्टि से किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि अंग्रेजी में इनमें से एक भी लक्ष्ण नहीं है और हिंदी भाषा में ये सारे गुण मौजूद हैं। इसी प्रकार नेहरू जी ने प्रांतों के लिए प्रांतीय भाषा तथा अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी को स्वीकार करने पर बल दिया। जब भारत का संविधान तैयार किया गया तो भाषानीति का निर्धारण करते समय स्वतंत्रता आंदोलन के इन तमाम अनुभवों को भी ध्यान में रखा गया।

हाँ, तो जब भारत के आजाद होने के आसार दिखने लगे, तब 1946 में ‘संविधान सभा’ बनी। बाबू राजेंद्र प्रसाद इसके अध्यक्ष चुने गए। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। अगस्त-सितंबर 1949 में संविधान के भाषा विषयक प्रस्तावों और संशोधनों पर व्यापक बहस हुई। मुख्य बहस 12 से 14 सितंबर तक चली। 14 सितंबर 1949 को सायं 6.00 बजे तक भाषा विषयक प्रस्ताव को बहस के पश्चात स्वीकार कर लिया गया। तालियों की भारी गडगडाहट के बीच हिंदी को भारत की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया गया। इससे संबंधित अनुच्छेद भारत के संविधान के 17 वें भाग के अनुच्छेद 343 से 351 तक में सम्मिलत हैं। साथ ही परिशिष्ट में आठवीं अनुसूची के अंतर्गत उस समय 14 प्रादेशिक भाषाओं का उल्लेख राष्ट्र की भाषाओं के रूप में किया गया, जिनकी संख्या अब बढ़कर 22 हो गई है।

हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा देते हुए संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में कहा गया है कि “संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा।” इसके अनुसार हमारी यह संवैधानिक जिम्मेदारी है कि भारत सरकार के राज्यों के बीच कामकाज, संघ और राज्यों के बीच कामकाज, और राज्यों में आपसी प्रशासनिक कामकाज में हिंदी का प्रयोग करें। राज्य स्तर पर हर राज्य को अपनी राजभाषा का प्रयोग करने के लिए अधिकार प्राप्त है।

परंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि संविधान के लागू होने के अनेक दशक बाद भी हम (न तो केंद्र सरकार के स्तर पर, और न ही राज्य सरकारों के स्तर पर) हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की संविधान के द्वारा दिया गया उनका अधिकार व्यावहारिक रूप में प्रदान नहीं कर सके हैं। इसलिए जरूरत है कि बार बार ‘हिंदी दिवस’ के बहाने हम भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के इस लंबे संघर्ष को याद करें। अपनी भाषाओं से जुड़े गौरव को पहचानें। अपने आपको अपनी राष्ट्रभाषा के लिए ईमानदारी से समर्पित करें। हर भाषा के पास अपना दिन नहीं होता। हमारी भाषा हिंदी के पास अपना दिन है। यह दिन राष्ट्रीय महत्व का है। यह राष्ट्रीय पर्व है। इसे जरूर मनाएँ। ‘हिंदी दिवस’ को मनाने का एक ही तरीका है कि हम अपने समस्त कामकाज में हिंदी को अपनाएँ और इससे जुड़े राष्ट्रीय गौरव को समझें-समझाएँ।

वस्तुतः ‘हिंदी-दिवस’ के रूप में चौदह सितंबर को हम राजभाषा के रूप में हिंदी को उसका संवैधानिक अधिकार दिलाने का संकल्प लेते हैं। जाहिर है, हिंदी दिवस संविधान सभा में हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार किए जाने की तिथि 14 सितंबर 1949 ई. से नहीं मनाया जाता, बल्कि जब यह देखा गया कि संविधान के प्रावधान के बावजूद हिंदी को उसके अधिकार से वंचित रखा जा सकता है, तब 10–11 नवंबर 1953 को नागपुर में संपन्न अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा प्रचार सम्मलेन के पाँचवें अधिवेशन में काका साहब नरहर विष्णु गाडगिल की अध्यक्षता में यह प्रस्ताव स्वीकार किया गया कि राजभाषा हिंदी को यथार्थ जीवन में अपने संवैधानिक अधिकार की प्राप्ति होने तक 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ मनाया जाए और यों 14 सितंबर, 1954 को मनाया गया पहला ‘हिंदी दिवस’। बाद में सरकार ने इसे अपने राजभाषा क्रियान्वयन के कार्यक्रम के साथ जोड़ लिया और यह केंद्र सरकार के कार्यालयों की वार्षिक गतिविधि का एक हिस्सा बन गया। उद्देश्य हिंदी दिवस का इतना भर है कि राजभाषा के लिए जिम्मेदार लोग आत्मालोचन करें कि सालभर में कितनी दूर चले हैं और तय करें कि आगे किस दिशा में चलना है। लेकिन अफ़सोस यही है कि सरकारी आंकड़ों और दावों के बावजूद हिंदी की यात्रा ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ भर की है। या यूँ कहें कि राजभाषा क्रियान्वयन माने कोल्हू के बैल का सफर।

