डॉ.रामशंकर त्रिपाठी : गुरुत्व-गौरव

“What is a famous man ?” — प्रख्यात फ्रांसीसी साहित्यकार-दार्शनिक एल्बर्ट कामू 1946 में अपनी डायरी में लिखते हैं। “Someone whose first name doesn’t matter.”

इस लेख को लिखने से पहले मैंने इसके स्वरूप-विस्तार पर कई प्रकार से चिन्तन किया और अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इसमें व्यक्त विचार-शृंखला को एक वृत्तात्मक स्वरूप देना ही ठीक रहेगा। इसलिए मैं कामू और व्यक्ति के नाम पर उनके इस विचार से अपनी बात शुरू कर रहा हूँ और अन्त में इस लम्बे संघूर्णित होते संज्ञाचक्र को सम्पूर्ण करता वापस यहीं लौटूँगा।

डॉ.रामशंकर त्रिपाठी’ मेरी साहित्य-चेतना के लिए श्रद्धा और गुरुशिष्यता से भावभरित विशिष्ट व्यक्तिवाचक संज्ञा है। इस शब्द-गुच्छ का बड़ा वर्ण-आयाम चूँकि मुझे इस लेख के दौरान बार-बार असहज करता रहेगा , इसलिए मुझे किसी सहज-स्निग्ध-लघु शब्द की आवश्यकता होगी। अतः धनवान् शब्द-श्रेष्ठी मन के प्रश्न उठाने के बाद भी मैं इस लेख के दौरान श्रद्धेय त्रिपाठीजी को ‘गुरुजी’ कहकर ही सम्बोधित करता हुआ आगे बढ़ूँगा। सबसे ज़्यादा अपनत्वप्रदर्शी शब्द सर्वाधिक चिकने और घिसे हुए होते हैं , वे नोकदार और जिह्वापीड़क हो ही नहीं सकते। चूँकि भावना को लाख प्रयास के बाद भी कई मेल का नहीं बनाया जा सकता और उसे विविध रूप देने में बड़े-बड़े भावकर्मी भी आदिकाल से असमर्थ रहे हैं , इसलिए भाषा-शब्दावली के नित्य बढ़ते रहने के बाद भी परम ममत्व और स्नेह-सूचक शब्दों की सारणी , छोटी-की-छोटी ही रहती आयी है। ‘माँ’ जैसे कोमल शब्द के इर्दगिर्द एकाध अक्षर चिपकाने के अतिरिक्त मूर्धन्य-जन भला सहस्रों वर्षों में कोई और सम्बोधन-विकास कर पाये हैं ? मातृत्व-पितृत्व-गुरुत्व जैसी मूल भावनाओं के लिए न भाषा नये सम्बोधन गढ़ना चाहती है और न गढ़ पाती है। इसलिए ‘गुरूजी’ की स्निग्धता की जगह कोई दूसरा शब्द नहीं ले पाएगा और एक प्रकार से यही मेरी भाषा और भावों , दोनों को सहज बनाये रखने में सहायक होगा।

परम सम्मान्य गुरुवर के लिए उपयुक्त संज्ञा-सम्बोधन का निर्णय होने के बाद भी मेरी मुश्किलें समाप्त नहीं होतीं , बल्कि जस-की-तस बनी रहती हैं। एड्ड्रेसल तो महज अभिव्यक्ति का आरम्भ है , अभी तो आगे कथ्य-तथ्य का विस्तृत ताना-बाना शेष है। मैं उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर लिखना नहीं चाहता , वह मुझे बचकाना और हास्यास्पद काम जान पड़ता है। जिस जीवनमार्ग पर वे पिछले छिहत्तर वर्षों से अनवरत चलते चले जा रहे हैं , उसपर मैं भला क्या और कैसे लिख सकता हूँ ? आप चाहे इसे विचित्र समझें , पर मेरा मानना यही है कि पुराना पथिक ही नये पथिक का जीवन-वृत्तान्त या कृतित्त्व-व्याख्या लिख सकता है , इसके विपरीत न हो सकता है , न होना चाहिए। जीवन और कर्म का अन्वेषण-विश्लेषण बड़े , छोटों का बेहतर करते हैं , छोटे बड़ों का कैसे कर सकेंगे : जब वे उस पथ पर उनसे पीछे , बहुत पीछे हैं ? परन्तु यह दुनिया अजब-गजब जगह है — चाहे टूटा-फूटा , आधा-तीहा जैसा सही , यहाँ छोटे ही बड़ों पर लिखते आये हैं और आने वाली पीढ़ियाँ उसे ही रसानन्द-बोध से पढ़ती आयी हैं।

तो इस लेख में न उनसे सम्बन्धित कोई जीवन-वृत्तान्त है और न कोई कृति-विवेचना। यह लेख तो मेरे द्वारा खींचा उनका जीवन-दर्शन-शब्द-चित्र है जो मैंने एमैच्योर प्रयास द्वारा अपने लिए बनाया है और उसमें अपने ही अनुसार रंग भरे हैं। इसे पढ़ने पर गुरूजी अथवा धीमान पाठक-जन , हो सकता है मुझसे थोड़ा-बहुत असहमत हों और इतर राय रखें : तो इसके लिए मैं अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूँ। पर चूँकि विना व्यक्ति के शब्दचित्र बन नहीं सकता , इसलिए इसमें यथार्थता का ही प्राधान्य है , इसमें सन्देह नहीं होना चाहिए। ऐसे में चित्र की कमियाँ-खामियाँ चित्रकार की कमियाँ-खामियाँ समझी जाएँगी , ऐसी मैं प्रत्याशा करता हूँ।

वृत्ति से चिकित्सक और प्रवृत्ति से साहित्य-भावक होने के बावजूद दर्शन जैसे दुर्गम-दुस्तर क्षेत्र में प्रवेश करने की धृष्टता मैं कैसे कर गया , नहीं जानता। पर यह इच्छा जाग्रत हुई कि गुरूजी की जीवन-यात्रा और साहित्य-साधना से हटकर उनका दर्शन-शब्दांकन करने का मुझे प्रयास करना चाहिए , और इसी की परिणति इस लेख के रूप में हुई है।

गुरूजी भास्कर-प्रकाशपुंज हैं और दर्शन- कांच का एक ऐसा त्रिकोणीय प्रिज़्म , जो श्वेत प्रकाश के सप्त वर्णों को अलग-अलग तभी कर सकेगा जब प्रिज़्म-प्रयोगकर्ता उसे प्रकाश के सामने ठीक से रख पायेगा। अन्यथा रंगों की विविधता ठीक प्रकार से दर्शक को नज़र न आ सकेगी। यहाँ मैं उस प्रिज़्म का सम्यक् एलाइनमेंट कर पाया हूँ कि नहीं , इसका पूरी तरह से उत्तर तो गुरूजी ही दे सकेंगे।

दर्शन और दार्शनिकों के अव्यावहारिक होने की मिथ्या धारणा प्राचीनकाल से चलती आयी है। लोग विज्ञान को भौतिक ईप्सापूर्ति का साधन तो मानते हैं , कला को मानस-रंजिका भी कहते हैं ; लेकिन दर्शन का विषय छिड़ते ही उनके चेहरों पर एक कर्फ्यू लग जाता है जिसमें यदाकदा ढील नकारात्मक उच्छ्वास के रूप में ही मिला करती है। उन्हें इस बात का प्रबोध नहीं होता कि दर्शन बड़ी-बड़ी जटिल और लच्छेदार बातों का नाम नहीं है , वह केवल व्यर्थ का भाषा-मल्ल नहीं है , उसमें केवल एब्सट्रैक्ट सिद्धान्तों के कबूतर नहीं लड़ाये जाते।

