Aug 27, 2017 · 1 min read
“…..ख्याल….”
उस मोड़ पर लगा
जैसे सिर्फ सड़क ही नहीं
जिंदगी भी मुड़ सी गई है ....
"खयालों में...."
चौराहे की लाल हरी बत्तियाँ
मुझे बढ़ने ही नहीं देती
आगे एक भी कदम....।
उतर गया हूँ वक्त की गाड़ी से
और बढ़ रहा हूँ पैदल ही....
न जाने क्यों घड़ियां रुक सी गई है और
बहने लगा है लहू
फिर मेरे जिस्म में...
उफ़ ये ख्वाहिशों की बहुमंजिला इमारतें
जैसे अब गिरी की तब.....।
भाग जाना चाहता हूँ
कही दूर जंगलो में.....
जहाँ दरख्तों के बीच से होकर गुजरता है एक दरिया....
...कि वही हूँ शायद...
और बह गए है दरख्त ....
तेज सैलाबों में......
साथ ही ख्वाहिशों की लाशें .....।
अब नहीं पकड़ पायेगी
तेरी यादों की पुलिस
मुझको
मेरी जलसमाधि ......
मेरे सर में कहीं....।।
.........shashank mishra ।।