आज सुबह से ही तबियत कुछ ख़राब लग रही थी। यह लेख पढ़ चित्त अत्यंत प्रसन्न हो गया। बचपन के वह दिन याद आए जब विध्यालय शुरू होने से पहले मैं और मेरा मित्र नियमानुसार पोहे खाने जाते थे। फिर एक दिन पोहे वाले ने बोला “आज आप ‘उसल’ पोहा खाओ”। भियाँ आदरणीय भी थे, हमारे पोषक भी और रुपए की तंगी में सहायक। मना नहीं कर पाए। भियाँ को यह भी मालूम था बच्चों का पहला ‘उसल” है तो उन्होंने क्वांटिटी में कोई कमी नहीं रखी और बार बार परोसे गए उसल से हमारे प्रति अपने स्नेह को रेखांकित किया। वह दिन था और आज तलक मैं वापस उसल पोहा नहीं खा पाया। पर मन पर अमिट छाप रही। उस दिन स्कूल कैसे निकला हमें और हमारे ईश्वर को ही मालूम है।

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    Rishi Sanjay Dashottar

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    reader of stories