वह तो वस्तुतः उस युग के जन-विचार-प्रवाह का बौद्धिक भाषांकन है। काल के अनुसार ही वह ऊर्जारूप में जन्म लेता है और अन्य विविध विषयों में प्रविष्ट हो जाता है। कला की शिराओं में भी वह प्रवहमान रहा करता है और विज्ञान के तारों में भी। असल में दर्शन ही कलाओं और विज्ञानों का पिता है। उसके पितृत्व के विषय में किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए। युगानुसार आत्मिक दर्शन को खँगाल लेने के बाद उस युग का विज्ञान-कला-समाज-नीति-इतिहास का देहज्ञान सहज ही बोधगम्य हो जाता है।

इस शब्द-चित्र को खींचने के लिए मैंने पाश्चात्य दर्शन के तीन रंगों ; अस्तित्ववाद (एग्ज़िस्टेंशियलिज़्म) , निषेधवाद (नाइलिज़्म) और असंगतवाद (एब्सर्डिज़्म) का प्रयोग किया है। और इन तीनों रंगों को पाने के लिए भी मैंने बीते दो सौ वर्षों के चार मनीषी दार्शनिकों : डेनिश सोरेन किर्कगार्ड , जर्मन फ्रेडरिक नीत्शे , फ्रांसीसी ज्याँ पाल सार्त्र और फ्रांसीसी-अल्जीरियन एल्बर्ट कामू के दर्शन-चित्रों से स्याही चुरायी है। दर्शन के इन तीन सिद्धान्तों को गढ़ने में इन चारों ने महती भूमिका निभायी है और मैं गुरूजी की दार्शनिक विवेचना इन्हीं के सापेक्ष करने का प्रयास करूँगा। चलिए — चूँकि दर्शन-रंग से दार्शनिक-चित्र की तरफ चलना मुश्किल काम है इसलिए व्यतिक्रम ही प्रयास किया जाय। चित्र से रंग की ओर चला जाय और एक-एक करके इन चारों दार्शनिकों और तत्पश्चात् तीनों रंगों को थोड़ा-थोड़ा समझ लिया जाय। तब इसके बाद ही गुरूजी के जीवन-दर्शन-शब्दचित्र की विस्तृत चर्चा सम्भव हो सकेगी।

इन दर्शन-चित्रों में पहला चित्र डेनमार्क में आज से लगभग दो सौ वर्ष पहले लूथरन ईसाई परिवार में जन्मे दार्शनिक सोरेन किर्कगार्ड का है जिन्हें दर्शन-जगत् एग्ज़िस्टेंशियलिज़्म अर्थात अस्तित्ववाद का जनक भी मानता है। किर्कगार्ड ने अपना पूरा जीवन आस्तिक ईसाई रहकर बिताया और उसी की छाँव तले अपने दर्शन के सिद्धान्त गढ़े। ईसाई-एथिक्स , चर्च-रूपी संस्था और ईसाई-ईश्वर जैसे विषयों पर उन्होंने विशद रूप से लिखा है। उनके अनुसार व्यक्ति अपना जीवन तीन विचारधाराओं को मानते हुए जी सकता है , जिन्हें वे एस्थेटिक (सौन्दर्यात्मक) , एथिकल (नीतिपरक) और रिलीजस (धार्मिक) का नाम देते हैं और यह समझाते हैं कि हर व्यक्ति को सौन्दर्यात्मकता और नीतिपरकता से आगे बढ़कर धार्मिकता को अंगीकार करना चाहिए। स्वयं को परमपिता को समर्पित करते हुए जीवन-यापन करना ही मानव-जीवन की सर्वोच्च अवस्था है।

दूसरे दार्शनिक जर्मनी के प्रख्यात फ्रेडरिक नीत्शे हैं , जिन्होंने अस्तित्ववाद से जुड़े रहने के बाद भी एक भिन्न राह पकड़ी। पिता उनके भी लूथरन ईसाई पादरी थे , और अपना बचपन उन्होंने भी ईसाई माहौल में बिताया था। मगर बाद में उन्होंने ईसाइयत से अपने को विलग करके ईसाई-दर्शन से धुरविरोधी दार्शनिक सिद्धान्त गढ़े। अपनी ‘उग्र’ फ़िलॉस्फ़ी के जिन सिद्धान्तों के लिए उन्हें पूरी दुनिया में ख्याति मिली : उनमें ‘ईश्वर की मृत्यु हो चुकी है’, ‘महामानव’ और ‘दास-नैतिकता’ जैसे विषय प्रमुख हैं। मगर यहाँ हम नीत्शे के दर्शन के जिस सिद्धान्त पर आगे चर्चा करेंगे , वह नाइलिज़्म अर्थात निषेधवाद के नाम से दुनिया में विख्यात है।

किर्कगार्ड और नीत्शे के बाद अब बात ज्याँ पॉल सार्त्र और एल्बर्ट कामू की। ये दोनों मूर्धन्य सत्रहवीं सदी में जन्मे रेने देकार्ते और ब्लेज़ पास्कल , अठारहवीं में वोल्टेयर और रूसो , उन्नीसवीं में बॉलज़ैक , ह्यूगो और ज़ोला की फ्रांसीसी बुद्धिजीवी-पीढ़ी के बीसवीं सदी के उत्तराधिकारी थे। सार्त्र का उद्भव पेरिस के एक बुर्ज़ुआ परिवार से था तो कामू अल्जीरिया (जो कि उस समय फ्रांस का उपनिवेश था ) में एक गरीब विधवा माँ की औलाद थे। सार्त्र कामू से आठ साल बड़े थे और कई सालों तक उनकी परस्पर मित्रता भी रही। सार्त्र सर्वत्र अपने को अस्तित्ववादी मानते थे मगर कामू ने स्वयं को अस्तित्ववादी तो दूर , दार्शनिक भी नहीं माना। मगर जिस दर्शन के लिए कामू को समूची दुनिया जानती है , वह एब्सर्डिज़्म अर्थात् असंगतवाद के नाम से प्रसिद्द है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सार्त्र और कामू की पहली बार भेंट हुई और उन दुर्दिनों और उसके बाद भी कई सालों तक उनमें सौहार्दपूर्ण सम्पर्क बना रहा। फिर साम्यवाद और सोवियत रूस के ऊपर उन्होंने विचारों की अलग-अलग राह पकड़ी। सार्त्र हर तरीके से साम्यवाद और मॉस्को के साथ खड़े रहे और कामू ने अपने को यह कहते हुए स्वयं को विलग कर लिया कि जिस तरह हमने नात्सी-जर्मन कॉन्सेंट्रेशन-कैम्पों का विरोध किया था उसी तरह सोवियत लेबर-कैम्पों का भी करना चाहिए।

अस्तित्ववाद की विचारधारा को किस प्रकार समझा जाए ? निषेधवादी व्यक्ति की परिभाषा क्या है ? असंगतवाद के दर्शन को हम कैसे समझें ? ये तीनों दर्शन-धाराएँ कब और कैसे पैदा हुईं ? वस्तुतः ये त्रिवेणी इतनी मिलती-जुलती हैं कि इन्हें विलग करके परिभाषित करना किसी अदार्शनिक के लिए बड़ा टेढ़ा काम है। परन्तु कुछ मूल तात्विक प्रभेद के माध्यम से इन्हें समझ कर स्पष्ट करते हुए हम क्रमशः आगे बढ़ेंगे।

जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि अस्तित्ववाद के पिता सोरेन किर्कगार्ड हैं। वह उन्नीसवीं सदी थी। विज्ञान की विजयपताका फहराते भाप के इंजन सर्वत्र पटरियों पर दौड़ रहे थे , हर जगह गैस-लैम्पों का उजाला था और आपबीती ‘टेलीग्राफ़िक’ हो चुकी थी। मगर रफ़्तार और रौशनी के इस दौर में जीत तर्क और बुद्धि की हुई थी , भावनाशील मनुष्य इस गति और प्रकाश में परायापन देखता था , मानो कोई छोटा बच्चा अपने अधकचरे यान्त्रिक ज्ञान से अपनी उदात्त प्रकृति-जननी का उपहास कर रहा हो।

