सिगरेट

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले मे शशी गुप्ता का परिवार रहता था । गुप्ता जी के परिवार एक मध्यम वर्गीय परिवार था । गुप्ता जी के परिवार मे एक गुप्ता जी उनकी पत्नी एक बड़ी लड़की और एक बेटा था । बेटे का नाम अमरीश था वो कक्षा 10 मे था और पढाई मे औसत दर्ज़े का छात्र था । गुप्ता जी को बड़ी उम्मीदे थी अमरीश से ,उन्हे लगता था की एक दिन वो उनका नाम रोशन करेगा। वो भी अपने बेटे की पढाई मे कोई भी कसर नही छोड़ते । दिन रात मेहनत करते थे गुप्ता जी । अमरीश भी अपनी पढाई के प्रती ईमानदार था ,उसे पता था की पूरे परिवार की उम्मीदे उससे जुड़ी है ।वो जी तोड़ मेहनत करता । मगर जँहा उम्मीदे कुछ ज्यादा हो जाती है वँहा दबाव भी बड़ जाता है , कभी कभी तो लगने लगता है कि सारा अस्तित्व ही उन उम्मीदो के नीचे दब गया है ,तब इंसान मेहनत तो बहुत करता है मगर ये सोच के की कही वो असफल हो गया तो उसका अस्तित्व ही खत्म हो जयेगा और उसकी प्रदर्शन क्षमता घट जाती है । सफल होनेके लिये मेहनत के साथ ये भी जरूरी है कि असफलता का डर मन से निकाल दे मगर जब अस्तित्व ही दाँव पर लगा हो तो मन इस डर को चाह के भी नज़रंदाज़ नही कर पाता ।

अमरीश हर बार मेहनत करता और काफी हद तक उसे परीक्षा मे सही परीणाम. भी मिलता परंतु जब भी वो अपना परिक्षा फल अपने पिता को दिखाता गुप्ता जी एक उदासीन भरी नज़र से उसे देखते और कहते कि

“ठीक ही है .इससे अच्छा कर सकते थे ”

और अमरीश का मुँह उतर जाता । वो फिर अपराधबोध मे आ जाता कि वो फिर से अपने पिता को संतुष्ट करने से चूक गया । ऐसा नही था कि गुप्ता जी अमरीश से संतुष्ट नहि थे पर वो कभी उसकी तरीफ नही करते थे । उनका मनना ये था की तरीफ सुन कर अमरीश को उन्माद यानी घमंड घेर लेगा और अगर वो उसे ये दिखायेंगे कि वो अच्छा नही कर रहा तो वो और अच्छा करेगा खुद को साबित करने के लिये ।

बोर्ड के इम्तिहान अब नज़दीक आ चुके थे और दबाब बड़ता ही जा रहा था । अमरीश दिन रात एक करके मेहनत कर रहा था और आदतन वो अपनी सफलता को लेकर संशय मे था । उसके पिता यानी गुप्ता जी ने उसे कह रखा था की उसे कम से कम 80 प्रतिशत अंक लाने है ।

किसी तरह परिक्षाये खत्म हो चुकी थी और अब दो महीने बाद ही उसका परिणाम आने वाला था | इन दो महीने अमरीश ने सोच रखा था कि वो खूब मस्ती करेगा और बिल्कुल भी आगे की पढाई नही करेगा । रोज़ रात मे देर से सोयेगा और दोपहर तक सो कर उठेगा । शाम को दोस्तो के संग क्रिकेट खेलेगा और रात मे टी.वी देखेगा । मगर अखिरी पेपर देकर जब वो घर लौटा तो वो ये देख के दंग रह गया कि उसके. पिता जी उसकी अगले क्लास की किताबे ले आये है।गुप्ता जी ने अमरीश से कहा

“अब तो छुट्टीयाँ हो गयी है दिन भर मटरगश्ती ही नही थोड़ी पढाई भी कर लेना ।”