इसमें संदेह नहीं कि इन कई दशकों में परिस्थितियाँ बदली हैं और राजभाषा के लिए जिम्मेदार तंत्र ने विभिन्न कार्यालयों में ‘ग’ क्षेत्र तक में बड़ी संख्या में लोगों को (सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को) ‘हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान’ ही नहीं करा दिया है, बल्कि ‘हिंदी में प्रवीणता’ के प्रमाण-पत्र भी दे दिए हैं। इसके बावजूद ऐसा क्यों है कि अब भी राजकाज हिंदी में नहीं चलाया जा रहा है। संघ सरकार के ऐसे सभी कार्यालयों को, जहाँ हिंदी के कार्यसाधक ज्ञान और प्रवीणता प्राप्त कर्मचारी और अधिकारी हों, राजभाषा अधिनियम और नियमों के अनुरूप हिंदी में कार्य करना चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। अनुवाद और रस्म अदायगी के नाम पर की गई कुछ टिप्पणियों के अलावा संघ सरकार के कार्यालयों में हिंदी के पक्ष में वातावरण दिखाई नहीं देता। यह तो प्रसन्नता की बात है कि हिंदी विरोध अब वहाँ उतना मुखर नहीं रहा, जितना झूठे राजनैतिक प्रचार के कारण साठ-सत्तर के दशक में रहा होगा, लेकिन नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं और अधिकारियों को मूलतः हिंदी में काम करने की प्रेरणा देने में अभी तक राजभाषा-तंत्र सफल नहीं हो सका है।

आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी को उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी का अहसास कराया जाए। संविधान का अनुच्छेद 343 इतना अभागा अनुच्छेद है कि सारे संविधान के लागू होने पर भी वह आज तक सही अर्थ में लागू नहीं है। इस अनुच्छेद को निरर्थक बनाने वाले, विधेयकों, प्रस्तावों और अधिनियमों पर आज पुनर्विचार की आवश्यकता है। संविधान-विशेषज्ञों और उच्चतम न्यायालय को इस दिशा में पहल करनी चाहिए तथा देशभर में हिंदी को ‘संघ की राजभाषा’ के रूप में उसका संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए व्यापक जनांदोलन चलाया जाना चाहिए।

सच्चाई यह है कि हिंदी आज राजकाज के प्रत्यक्ष और परोक्ष सभी व्यवहारों के लिए पूर्णतः सक्षम भाषा के रूप में सिद्ध हो चुकी है तथा हिंदीतरभाषी क्षेत्रों में भी स्थित संघ सरकार के कार्यालयों के कर्मचारी और अधिकारी हिंदी के दक्षता के प्रमाण-पत्र प्राप्त कर चुके हैं। इसलिए अब बिना विलंब किए हिंदी को ‘वास्तव में’ संघ सरकार की राजभाषा के रूप में व्यवहृत किया जाना आरंभ करना उचित होगा। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो यह भारतीय संविधान की अवमानना होगी।

यह भी साफ हो जाना चाहिए कि राजभाषा का अर्थ केवल सरकारी कार्यालयों की भाषा के तमाम क्षेत्र भी राजभाषा के अंतर्गत समा जाते हैं। आज हमें राजभाषा की अवधारणा को विकसित करने की जरूरत है। राजभाषा की भूमिका के विस्तार को न समझने से उसकी उपेक्षा होती रहेगी। राजभाषा को कार्यालय या प्रशासन तक सीमित नहीं माना जा सकता। ज्ञान-विज्ञान के सारे क्षेत्र राजभाषा के भी क्षेत्र हैं। व्यवसाय और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी राजभाषा क्रियान्वयन आवश्यक है। इसी प्रकार पत्रकारिता को भी राजभाषा क्षेत्र मानना पड़ेगा। और अब हम इन व्यापक राजभाषा क्षेत्रों को देखेंगे तो हमें पता चलेगा कि भारत के बहुभाषिक यथार्थ का एक सामाजिक पहलू यह है कि इन क्षेत्रों में हिंदी संपर्क भाषा के रूप में जनता की इच्छा से सहज ही व्यवहृत होती रही है, हो रही है। आवश्यकता है इस जनभाषा का दबाव संघ का राजभाषा क्षेत्र भी महसूस करे। वरना यह भी हो सकता है कि कुछ समय पश्चात सरकारी कामकाज की भाषा पत्रकारिता, प्रौद्योगिकी और व्यवसाय की व्यापक जनभाषा से अलग-थलग पड़ जाए। जनसंचार माध्यमों द्वारा यह स्थपित हो चुका है कि हिंदी ही इस देश के व्यापक संवाद की भाषा है और उसमें हर विषय को अभिव्यक्त करने की शक्ति है। इसलिए अब और उसे अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए।

जिन कार्यालयों में हिंदी में कार्यसाधक ज्ञान व प्रवीणता रखने वाले कार्यकर्ता हैं, उनके अध्यक्षों की यह जिम्मेदारी है कि उन कार्यालयों में हिंदी में काम हो। यदी ऐसा नहीं हो रहा है (और वास्तव में ऐसा नहीं हो रहा है) तो राजभाषा संबंधी संसदीय समिति इन कार्यकर्ताओं और अधिकारियों से जवाब तलब क्यों नहीं करती?

और हाँ; सबसे खतरनाक और शर्मनाक बात हैं, मंत्रालयों के स्तर पर हिंदी की उपेक्षा। अब समय आ गया है कि उच्च स्तर पर भारत संघ के मंत्री और सचिवगण हिंदी और केवल हिंदी में कामकाज करने की आदत डालें तथा शेष काम अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं के अनुवादकों को करने दें। उल्टी गंगा बहाने के प्रयास बहुत हो चुके, अब ज़रा संघ सरकार के शीर्ष की गंगोत्री से भी हिंदी की धारा को प्रवाहित होने दीजिए और तब देखिए कि कैसे पूरा देश इसका आचमन करके नई भाषिक स्फूर्ति से भर उठेगा।

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