औद्योगिक क्रान्ति का यूरोप ने हर ओर प्रसार किया , जहाँ-जहाँ वे उद्योग ले गये : समरभूमि साथ गयी। राजतन्त्र के दिन लदते तो दिखायी देते थे , पर हर फ्रांसीसी क्रान्ति , समता-मुक्तता-भ्रातृत्व की बात करते-करते सत्ता किसी नेपोलियन को सौंप देती थी। वह युग भ्रम और सन्देह का युग था , सबके भीतर मेधा और भावना का अन्तर्द्वन्द्व चल रहा था , रीगल-रिपब्लिकन विचारधारा में किसे चुनें , समझ नहीं आता था — Each age has its characterstic depravity. Ours is perhaps not pleasure or indulgence or sensuality , but rather a dissolute pantheistic contempt for individual man. ( SØren Kierkegaard )

यह अस्तित्ववाद के जन्म की आदर्श पृष्ठभूमि थी , जब व्यक्ति को यह लगने लगा था कि वह एक सोचने वाली मशीन है और किसी फैक्ट्री-सेना-आन्दोलन का पुर्ज़ा-सैनिक-कार्यकर्ता बनने के लिए ही बना है , वह इन्हीं में फिट हो जाएगा अथवा कर लिया जाएगा। तब इस नीरस यान्त्रिक ग्रीष्म ऋतु में सावन की पहली फुहार सी अस्तित्ववादी सोच उसे बताती है कि अनुभूति तर्क से बड़ी है , तुम अपनी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को पहचानो , क्योंकि समूह और समाज की स्वंतन्त्रता , वैयक्तिक स्वंतन्त्रता के विना छद्म और अपूर्ण हैं।

सोरेन किर्कगार्ड हालाँकि स्वयं धार्मिक प्रवृत्ति के थे लेकिन वे ईश्वर में आस्था को एक ‘एब्सर्ड’ ख्याल मानते थे। हर घटना-वस्तु-व्यक्ति का औचित्य ढूँढ़ते-पाते , अन्ततः हम ईश्वर पर पहुँचते हैं। मगर ईश्वर को जाना नहीं जा सकता , न उसका औचित्य पता लगाया जा सकता है। इसलिए ईश्वर पर विश्वास एब्सर्ड है। उनके अनुसार , व्यक्ति के जीवन में उपजने वाली निराशा से निकलने का तरीका मात्र ईश्वर पर श्रद्धा रखने से ही हासिल किया जा सकता है।

ईश्वर पर श्रद्धा रखने के बाद भी किर्कगार्ड चर्च-आदि संस्थाओं के महत्व पर प्रश्न उठाते हैं। उनके लिए ईश्वर-पुत्र ईसा हर व्यक्ति की पर्सनल अनुभूति हैं। उन तक पहुँचने में न कोई पोप-पादरी-चर्च साहाय्य दे सकेगा और न तार्किक अन्वेषण-विश्लेषण। ईश्वर तक पहुँचने के लिए मात्र श्रद्धा का ही मार्ग है और श्रद्धा और अनुभूति अन्योन्याश्रित तत्व हैं। इसलिए उनका अस्तित्ववाद , सार्त्र जैसे परवर्ती नास्तिक अस्तित्ववादियों के विपरीत ईश्वर पर वैयक्तिक श्रद्धा को संग लिये चलता है।

अस्तित्ववाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता का इतना हिमायती है कि वह समूहों में शोषण देखता है , इसलिए कई बार वह धर्म और सरकार जैसे सामाजिक तन्त्रों का विरोध करता है। सार्त्र जैसे अस्तित्ववादियों का साम्यवाद में विश्वास भी असल में इसलिए है कि जब व्यक्ति की मौलिक ज़रूरतें राज्य पूरी कर देगा तो वह अपने आत्मविकास पर ढंग से ध्यान केन्द्रित कर सकेगा।

यहाँ एक विचार पैदा होता है कि क्या अस्तित्ववाद के जन्म के पीछे कोई निराशावादी सोच है ? कहीं यह दर्शन दौड़ में पिछड़ गये लोगों द्वारा मुँह छिपाने का तरीका तो नहीं ? कहीं व्यक्तिगत भावना और स्वतन्त्रता जैसे शब्दों के पीछे तार्किक दुर्बलता तो नहीं छिपायी जा रही ? मगर यह धारणा सही नहीं है। ध्यानपूर्वक देखने पर अस्तित्ववाद में आशावाद का पुटपाक सुस्पष्ट है। और यद्यपि अस्तित्ववादी दार्शनिकों के सिद्धान्तों में परस्पर कई मतभेद रहे हैं लेकिन , अनेक मूल अस्तित्ववादी विचार उन्हें एक करते हैं :

१। मनुष्यों में फ़्री विल , अर्थात् मुक्त इच्छाशक्ति होती है।

२। मनुष्यों अपने निर्णयों से उत्पन्न परिणामों के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं।

३। लगभग हर निर्णय के साथ कोई-न-कोई नकारात्मक परिणाम जुड़ा रहता है।

४। समूह का अंग होने के बावजूद भी हर व्यक्ति को इकाई की तरह सोचना चाहिए और निर्णय लेने चाहिए।

५। संसार मानवता और उसके प्रश्नों के प्रति उदासीन है , उसे उनसे कोई लेना-देना नहीं है।

अस्तित्ववाद की एक ठोस परिभाषा मुश्किल है , मगर सभी अस्तित्ववादी दार्शनिकों को पढ़-समझ कर इतना मूलतत्त्व जाना जा सकता है कि अस्तित्ववाद व्यक्तिकेन्द्री दर्शन है , समूहकेन्द्री नहीं। अस्तित्ववादी यह नहीं मानते कि लोगों का कोई सच्चा मूल सार्वजनिक स्वभाव होता है। हर व्यक्ति अलग-अलग पैदा होता है और उसके बाद ही , अपने स्वभाव-जीवनोद्देश्य-जीवन-लक्ष्य गढ़ता है। अस्तित्ववाद एक अकेले व्यक्ति की ज़िन्दगी से संघर्ष की दास्तान है : एक सब्जेक्टिव कथा , न कि ऑब्जेक्टिव।

Out, out, brief candle! Life’s but a walking shadow, a poor player That struts and frets his hour upon the stage And then is heard no more; it is a tale Told by an idiot, full of sound and fury, signifying nothing.

‘मैकबेथ’ नाटक में शेक्सपीयर की ये पंक्तियाँ , निषेधवाद का सटीक साहित्यिक चित्रण कर रही हैं। निषेधवाद वस्तुतः हर चीज़ की निःसारता का सिद्धान्त है। न कोई मूल्य है , न कोई चेतना है , न कोई नैतिकता है , न किसी चीज़ का कोई उद्देश्य अथवा अर्थ। व्यक्ति-समूह-धर्म-समाज-विश्व , सब वैसे ही और वही हैं , जिस रूप में हम उन्हें देखना चाहते हैं। हमारी सोच के अतिरिक्त इन बातों का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व है ही नहीं। निषेधवाद कहता है कि हर चीज़ नष्ट हो रही है और वह नाश के अतिरिक्त किसी और सत्य की सत्ता को स्वीकारता ही नहीं।