अब पिता जी के आगे किसका मुँह खुलता है “हूँ” बुरा सा मुँह बनाते हुये अमरीश ने कहा , मगर उसने सोच लिया था वो नही पढेगा तो नही पढेगा । मगर होनी को कौन टाल सकता है पढना तो उसे पड़ेगा ही वो ये भी जानता था । वो रोज़ कुछ एक दो घंटे पढ लेता और दिन भर मस्ती करता, टी.वी. देखता , खेलता दोस्तो के साथ आवारागर्दी करता और अपनी बहन से लड़ता । इसी तरह उसकी छुट्टियाँ बीतती रही । कभी कभी उसे गुप्ता जी की डाँट पड़ती की छुट्टी का मतलब ये नही कि चौबीस घंटा खेलते ही रहो । मगर वो ज्यादा ध्यान नही देता था । वो सोचता पिता जी तो जब देखो तब टेलर ही दिया करते है कँहा तक सुनू ।

अमरीश के घर के थोड़े ही पास मे एक परचून की दुकान थी और उस दुकान के बगल मे एक छोटी सी गुमटी रखी थी जँहा सिगरेट और तम्बाकू मिलता था । अमरीश अक्सर घर के रोज़मर्रा के समान लेने वँहा जाता था । एक दिन रोज़ की तरह अमरीश सुबह उठा और घर से निकल गया , आज़ उसके मोहल्ले का मैच था दूसरे मोहल्ले के साथ और अमरीश तो अपनी टीम का सचिन तेंदुलकर था उसका टीम मे होना बहुत ही जरूरी था । दिन भर घूम घाम के जब वो घर लौटा तो उसने देखा सब उसे बहुत गुस्से मे देख रहे हैं । वो आँगन मे अभी हाथ पैर धो ही रहा. था कि उसकी माँ ने कहा

“कँहा से आ रही है सवारी? ”

“अरे माँ आज़ मैच था और पता है क्या मैंने आज़…………..”

“और उसके बाद सिगरेट पीने गये होगे ?”

अमरीश की बात बीच मे ही काट के गुप्ता जी ने कहा । अमरीश सन्न रह गया की अखिर ये हो क्या रहा है ?

“सिगरेट…. कैसी सिगरेट ? मैंने कोई सिगरेट नही पी । ”

“हाँ… हाँ चोर कभी ये नही कहता की वो चोर है । “

अमरीश की बहन ने कहा ।

“शरम नही आयी तुम्हे ? तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई ? मैंने , तुम्हारे. बाप ने आज़ तक एक लौंग नही रख्खी मुँह मे और तुम सिगरेट पी रहे हो । ”

गुप्ता जी ने गुस्से मे तमतमाते हुये कहा । अमरीश ने रुआँसे मुँह से कहा

“पर पापा मेरा यकीन करिये मैंने कभी सिगरेट नही पी । ”

“अच्छा तो वो पाण्डेय जी की पत्नी झूठ बोल रही थी। उन्होने खुद तुम्हे देखा सिगरेट पीते हुये यही सामने की गुमटी पर । “

ओह तो उस औरत ने आग लगाई है । पर जब मैंने कभी सिगरेट पी ही नहि यँहा तक की मै कभी उस गुमटी तक गया भी नही तो वो ऐसा क्यूँ कह रही है ? अमरीश सोच रहा था फिर उसने अपने पिता से कहा

“पापा आप तो जानते है कि वो औरत हमेशा दूसरो के बारे मे झूठ ही बोला करती है । और आप उसपे यकीन कर रहे हैं ? ”

“अब उसने कुछ तो देखा होगा ”

गुप्ता जी ने कहा ।

“अब बिना आग के तो धुँआ नही उठेगा ना ”

अमरीश की बहन ने कहा ।

“तो आप लोगो को बाहर वालो पे ज्यादा भरोसा है मुझपे………. ”

अमरीश अपनी बात पूरी कर भी नही पाया था की गुप्ता जी ने एक जोर दार थप्पड़ रसीद दिया उसे।

“जुबान लड़ाना बंद करो । ” गरज़ते हुये गुप्ता जी बोले।

“पर मैंने कोई सिगरेट नही पी ” अमरीश रोते हुये अपने कमरे मे चला गया ।

अगले दो दिन तक उससे किसी ने सीधे मुँह बात नही की , बात बात पे उसे उसके सिगरेट पीने के ताने दिये जाते रहे । तीसरे दिन सुबह अखबार मे अमरीश ने पढा की तीन दिन बाद उसके बोर्ड के पेपेर का परिणाम आने वाला है । एक तो घर मे वैसे ही बवाल उपर से ये और रिज़ल्ट की टेंशन । अमरीश को अब डर लगने लगा था की कही अगर नम्बर कम आये तो क्या होगा अभी वो घर वालो की नज़र मे गिर चुका है फिर तो घर वाले एकदम बात करना बंद कर देंगे । पापा घर से निकाल देंगे । मै कैसे रहूँगा माँ के बिना । और ना जाने क्या क्या अनापशानाप सोच आ रही थी मन मे ।

