प्रेम और मृत्यु

गहन प्रेम का हर क्षण मृत्यु का क्षण है । जब भी तुम गहन प्रेम का अनुभव करोगे याद रखना यें अनुभव प्रेम के साथ साथ मृत्यु का भी है । सोचने की बात है मृत्यु तो दुःख का भय का कारण है और प्रेम सुख का फिर दोनो एक साथ कैसे घटित हो सकते हैं ? तो अव्वल तो ये मानो की मृत्यु कोई दुखदायी या दर्दनाक चीज़ नहीं है ये बस एक घटना है। उसके ऊपर ये तुम्हारे दुखो से मुक्ति का एक साधन है । तुम्हारी सारी ग़लतियाँ सारे पाप मृत्यु के साथ समाप्त हों जाते हैं अब नया जीवन मिलेगा फिर से सब नया करने का मौक़ा है तो यें कैसा दुःख ?

ख़ैर तो मृत्यु की घटना का सार ये है की मैं समाप्त हो जाता है । मैं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है । तुम बचते ही नहीं फिर भी तुम रहते हो और सब देखते हो । थोड़ा सा समझने की बात है की तुम हो नहीं फिर भी तुम हो । तो मृत्यु में ये शरीर जिसे तुम ख़ुद को समझ रहे थे बेजान पड़ा रहता है और तुम्हारी आत्मा या चेतना इसे निर्जन देखती है और उसे समझ आता है की वो तो मरी नही बस शरीर गया कुछ को आनंद की अनुभूति होती है क्यूँकि उन्हें समझ आ जाता है की वो स्वतंत्र हैं । लेकिन कुछ को घनी पीड़ा का अनुभव होता है क्यूँकि वो अपना शरीर छोड़ना ही नही चाहते । ध्यान रहे जितना ज़्यादा तुम प्रतिरोध करोगे उतनी ही ज़्यादा पीड़ा तुम्हें मृत्यु देगी । मृत्यु तो घटित होकर रहेगी उसे तो तुम ना रोक पाओगे तो क्या करो की दर्द न हो उसका एक ही उपाय है समर्पण । पूरी तरह से आत्मसमर्पण । ऐसा की मृत्यु जब घटित होती हो तो तुम ही मृत्यु बन जाओ ।

यही सब गहन प्रेम में भी घटित होता है । जब गहन प्रेम के क्षण होते हैं तो तुम बचते ही नही सामने वाला ही सब हो जाता है । तुम देखते तो हो लेकिन तुम रह नही जाते तुम वो ही हो जाते हो जिससे प्रेम करते हो । अगर अब तक तुमने ये अनुभव नही किया तो जान लो प्रेम अभी कच्चा है या हो सकता है प्रेम हो ही न बस आदत हो जिसे निभाय चाले जा रहे हो या कोई डर है जिसके कारण साथ हो ।

तो गहन प्रेम में तुम नही बचते तुम गौण हो जाते हो सामने वाला प्रथम होता जाता है । फिर बस ये दिखता है है कि कैसे उसे ख़ुश रकखा जाए कैसे उसकी पीड़ा कम की जाए कैसे उसे हर तरीक़े से आराम पहुँचाया जाए और ध्यान रखना इसमें तुम्हें कोई कष्ट नही होगा क्यूँकि तुम तो हो ही नही ।

अगर जो तुम्हारे पास इस चीज़ का हिसाब किताब है की अपने प्रिय के लिए तुमने क्या क्या चीज़ें त्यागी है कितना कष्ट उठाया है तो जान लेना प्रेम नही है ये सौदेबाज़ी है जहाँ तुम किसी के लिए कुछ इस लिए कर रहे की बदले में तुम्हें कुछ मिले । प्रेम तुम्हारे स्वाभिमान को नही तोड़ता अगर ऐसा है तो तुम्हें तुरंत ख़ुद को उस व्यक्ति से अलग कर लेना चाहिए । ख़ुद को स्वतंत्र बनाओ की कोई मिले तो प्रेम दो कोई अलग हो जाना चाहे तो उसे भी बिना प्रतिरोध के जाने दो । ख़ुद को किसी के खोने दे भय से मुक्त कर पाओ तो स्वाभाविक प्रेम कर पाओगे ।

गहन प्रेम में ख़ुद को समाप्त हो जाने दो अपना अहंकार छोड़ो और प्रतिरोध जितना कम होगा घटना उतनी सहज होगी ।

पति अपनी पत्नी को प्रेम करता है लेकिन पति रहना नही छोड़ पता । पत्नी अपने पति को प्रेम करती है लेकिन पत्नी रहना नही छोड़ पाती । तो पति प्रेम तो करेगा पत्नी को लेकिन हमेशा ध्यान रखेगा की कही पति के किरदार से बाहर न निकल जाए । चार लोगों के बीच में पत्नी से सीधे मुँह बात नही करेगा। बच्चा रोता हो तो उसे गोद न उठाएगा वो तो पत्नी का काम है । रसोई में हाथ न बटाएगा क्यूँकि वो तो पत्नी का काम है ।

पत्नी भी प्रेम तो करेगी लेकिन हमेशा जताती रहेगी की वो पत्नी है । जहाँ मौक़ा पाएगी ये जताएगी की वो कितना सह रही है । हमेशा कोशिश करेगी की पति को बांधे रहे । संतान को भी अपने पक्ष में करने की कोशिश करती रहेगी ।

ये तो सिर्फ़ उदाहरण मात्र है हम सब ने ना जाने कितने खाँचे बना रखे हैं । भाई का खाँचा , बहन का खाँचा , बाप का खाँचा , बेटे का खाँचा ।

तो जब तक बाप बने रहोगे संतान को पूरा प्रेम न दे पाओगे । जब तक पति की किरदार में रहोगे पत्नी को पूरा प्रेम न दे पाओगे ।

प्रेम को गहरा करो उसे व्यक्त करो । जब प्रेम करो तो ख़ुद को समाप्त करने से न घबराओ । प्रतिरोध न करो । प्रेम यदि सच्चा हो और तुम्हारा मन रूगण न , हो विक्षिप्त न हो तो तुम कभी मर्यादाए न तोड़ोगे प्रेम कभी तुमसे कुछ ऐसा न कराएगा की तुम्हें कोई भी पश्च्याताप हो । हाँ बस प्रेम सच्चा हो ।

सौरभ आनंद

Saurabh Anand Srivastava

Written by

Author,Entrepreneur. Founder of Synchsoft Technology Pvt Ltd. Love to read books , Love to write , Love travel. Not religious but a spiritual person.😇