मगर इस विघटन , इस ध्वंस , इस नाश के मूल में क्या है ? किस कारण यह निराशावादी सिद्धान्त अस्तित्व में आया ? और नीत्शे से इसका क्या सम्बन्ध है ? उन्नीसवीं सदी में हुए औद्योगिक विकास और मशीनीकरण के बावजूद समाज में शोषक-शोषित में कायम दुराव इस सिद्धान्त की वृद्धि का मूल था। विज्ञान के तमाम उपकरण समाज का दुःख हरने के लिए नहीं है , उनके होने-न होने से संसार के अधिसंख्य पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा ; बल्कि विज्ञान तो उलटा गरीबी-भूख-अत्याचार की नयी-नयी परिभाषाएँ गढ़ने में प्रयुक्त होगा। हम जिस तरह से भौतिक उन्नति करते जा रहे हैं , यह एक अशुभ संकेत है किसी आने वाली बड़ी दुर्घटना का , किसी महाभयावह युद्ध , महायुद्ध का जिसमें सब विनष्ट हो जाएगा। नीत्शे के इस दर्शन का जब उद्भव हुआ तब यूरोप में औद्योगिक क्रान्ति पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी और रोमांसवाद का अवसान हो चुका था। विज्ञान और कला के बीच के द्वन्द्व-समर का निर्णय विज्ञान के पक्ष में गया था। विज्ञान ने केवल कोमलांगी कला को ही अपनी बन्दिनी नहीं बनाया था , वयोवृद्ध ईसाई धर्म भी उसके आगे घुटनों पर जाने लगा था। वह दौर क्रीमियाई युद्ध और अमेरिकी गृहयुद्ध का दौर था , स्वयं नीत्शे के अपने जर्मन राष्ट्र का महत्वाकांक्षी एकीकरण किया जा रहा था। उद्योग जगत के मज़दूर , यूनियन बना कर अपने मिल-मालिकों के विरुद्ध खड़े हो रहे थे। ऐसे युग में विज्ञानजन्य ध्वंस का मारा मनुष्य कहाँ जाएगा ? ईश्वर पर अब तक टिकी चली आ रही उसकी आस्था भी जब उसे उसकी पीड़ा-वेदना का कारण न बता सकेगी तब वह किसका द्वार खटखटाएगा ? नीत्शे के अनुसार तब वह निषेधवादी बन जाएगा।

मगर इस सिद्धान्त के अस्तित्व को स्वीकारने के बाद भी नीत्शे स्वयं निषेधवादी नहीं थे। उन्हें संसार की नैतिक-सामाजिक निःसारता घटती दिखायी तो देती थी पर वे फिर भी आशावान् थे कि नाइलिज़्म के इस संकट से पार पाया जा सकता है और उम्मीद है कि पाया भी जा सकेगा। वे बुद्धि(अपोलो) की सम्प्रभुता के ऊपर भावना (डायोनाइसस ) को तरजीह देते थे ; उनका मानना था कि बुद्धिवादी नैतिकता वाले इस संसार को विनष्ट करने के लिए निषेधवाद एक किस्म का हथौड़ा है और इसी बुद्धिवादी मलबे पर दोबारा एक भावना-प्रधान संसार उठ खड़ा होगा। इसलिए उनका दर्शन हमेशा-हमेशा के लिए संसार के कष्टों को सहज रूप से अंगीकार करने के लिए कहता है , हँसते हुए कष्ट सहने के लिए प्रेरित करता है , ध्वंस को ग्रहण करने की बात उठाता है।

अस्तित्ववाद का जनक किर्कगार्ड को अवश्य माना जाता है किन्तु उसके पालक-पिता फ्रांसीसी दार्शनिक ज्याँ पॉल सार्त्र हैं जिनके कारण समूचे विश्व में वह लोकप्रिय हुआ। उन्नीसवीं सदी की जिन परिस्थितियों में अस्तित्ववाद का जन्म हुआ , उससे कहीं विकट परिस्थितियाँ बीसवीं सदी में थीं।

नये दर्शन के जन्मने के लिए जितना घर्षण आवश्यक होता है , उससे कहीं अधिक संवर्धन के लिए आवश्यक होता है। दो-दो विश्वयुद्धों के कम्पित मानवता एक बड़े क्राइसिस के दौर से गुज़र रही थी। शोषकों के खिलाफ जनान्दोलन चले , मगर उनसे जो मसीहा पैदा हुए वे खुद शोषक बन बैठे। ऐसे में असहाय मनुष्य कहाँ जाए ?

ईश्वर की सत्ता की नींव विज्ञान ने हिला दी , मगर फिर विज्ञान पूँजीपतियों का दास निकला। पूँजीपति-प्रतिकार के हेतु साम्यवाद का आविर्भाव हुआ परन्तु उस साम्यवादी के हाथ भी खून से सने हुए हैं। इसलिए जब व्यक्ति बाहर दौड़-दौड़ कर मुक्ति तलाशता थक गया तो वह भीतर की ओर लौटा। सार्त्र उसी असहाय आदमी को लौटने के लिए उकसा रहे हैं। वे उससे कह रहे हैं कि तुम कोई कैंची,कार या हवाई जहाज़ सरीखी वस्तु नहीं हो। Your existence precedes your essence. ( तुम्हारा अस्तित्व तुम्हारे गुण-धर्मों से पहले है।) और तुम पूरा जीवन उन्हीं गुण-धर्मों को गढ़ते-गढ़ते बिताते हो। इसलिए अपनी पतन के लिए किसी समाज के नेता या किसी धर्म के मसीहा पर दोषारोपण न करो। अपना मौलिक मानवीय अर्थ स्वयं तलाशो। तुम मानव हो जो तर्कशील होने से पहले भावनाशील है , जो बुद्धि से पहले मन का प्राणी है।

सार्त्र सही समय पर ‘हुए’ और उन्होंने अपने ‘गुणधर्म’ बहुत खूब गढ़े। उनके सिंचन-प्रयास से अस्तित्ववाद का आन्दोलन पल्ल्वित-परिवर्धित होता एक वृहद् विचार-वट बन गया। किर्कगार्ड के विपरीत उनका अस्तित्ववाद ईश्वरवादी नहीं था , न नीत्शे के दर्शन की तरह उसमें निषेधवाद का पुट था। उनके अस्तित्ववाद में व्यक्ति को आशान्वित रहने की सीख दी गयी थी ; किन्तु यह काम उसे स्वयं करना था , इसके लिए किसी नेता-मसीहा-भगवान् का मुँह नहीं ताकना था। उनका यह कहना कि , “I tell you the truth. All men are prophets or the God does not exist ( मैं आपसे सत्य कहता हूँ। या तो सभी मनुष्य पैगम्बर हैं अथवा ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है।) , अपने आप में अस्तित्ववाद का उत्कृष्ट सम्पुट है।

सार्त्र जीवनपर्यन्त साम्यवादी रहे और दुनिया भर के मज़दूर-आन्दोलनों के पक्ष में उन्होंने कलम चलायी। यहाँ तक कि शीतयुद्ध के दौर में भी स्टालिन-माओ-शिष्यों के अत्याचारों की भी उन्होंने वैसे निन्दा नहीं की , जैसी उनके जैसे अस्तित्ववादी को करनी चाहिए थी। और अन्ततः यही जाकर छठे दशक में एल्बर्ट कामू से उनके विभेद का कारण बना। सार्त्र के अस्तित्ववाद से कामू के असंगतवाद की भिन्न दिशा का एक बड़ा कारण चरमपन्थी वामपन्थ था। पूर्वी यूरोप में देशों में लाल सेना ने साम्यवाद का जो दृष्टान्त प्रस्तुत किया उसे देखकर दोनों ने एक दूसरे को अलविदा कह दिया।

