वृक्षारोपण: एक ढोंग

और ये ढोंग जरूरी भी है

Rajendra Nehra
Jun 7 · 4 min read

आज थोड़ी हड़बड़ी में घर से निकला। एक महत्वपूर्ण काम था आज, इसलिए लेट नहीं होना चाहता था। मगर नहीं-नहीं करते पांच मिनट तो लेट हो ही गया। सच्चे भारतीय होने का ये कर्तव्य जाने-अनजाने निभाता रहता हूं। ठीक आठ बजकर पांच मिनट पर मैं तय स्थान पर पहुंच गया। मगर ये क्या, यहां तो कोई नहीं था।

दरअसल आज पांच जून है। विश्व पर्यावरण दिवस। अतः वृक्षारोपण का आयोजन किया गया था। सबको तय स्थान पर तय समय, जो कि सुबह आठ बजे का रखा गया था, पर पहुँचना था।

मैंने देखा कि यहां पर पहले से ही कुछ पौधे लगे हुए हैं। पता किया तो पाया कि ये पिछली साल पांच जून को लगाए गए थे। कुछ हरे कुछ सूखे ये पौधे, लग रहा था, किसी के इंतजार में हैं। शायद हमारे ही। इन्हें उम्मीद है कि नए पौधों के बहाने आज पानी नसीब होगा।

खैर छोड़िए। नौ बजने को थे। इक्के-दुक्के लोग आने लगे थे अब। धीरे-धीरे सज्जन लोगों का जमावड़ा सा लग गया। उनकी नवीनतम पोशाकें देखकर मेरी बड़े बालों वाली टांगों में टंगा कच्छा(निकर) शर्म से पानी-पानी हो गया। वैसे इतनी गर्मी में किसी चीज का पानी हो जाना भी कमाल होता है। खैर एक बार फिर छोड़िए… सोचा था पौधे लगाने हैं तो गड्ढे खोदने होंगे, मिट्टी डालनी पड़ेगी, हाथ पांव धूल मिट्टी से सनेंगे, तो निकर में ठीक रहेगा। परंतु यहां तो ठीक विपरीत माहौल बन गया, सेल्फियों का दौर चल पड़ा।

चाय की चुस्कियों के साथ पर्यावरण संरक्षण पर गम्भीर चर्चाओं ने दुपहरी को और भी गरमा दिया। ‘बरगद का पेड़ सबसे ज्यादा प्राण वायु देता है’, ‘और तो और वो रात को भी ऑक्सिजन देता है’, ‘तुलसी भी रात को ऑक्सिजन देती है’, ‘गाय एकमात्र प्राणी है जो ऑक्सिजन प्रदान करता है’, ‘हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार गौमूत्र…’ इत्यादि इत्यादि। इसी बीच मजदूर वर्ग के लोगों ने फावड़े की फाडी ठोककर शुभ कार्य को शुरू करने का संकेत किया, जो कि कब से धूप में खड़े होकर इन महाशयों के पर्यावरण प्रेम को देख रहे थे।

धीरे-धीरे ये सज्जन लोग गड्डों के पास, जो कि पहले से खुदे हुए थे और प्रत्येक में नर्सरी से लाया गया पौधा भी पड़ा था, जाकर खड़े होने लगे। मैं भी एक बढ़िया से तंदुरुस्त पौधे के पास जाकर खड़ा हो गया। हरा भरा तंदुरुस्त पौधा चुनने के पीछे एक कारण था- साल भर उसके बचे रहने की संभावनाएं ज्यादा थी। और इस सम्भावना को मैंने इसलिए तवज्जो दी कि इस बार उन लोगों को पुरस्कृत किया गया था जिनके पौधे पिछली साल से अब तक बच(बढ़ने की बात करना तो बेहद शर्मनाक प्रतीत होती है) पाए थे। तो कहीं न कहीं पुरस्कार पाने का लालच मन में था।

छायाचित्र उतारने वाला भी एक निश्चित क्रम में आगे बढ़ रहा था। मेरी बारी आने तक मैं धूल, जो कि लग ही नहीं पाई थी, झाड़के पौधे के पास खड़ा हो गया। मजदूरों ने पौधे को लगा दिया था, मुझे तो बस हाथ लगाकर फ़ोटो खिंचवानी थी। हाथों को थोड़ा पानी लग गया था तो पिछवाड़े पर पोंछ लिए, जिससे मेरे कच्छे को भी भरी दुपहरी में राहत मिली।

खाने-पीने का बंदोबस्त भी था। सब सज्जनों ने हाथ-मुँह धोकर खाना आरम्भ किया और अंत में मेहनतकशों ने खाना खाकर बचे-खुचे पानी से हाथ-मुँह धोए। थोड़ी गपशप हुई और फिर सब अपने-अपने घरों की ओर निकल पड़े। सुर्य देव ने भी राहत की सांस ली।

मैं भी घर पहुंचा और आज के आयोजन को लेकर बातें हुई। मैं काफी ज्यादा व्यंग्यात्मक हो रहा था और कार्यक्रम को ढोंग बताने लगा। लेकिन मुझे समझाया गया कि आप लोगों ने ढोंग के बहाने कुछ किया तो सही। बहुत से लोग हैं जो वातानुकूलित कक्षों में बैठकर पर्यावरण संरक्षण पर केवल लंबे चौड़े लेख लिखते हैं। शायद उन्हें पता भी नहीं होगा कि पचास डिग्री पर भुना हुआ दिन गुज़रता कैसे है। ये बातें सुनकर मेरा सीना सत्तावन इंच का हो गया। पाखंड की बहती गंगा में हाथ धोने पर गर्व महसूस कर रहा हूं।


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    Rajendra Nehra

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    The author of 'My Tukbandi'