हमारा मन भी बड़ा अजीब होता है जिस तरफ एक बार सोचने लग जाये तो कई सौ कारण लाके खड़ा कर देता है । अगर आप बुरा सोचो तो वो आपको इतने बुरे बुरे ख्यालात देगा की आप और परेशान हो जाओ यही अमरीश के साथ हो रहा था यँहा तक की जिन विषयो पर उसकी अच्छी पकड़ थी उन्ही मे उसे डर लगने लगा की वो कही फेल ना हो जाये । उसके ख्यालो ने उसपे दबाव बनाना शुरू कर दिया । कानो मे जैसे बहुत तेज़ शोर होने लगा । आँखो से आँसू बहे चले जा रहे थे और गला सूख रहा था । अमरीश चिल्लाना चहता था पर जैसे आवज़ नही निकल रही थी । अमरीश को शांती चाहिये थी मन की पर ना जाने क्यूँ कानो मे इतना शोर सा सुनाई दे रहा था । उसने कोयला का टुकड़ा लिया और अपने कमरे की दीवारो पे जाने क्या क्या लिखने लगा । उसके हाथ बहुत तेज़ी से चल रहे थे ऐसी ही अवस्था मे रहने के बाद अचनक उसे एक सफेद सी रोशनी सी दिखि वो एकदम शांत हो गया और बैठ गया । लगता था उसे पता चल गया था की कैसे शांती मिलेगी और जैसे उसने उसी राह पे चलने का कोई फैसला ले लिया है।

“कँहा है साहबजादे” गुप्ता जी ने अमरीश की माँ से पूछा ।

“पता नही सुबह से कमरे मे बंद किये है खुद को दोपहर हो गयी निकला ही नही” माँ ने कहा ।

“ लगता है तीन दिन बाद. रिज़ल्ट आने वाला है ये पता चल गया है उनको तभी मुँह छुपा के बैठे है । अभी मै कुछ नही बोलूँगा मगर परसो. अगर. 80 प्रतिशत से एक नम्बर भी कम आये तो चमड़ी उधेड़ दूँगा ।“

गुप्ता जी ने थोड़ा तेज़ आवाज़ मे कहा ताकी अमरीश सुन ले ।

सुबह से शाम हो गयी पर अमरीश निकला नही अपने कमरे से । गुप्ता जी को थोड़ी फिकर हुई उन्होने अमरीश का दरवाज़ा खटखटाया पर अंदर से कोई जवाब नही आया । पूरा घर अब इकट्ठा हो गया । किसी अनहोनी के डर से गुप्ता जी ने दरवाज़े को धक्का मारना शुरू किया और दरवाज़ा टूटते ही उनकी आशंकाओ पे पूर्ण विराम लग गया । आशंका अब सच मे बदल चुकी थी अमरीश छत ले पंखे से झूल रहा था उसने दुनिया का सबसे बड़ा पाप यानी आत्महत्या कर ली थी । कमरे की दीवारो पे कोयले से एक की बात कई बार लिखी थी जिसे पढ कर अमरीश की माँ बेहोश हो गयी. ।

तीन दिन बाद रिज़ल्ट आया , गुप्ता जी को पता चला की अमरीश के 79 प्रतिशत अंक आये है वो उसका परिणाम हाथो मे ले कर भारी मन से उसी के कमरे मे गये और उसकी पढने की मेज़ के पास रक्खी कुर्सी पर बैठ गये । उनके हाथो मे अमरीश का परिणाम था और. दिल मे एक बोझ था । मेज़ पर सर रख कर वो रोने लगे। कमरो की दीवारो पे अब भी वही एक वाक्य कई बार लिखा हुआ था जो अमरीश ने कोयले से लिखा था कि…………………………………………

मैंने सिगरेट नही पी ।

. सौरभ आनन्द

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