ज्याँ पॉल सार्त्र के मानवतावादी अस्तित्ववाद के बाद अब अन्त में एक लघु चर्चा असंगतवाद पर। वर्ष 1942 में कामू ने एक ‘द मिथ ऑफ़ सिसिफ़स’ नाम का दार्शनिक निबन्ध लिखा था। यह एक प्राचीन यूनानी चरित्र सिसिफ़स की कथा है जो मृत्यु को जंज़ीरों में जकड़ देता है , ताकि कोई मनुष्य मर न सके। मृत्यु किसी तरह से उस पाश से मुक्त होती है और जब वह आकर सिसिफ़स को दबोचती है तो वह धोखे से अंडरवर्ल्ड ( नरक या पाताल ) से भी छूट निकलता है । इससे देवता उससे रुष्ट हो जाते हैं और उसे उसकी धृष्टता के लिए एक अनन्तकालीन शाप मिलता है। उसे एक विशाल और भारी-भरकम शिला को धकेलते हुए एक उत्तुंग शिखर पर पहुँचाना है। चोटी पर पहुँचने के पश्चात् वह चट्टान फिर से नीचे आ गिरेगी और सिसिफ़स को फिर उसे ऊपर धकेल कर पहुँचाने के इसी काम में तल्लीनतापूर्वक जुट जाना है। कामू सिसिफ़स को अपने असंगतवाद के नायक के रूप में प्रस्तुत करते हैं , वह जो पूरी तल्लीनता से जीवन जीता है , मृत्यु से घृणा करता है और अनन्तकाल तक एक औचित्यहीन कार्य में जुटा हुआ है और जुटा रहेगा।

पूरी मेहनत से एड़ी-चोटी का पसीना बहाकर जब वह उस पत्थर को ऊँचाई पर पर पहुँचा देता है और वह फिर से नीचे घाटी में ढनँग जाता है तो उसे अपने श्रम की व्यर्थता का एहसास होता है। सिसिफ़स जानता है कि उसके परिश्रम के हाथ कुछ नहीं आने वाला , वह अकारण-बिलावजह यह श्रम करता जा रहा है ; मगर फिर भी उसने अपने जीवन से समझौता कर लिया है। इसी सारहीन संघर्ष में ही उसने अपनी प्रसन्नता तलाश ली है।

कामू संसार में व्याप्त असंगतवाद से तीन मुक्ति के मार्ग प्रस्तुत करते हैं — व्यक्ति आत्महत्या कर ले ( एंड इट ऑल ) , व्यक्ति स्वयं को ईश्वर के हवाले कर दे ( लीप ऑफ़ फेथ ) अथवा एब्सर्ड जगत् को स्वीकार कर ले और संघर्ष करते हुए जिये जाय ( एक्सेप्ट द एब्सर्ड )। अन्त में कामू सिसिफ़स की कथा के माध्यम से आखिरी विकल्प को ही चुनने के लिए कहते हैं। यही संसार के खिलाफ सिसिफ़स का अनवरत चलता विद्रोह है। यही नाइलिज़्म रुपी शत्रु का एब्सर्डिज़्म के अस्त्र से सम्यक् प्रतिकार है।

इस सुदीर्घ पृष्ठभूमि के सज्जित हो जाने के बाद बात पुनः दर्शन-पट पर बनाये जाने वाले चित्र पर वापस लौटती है। श्रद्धेय गुरूजी का व्यक्तिगत जीवन-दर्शन क्या रहा है ? अथवा उनके जीवन-दर्शन को मैंने किस रूप में जाना-समझा है ? इस प्रश्न के उत्तर से पहले एक सह-प्रश्न यह भी उठाया जा सकता है कि इन्हीं चार दार्शनिकों और तीन दर्शन-सिद्धान्तों के माध्यम से ही मैं उन्हें समझने की कोशिश क्यों कर रहा हूँ ? अन्य दार्शनिक और अन्य सिद्धान्तों के माध्यम से क्यों नहीं ?

पूरी ईमानदारी से इस प्रश्न का उत्तर यह है कि इस लेख में वर्णित गुरूजी वस्तुतः पूर्णरूप से डॉ.रामशंकर त्रिपाठी नहीं हैं। गत चार वर्षों में उनके सम्पर्क में आने से लेकर आज तक , मैंने उनसे जो साहित्यालोक ग्रहण किया है उसने मुझे तो संसार के विविध रंग दिखाये ही हैं , साथ में अपने व्यक्तिगत जीवन-दर्शन से भी अवगत कराया है। सूर्य की ज्योति पाकर ही आप समूचे जगत् को देखते हैं और साथ में स्वयं उसे भी क्षण भर को देखते हैं और तत्पश्चात उसपर अपनी अनुभूति जोड़ कर लेखनी चलाने लगते हैं। तब वह सूर्य , आकाशीय पिंड सूर्य नहीं रह जाता , कुछ और सूर्यतर बन जाता है।

गुरूजी उन्नीस सौ चालीस में सदेह हुए थे , यह वह वर्ष था जब यूरोप और सारी दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध से थर्रा रही थी। भू-जल-नभ , सर्वत्र धुरीराष्ट्र शक्तियाँ , मित्रराष्ट्रों से जूझ रही थीं , सैन्य-असैन्य दोनों तरह के लाखों लोग मर रहे थे , रक्त और अग्नि की पीड़क ऊष्णता ने जैसे अन्य सभी शीतल सुखद तत्वों को पूरी तरह आच्छादित कर लिया था। वह पूरी पृथ्वी पर मृत्यु की साम्राज्य-संस्थापना का दौर था। एल्बर्ट कामू ही एक जगह अन्यत्र प्रश्न करते हैं कि , “We used to wonder where war lived , what it was that made it so vile .” और फिर उसका स्वयं जवाब देते हैं कि “ And now we realise that we know where it lives … inside ourselves.” गुरूजी के जन्म के समय समूचा विश्व एक अभूतपूर्व प्रलयंकारी घटनाक्रम से साक्षी हो रहा था।

अन्तरतम में रहने वाला युद्ध का वैयक्तिक स्वरूप उपनिवेशवादी शक्तियों के परस्पर टकराव की वजह से बाहर निःसृत हो रहा था , ज्यों सालों से गड़गड़ाते ज्वालामुखियों से लावा फूट रहा हो। गुरूजी का पूरा जीवन मुझे उसी असंख्य ज्वालामुखियों की घाटी में बिताया गया प्रतीत होता है , जिसके विस्फोटों को सुनते हुए उन्होंने प्रथम किलकारी ली थी। उनकी पूरी ज़िन्दगी पर मुझे उस आग्नेय-क्रिया की छाप स्पष्ट दिखायी देती है। चर्चिल द्वारा ब्रिटेन का साहसिक प्रतिरक्षण , नात्सी जर्मनी का सोवियत रूस पर हमला , जापान का पर्ल हार्बर पर अचानक आक्रमण करके उसे तहस-नहस कर देना और अमेरिका का हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु-बम गिरा कर युद्ध की इति करना , ये सब वे घटनाएँ हैं जिन्होंने उस पीढ़ी की मूल्यचेतना का मानचित्र , चाहे शोणित से ही सही , पर अंकित-प्रत्यंकित कर दिया था , चाहे आर्त्तनादी इंगन से ही सही , उसके मूर्धा-विकास की दिशा-दशा तय कर दी थी।

मगर क्या सचमुच ज्वालामुखियों की वह घाटी इतने अधिसंख्य अग्नि-वमन करते तुंग श्रृंगों से घिरी थी ? क्या वह युद्ध सचमुच जनयुद्ध था ? क्या मित्रराष्ट्र-धुरीराष्ट्र-समर सामान्य अँगरेज़ों-फ्रांसीसियों-अमेरिकियों-रूसियों इत्यादि का सर्वसाधारण जर्मनों-इतालवियों-तुर्कों-जापानियों इत्यादि के खिलाफ था ? या यह महज़ छलावा है जो हम इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ते आये हैं , अपनी-अपनी राष्ट्रभक्ति के ढकोसले के रूप में। हिटलर और मुसोलिनी जैसे नृशंस अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरे देश पर थोप देते हैं और फिर प्रतिक्रिया स्वरूप चर्चिल-ट्रूमैन-स्टालिन को भी अपनी प्रतिक्रिया थोपनी पड़ती है। आरोपण चाहे अच्छाई का हो अथवा बुराई का , आरोपण करना और करवाना दोनों अनुचित हैं क्योंकि वे व्यक्ति की मौलिकता को विनष्ट कर देते हैं। ये क्रियाएँ उसे एक युद्धयन्त्र का पुर्ज़ा बनाकर प्रस्तुत करती हैं , जो कभी आक्रमण में सम्मिलित होता है तो कभी प्रतिरक्षण में, और इसी तथाकथित राष्ट्यज्ञ में उसका जीवन अन्ततः होम हो जाता है।

