कब्र पलट रहे हैं सब

कब्र पलट रहे हैं सब 
ज़िंदा है तो क्या, उसी की आह में पड़े हुए हैं सब 
कि रात लम्बी है, 
इस बात को सोच शायद लेटे हुए हैं सब |

भूखमरी से तो रोज़ मरते हैं, 
पर अब खाओगे कोई ख़ासा गोश्त, तो मारे जाओगे 
जय-जय बोलेंगे तुम्हारे नाम,
मगर हाय किसान, ब्याज अगर कर भी दे तुझे तमाम 
तो कौन पूछता है?
तीतर-बितर हो मेरी हस्ती, या छीन गई हो मेरी कमाई 
मगर जो ट्विटर पर ना हो, तो वो नहीं है सच | 
अर्ध सत्य तब भी थी बोरिंग, 
आज भी कौन रिपीट देखना चाहता है, भाई ?
 
कब्र आपकी है, 
और मेरी भी, 
बड़ी देर से किसी ने चिराग ना जलाया 
मतलब ये तो नहीं की हम दफ़न ही नहीं हैं |

आपने चिल्लाया नहीं था 
मगर हॉर्न पर खूब हाथ आज़माया था

आपने चिल्लाया नहीं था 
पर खटपट कर खूब टाइप किया था

आपने चिल्लाया नहीं था 
मगर मेट्रो या लोकल में धक्के आपने भी दिए थे

आपने चिल्लाया नहीं था 
पर खौलती चाशनी सी चाय के निवाले आपने भी लिए थे

आपने चिल्ल्या नहीं था 
पर शिकन जो आपके माथे पे है वो बस पसीने से तो ना हुयी

आप चिल्लाते नहीं है 
कहते हैं, यहीं फितरत है हुज़ूर 
दम थोड़ा रोक लो, 
तो पानी कब सर के ऊपर से निकल जाए 
पता ही नहीं चलता|

तो अब रोके हैं दम 
पर आखें खुली हैं 
की सांस लेंगे तब, 
जब पानी उतरेगा |

शायद दो गज़ ज़मीन के नीचे भी यहीं सोचते हैं सब, 
की जब दिखेगा सवेरा तो निकल पड़ंगे हम भी|
 
आखिर मुर्दा कौन है ?
बस सांसें रुकीं हैं

जी तो हम भी रहे हैं |

तो कब्र पलटो ज़रा, 
शायद वो ही थे ज़िंदा|

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