तब भारत में टीवी की बात दूर , रेडियो भी कहीं-कहीं रहा होगा। मगर द्वितीय विश्वयुद्ध जैसे पावकाद्रि-समूह का ताप-नाद सहने-सुनने के लिए किसी विज्ञान-यन्त्र की आवश्यकता नहीं होती , वह तो स्वतः धीरे-धीरे उस पीढ़ी के कोमल मानस को झुलसा देता है , उसकी भित्तियों को चटका देता है। सत्तर वर्ष पहले हुए परमाणु-विस्फोटों के वे दोनों कुकुरमुत्तेनुमा बादल मुझे आज भी ज्ञानार्जन करते समय जब-तब गुरुवर के चेहरे की सिलवटों में दीख जाते हैं और उनकी व्यथित आवाज़ में उन जापानियों की नैष्कर्षिक चीख भी। परन्तु इस सबसे बड़ी विश्व-व्यथा-कथा के संग उन्होंने अपनी जीवन-कथा आरम्भ की थी , अभी तो आगे अनेकानेक घटनाओं का उनपर प्रभाव पड़ना शेष था।

झुलसी-चटकी पीढ़ी में जन्म पाने को , हो सकता है सामान्य जन अभिशाप समझें ; लेकिन साहित्य-सर्जक के लिए इससे बेहतर उर्वर पृष्ठभूमि नहीं मिल सकती। सम्राटों-बादशाहों का स्तवन- करने वाले राजसाहित्यकारों के दिन अब नहीं रहे , अब तो साहित्य जनता के लिए लिखा जाता है , जनता के बीच रहकर लिखा जाता है। और जनसाहित्य में हास्योल्लास कम , आर्त्तनाद का पुट ज़्यादा होता है क्योंकि जनता सदियों से हँसती कम और रोती ज़्यादा आयी है। गुरूजी के जन्म का समय भी एक वैश्विक रुदनकाल चल रहा था जो बड़े जनसाहित्य-सर्जकों के गर्भाधान के लिए प्रकृति के तैयार होने का संकेत था।

मैंने कभी गुरूजी से इन उपरिलिखित दर्शानाभिव्यक्तियों अथवा दार्शनिक मनीषियों पर औपचारिक चर्चा नहीं की। पाक्षिक फ़ैज़ाबाद-यात्रा के दौरान ‘जगत-अस्पताल में रोगी-निदानोपचार के पश्चात मेरा उनके निवास-स्थान पर अवश्यतः जाना होता है। वहाँ पर वे मेरे सामने अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति ही करते हैं और मैं प्रसाद रूप में उसे ग्रहण करता हूँ। राजनीति-धर्म-विज्ञान इत्यादि पर चर्चा भी साहित्य के सन्दर्भ में ही यदि छिड़ जाए , तो अलग बात है। दर्शन न उनका ‘अध्ययन-विषय’ रहा है और न मेरा। इस कारण यहाँ व्यक्त विचारों से यह भी पुष्ट हो सकेगा कि मैं व्यक्ति ‘डॉ.रामशंकर त्रिपाठी’ के जीवन-दर्शन को विगत चार वर्षों में कितना समझ सका हूँ। मेरे शिष्यत्व की सफलता का इससे बेहतर मानदण्ड शायद कोई और हो ही नहीं सकता।

गुरूजी सोरेन किर्कगार्ड के दर्शन के प्रति कैसे विचार रखेंगे ? उनके ईसाई-धर्म-प्रेम पर गुरूजी का क्या मत होगा ? जन्म तो उनका भी एक पारम्परिक सरयूपारीण ब्राह्मण-कुल में हुआ है , जहाँ रामायण-गीता-श्रीमद्भागवत का सामान्य पाठ होता है , सारे हिन्दू-संस्कार पूरे मनोयोग किये जाते हैं , व्रत-हवन-सन्ध्या सब परम्परानुकूल पद्धति से सम्पन्न होते हैं। इस पर उन्होंने विरासत में प्राप्त किये धर्म-संस्कारों पर प्रश्नचिह्न लगाये और धर्म से विलग कर अपना जीवन-पथ स्वयं बनाया। रास्ता बनाते हुए पथ-गमन का जो आनन्द है , वह सबको नहीं मिलता , विरले ही उसके अधिकारी होते हैं।

जीवन भर ख्रीस्त-धर्म की छाँव तले अपनी दार्शनिक अभिव्यक्ति करने वाले किर्कगार्ड से वे कतई सहमत नहीं होंगे , इसका मुझे पूरा विश्वास है। किर्कगार्ड जिन तीन मानव-जीवनों : सौन्दर्यात्मक , नीतिपरक और धार्मिक की चर्चा अपने दर्शन में करते हैं और उनमें भी क्रमशः पहले और दूसरे से आगे बढ़कर तीसरे ढंग की जीवनपद्धति को मनुष्य का ध्येय बताते हैं , उससे भी उनका मतभेद रहेगा। गुरूजी इन तीनों में नीतिपरक मानव-जीवन को ही चुनेंगे और आगे पूछने पर यह कह देंगे कि भैया , जो नीतिपरक है , वह तो सौन्दर्यात्मक है ही। क्योंकि नीतिपरकता में शिवत्व होता ही है और चूँकि शिवत्व में सुन्दरत्व स्वतः आ ही जाता है , उसके लिए अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता। इसलिए सौन्दर्यबोध को लक्ष्य न बनाकर नीतिपरक जीवन जिया जाए , वही सर्वोच्च मानव-जीवन-लक्ष्य होता है और होना चाहिए भी। और रहे ईश्वर और धर्म , तो नीतिपरकता के बाद उनकी कोई आवश्यकता रह ही नहीं जाती। किर्कगार्ड ईश्वर को एब्सर्ड मानते हैं , उसे तर्क से परे रखने के बावजूद उसपर श्रद्धा रखने के लिए कहते हैं। उनका धर्म उनके दर्शन पर हावी है , अस्तित्ववादी होने के बावजूद वे मनुष्य को ईश्वर पर आस्था के लिए प्रेरित करते हैं। यहीं पर गुरूजी और उनकी मतभिन्नता स्पष्ट हो जाती है। किर्कगार्ड का स्वरूप सौम्य और मोहक अवश्य है , पर उसमें एक धर्मभीरुता की झलक भी है। (यह कोई अचरज की बात नहीं कि उन्होंने ईसाइयत पर अपने बहुत से लेख गुप्त रूप से उपनामों के साथ लिखे।) गुरूजी सौम्यता और मोहकता के साथ धर्मभीरुता के उनके व्यक्तित्व में अवस्थित होने को दोष-रूप में देखेंगे , ज्यों शरत्-पूर्णिमा के चन्द्रमा में कलंक होता है। और ऐसे में उसकी शीतलता की भूरि-भूरि प्रशंसा करने के बाद भी वे उसे अपना दर्शन-उपास्य नहीं मानेंगे। किर्कगार्ड के ये तर्क कि नीतिपरक जीवन जीने में भी मनुष्य कई बार अन्तर्द्वन्द्व में फँसता है , गलत निर्णय ले सकता है और मृत्यु से भयभीत तो हो ही सकता है , गुरूजी का मत-परिवर्तन न करवा पाएँगे। वे सौन्दर्यात्मकता के आत्मकेन्द्री और स्वार्थी होने और और उसका नित्य नूतन अभिव्यक्ति की तलाश और अन्ततः उससे उपजी बोरियत की दलीलों को मानकर उसे तो नीतिपरक जीवन से हीन मान लेंगे ; पर वे यह कभी न स्वीकार करेंगे कि नीतिपरक जीवन से ऊपर भी कोई जीवन-पद्धति है , उससे बेहतर भी कोई जीने का तरीका है। किर्कगार्ड के इन तर्कों का उत्तर वे किन प्रतितर्कोँ के द्वारा देते , उनका उल्लेख मैं आगे करूँगा।

मयंक-सौम्य किर्कगार्ड के बाद अब चर्चा उनसे विपरीत गुण-धर्म वाले दर्शन-मार्तण्ड नीत्शे की। अस्तित्ववाद की झलक लिए होने के बाद भी नीत्शे का दर्शन किर्कगार्ड के दर्शन से बहुत भिन्न है। वे ईसाई-ईश्वर को मनुष्यता को क्षीण करने वाला शत्रु मानते हैं और उसके द्वारा संचारित मानवमूल्यों दया-करुणा-कोमलता को कातर-भीरु दासजनों की ढाल बताते हैं। चूँकि ये दासजन अपने स्वामियों की तुलना में दुर्बल हैं , इसलिए वे इन गुणों का उनके सामने बखान करते हैं ताकि उनके भीतर के ओजस्विता-साहस-वीरत्व जैसे मूल्यों का ह्रास कर सकें। नीत्शे के अनुसार यही दास-नैतिकता की स्वामि -नैतिकता पर विजय है और इसका प्रचार-प्रसार ईसाई धर्म के कारण हुआ है।

गुरूजी नीत्शे के इन विचारों को किस रूप में लेंगे ? क्या वे दास-नैतिकता और स्वामि-नैतिकता जैसे मूल्य-वर्गीकरण में विश्वास रखेंगे ? जितना मैं उन्हें समझता हूँ , ‘धर्म’ में आस्था न होने के बावजूद वे दया-करुणा-कोमलता जैसे मूल्यों को दासत्व के साथ जोड़ कर देख ही नहीं सकते। उनकी दृष्टि में ओजस्विता-साहस-वीरत्व बड़े श्रेष्ठ मूल्य हैं , मगर दया-करुणा-कोमलता उनसे कहीं श्रेष्ठतर हैं। नीत्शे के दर्शन में वीर-भाव का प्राधान्य है , गुरूजी करुण-भाव-सिक्त जीवन जीते आये हैं। वे कभी भी नीत्शे की इस बात को स्वीकार नहीं कर पाएँगे कि ब्रह्माण्ड में हर वस्तु का जीवन वस्तुतः एक शक्ति-प्रदर्शन है , ‘विल टु पावर’ है। उनकी दृष्टि में ‘विल टु पावर’ को स्वीकारने का मतलब हिंसा के अस्तित्व को स्वीकृति देना होगा और वे चाहे अपने इर्द-गिर्द-चहुँओर नित्य हिंसा घटती देखें , वे हिंसा और शक्तिप्रदर्शन को दार्शनिक-सिद्धान्त का जामा कभी नहीं पहना सकेंगे।

जब भी गुरूजी जीवन की किसी घटना को याद करके खिन्न होते हैं , तो जीवन की निःसारता की बात ज़रूर करते हैं। नीत्शे के निषेधवाद से उनके विचार अवश्य मेल खाते हैं। बुद्धिवाद-प्रभुत्व और भाववाद-ह्रास के कारण बढ़ता निषेधवाद जो किसी भी नीति-समाज-राष्ट्र के अस्तित्व को नकारता है , उन्हें स्वीकार्य होगा और वे यह भी कामना करेंगे कि आने वाले विश्व में कोई इस निःसारता की मरुभूमि को सींचने के लिए पुनः भावना-भागीरथी उतार पाए। नीत्शे का महामानव जो दुखों में छिपे उत्थान-निहितार्थ को पढ़कर , अपने बहिर्विक्षोभों-अन्तर्विक्षोभों पर विजय पाकर , जीवन को ‘अर्थहीन’ मानकर जियेगा , वही गुरूजी के शब्दों में इस पुनीत कार्य को सम्पन्न करने वाला भगीरथ होगा।

गुरूजी अक्सर जीवन और कविता में साम्य की चर्चा भी करते हैं और दोनों ही के लयभंग को रुग्णता का प्रतीक मानते हैं। ऐसे में नीत्शे का अपनी पुस्तक ‘द बर्थ ऑफ़ ट्रैजेडी’ में बुद्धिवादी देव अपोलो और भाववादी देव डायोनाइसस की चर्चा पर उनका कौन सा पक्ष होगा ? वे अपोलो के साथ खड़े होंगे अथवा डायोनाइसस के साथ ? अपोलो हर काम को सलीके-करीने से करने का पक्षधर है और डायोनाइसस यह कहता है कि जो कला सलीके-करीने से गढ़ी गयी , वह कला ही कहाँ रही ? उसके अनुसार तो नियमभंगता के विना कुछ भी सर्जना नहीं हो सकती , केवल यान्त्रिक अनुगमन भर किया जा सकता है। तो ऐसे में गुरूजी के पक्ष को जानने के लिए पहले मुझे उनकी लय-परिभाषा को और अधिक स्पष्ट समझना-समझाना पड़ेगा।

लयबद्धता का अर्थ किसी प्रकार का बन्धन अथवा ग़ुलामी नहीं होता , न लयभंग किसी प्रकार की स्वतन्त्रता को दर्शाता है। वस्तुतः बुद्धि और विवेक का निर्णय करके जब आप कोई काम करते हैं , तो आप सच्चे अर्थों में मुक्त होते हैं। स्वछन्दता और उन्मुक्तता के नाम पर जन्मने वाले ऊटपटाँग भावों और कृत्यों को गुरूजी दासत्व ही मानेंगे , स्वतन्त्रता कदापि नहीं कहेंगे। कला के विकास के लिए जो उन्मुक्तता चाहिए , वह भी एक मर्यादा के अन्तर्गत ही रहती आयी है। संसार की सबसे ललित-रमणीक वस्तुएँ-स्थल भी पूर्णतया स्वच्छन्द नहीं हैं , वे भी किन्हीं नियमों का अनुपालन कर रहे होते हैं। दरअसल शतप्रतिशत मुक्ति मात्र ध्वंस और नाश की ही जननी हो सकती है , संहार ही वह कविता-संगीत है जो डायोनाइसस अकेले लिख-गा सकता है। अन्य कुछ भी रचने के लिए उसे अपोलो का साथ तो चाहिए ही पड़ेगा। इसलिए अपोलो और डायोनाइसस से अगर गुरूजी की एक साथ मुलाक़ात कहीं हो जाएगी तो वे डायोनाइसस से उनके तथाकथित उन्मुक्त लयभंग तरीके की प्रशंसा करके उस पर चलते रहने के लिए प्रोत्साहित तो करेंगे लेकिन साथ में पीछे से अपोलो के कान में धीरे से यह भी बोल देंगे , कि , “भैया, देखे रहना , कहीं आपके आगे झूमते-नाचते चल रहे भावनावादी मदिर मित्र कहीं ठोकर खा कर गिर न पड़ें। इसलिए आप उनकी चाल और रास्ते के पत्थरों पर दृष्टि गड़ाये रहिएगा।“

नीत्शे जिस नकारत्मक निषेधवाद की बात अपने दर्शन में उठाते हैं , उसके मूल में उनकी डायोनाइसस के प्रति अपार श्रद्धा है। वे प्रबल भाववादी हैं , अपोलो से रुष्ट हैं और संसार में बढ़ती जा रही अपोलो-भक्ति से लोगों का मोहभंग चाहते हैं। मगर गुरूजी का भाववाद इससे भिन्न है। उनके मनमन्दिर में डायोनाइसस की बड़ी मूर्ति भले स्थापित हो लेकिन उसके ऊपर अपोलो का एक छोटा भव्य विग्रह भी प्राणप्रतिष्ठित है और वे दोनों को संयुत भाव से भजा करते हैं।

निष्कर्ष यह है कि नीत्शे कठोर-भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं , गुरूजी कोमल-भावनाओं के केतनधारी हैं। ईश्वर के अस्तित्व को नकारने के बाद और जीवन को लक्ष्यहीन विशेषण देने के बाद भी दोनों के जीवन-दर्शन में बड़ा अन्तर है। किर्कगार्ड जहाँ अतिशीत निकले , नीत्शे अत्यूष्ण सिद्ध हुए। गुरूजी के तापमान का दर्शन दोनों के कहीं बीच में अवस्थित होना चाहिए।

अब मैं गुरूजी के जीवन-दर्शन को सार्त्र के अस्तित्ववाद के समीप खड़ा करके उनकी परस्पर तुलना करता हूँ। बात बनती जान पड़ती है। गुरूजी नस्ल-राष्ट्रीयता-धर्म-जाति के संकीर्ण बन्धनों को नहीं मानते। वे केवल व्यक्ति के सुख-दुःख की बात उठाते हैं। उनके अस्तित्ववादी होने का सबसे सशक्त हस्ताक्षर यही है कि समाज के सुख-दुःख का अस्तित्व मानते ही नहीं। समाज एक निर्जीव समूह है जो सजीव व्यक्तिरूपी इकाइयों से निर्मित है। वे व्यक्ति ही रोते हैं , वे ही हँसते हैं , उन्हीं का परिहास-आर्त्तनाद सब सामूहिक होने लगे तो उसे समाज का परिहास-आर्त्तनाद मान लिया जाता है। अलग से समाज किसी भावना का निरूपण-प्रकटीकरण कर ही नहीं सकता क्योंकि व्यक्तियों से इतर उसका कोई अस्तित्व है ही नहीं। सार्त्र जिस मनुष्य-कष्ट के लिए एग्ज़िस्टेंशियलिस्ट होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं , उसी वेदनाकाल में गुरूजी ‘हुए’ हैं। तत्पश्चात उन्होंने अपना पूरा जीवन अपना अस्तित्व तलाशते हुए बिताया भी है। वे सार्त्र के अनीश्वरवादी विचारों से भी सहमति रखते हैं और मनुष्य को थिंकिंग एनिमल से पहले फीलिंग एनिमल मानते हैं। अद्भुत ! मुझे गुरुदेव का दर्शनस्रोत मिल गया। ज्ञात हो गया कि वे किस विचार-वट के तले तप करके बुद्ध बने हैं।

लेकिन तभी एक बड़ा विभेद सामने खड़ा हो जाता है। गुरूजी और सार्त्र के दर्शन में वही एक अन्तर है : किन्तु वह इतना मौलिक और महत्वपूर्ण है कि उसे त्याग कर वे कभी सार्त्रानुगामी नहीं बनेंगे।

सार्त्र से उनका सबसे बड़ा विभेद-विरोध उनके वामपन्थ के प्रति पक्षपात से होगा। गुरूजी उस मार्क्स और एंगेल्स के दर्शनधारा में स्नात हैं जो उन्नीसवीं सदी से चली थी और मज़दूरों-मामूली लोगों के शोषण के खिलाफ थी। लेकिन ज्यों-ज्यों बीसवीं सदी में लेनिनवाद-स्टालिनवाद की रक्तकीच की गन्दगी उस धारा को प्रदूषित करती गयी , त्यों-त्यों उनका वामपन्थ के इस नूतन हिंसात्मक स्वरूप से मोहभंग होता गया। अब मज़दूर मिलमालिकों से संघर्ष नहीं कर रहे थे , वे अपने ही ‘विरोधी’ भाइयों को नष्ट करने पर तुले थे। साम्यवाद स्वयं को ही खा रहा था। उसकी यह आत्मभोजी प्रवृत्ति ज्यों-ज्यों बढ़ती गयी , त्यों-त्यों गुरूजी की श्रद्धा उसमें समाप्त होती चली गयी।

और अब अन्त में मैं एल्बर्ट कामू के पास गुरूजी के साथ वापस लौटता हूँ : जहाँ गुरुत्वाकर्षण से जूझते हुए उस महापाषाण को उत्तुंग शिखर की ओर धकेलता एब्सर्डजीवी सिसिफ़स हमारी प्रतीक्षा में है। कामू और उनका वह नायक सिसिफ़स गुरूजी की दृष्टि में क्या हैं ? क्या जीवन सचमुच व्यर्थ और असंगत है ? पिछले तीनों दर्शन-मनीषियों किर्कगार्ड-नीत्शे-सार्त्र के विचारों में मुझे कहीं न कहीं कुछ ऐसा महत्वपूर्ण तत्व अवश्य दिखता आया है जो गुरूजी के जीवनमूल्यों की दशा-दिशा से कदापि मेल नहीं खाता। किर्कगार्ड की धर्मपरायणता को वे नकार होंगे , नीत्शे का उग्रोत्तेजक निःसारवाद उन्हें रास नहीं आएगा और सार्त्र के अस्तित्ववादी संस्करण के बहुत पास पहुँच कर भी वे तब वापस लौट चलेंगे जब उन्हें स्टालिन और माओ मार्का साम्यवाद के खेमे में खड़ा देखेंगे। मगर मात्र इसी कारण से कामू का असंगतवाद उन्हें अपनी ओर आकृष्ट कर लेगा , ऐसा सोचना गलत है।

गुरूजी ने अपना पूरा जीवन जिस प्रकार व्यतीत किया है वह वस्तुतः पर्वतारोहण-प्रक्रिया से कहीं दुष्कर कर्म है। पर्वत पर चढ़ने से पहले आपको उसकी ऊँचाई ज्ञात होती है। मगर जीवन की चढ़ाई को पहले से जान लेने का कोई मापक-यन्त्र होता ही नहीं। यहाँ तक यह भी नहीं पता कि जीवन में पर्वत-सरीखी ऊँचाई से ही वास्ता पड़ेगा अथवा गर्त्त-पठार-वन-मरुस्थल-जल-कीचाशय आदि से भी पाला पड़ेगा। जीवन की यह अनिश्चितता सिसिफ़स को नहीं भोगनी पड़ रही। वह अभिशप्त तो अवश्य है , पर उसे अपने लक्ष्य का भली भाँति संज्ञान है , अपने कार्य-सम्पादन का अच्छी तरह पता है। एक ही रास्ते से ऊर्ध्व जाते-उतरते वह नग-मार्ग की बाधाओं से भी परिचित हो गया है। सिसिफ़स के कष्ट का तत्व उसके कार्य की लक्ष्यहीन निःसारता में है , अपने सतहत्तरवें वर्ष की ओर अग्रसर हो रहे गुरुदेव को भी अब जीवन की निर्मूल्य व्यर्थता की प्रतीति होती है।

गुरूजी की तुलना मैं व्यर्थकार्यरत सिसिफ़स से तब कर सकूँगा , जब उसे प्रत्येक बार नया महापाषाण धकेलते हुए , उस नूतन पर्वत शृंग पर ले जाना हो। दरअसल हर मनुष्य-जीवन इसी प्रकार का कर्म है। गुरूजी ने अपने जीवन में बड़े भारी महाप्रस्तरों को परमोत्तुंग शृंगों पर पहुँचाया है और आज भी पहुँचा रहे हैं , यही उनके जीवन के अर्थहीन दर्शन का सार है। परन्तु इस सिसिफ़स के किरदार में यों प्राणरूप प्रतिष्ठित हो जाने के अलावा भी गुरूजी और एल्बर्ट कामू के बीच अन्य कई साम्य भी मुझे दृग्गोचर हो रहे हैं। एल्बर्ट कामू की तरह उनका स्वरूप भी अत्यन्त शोभन-सुदर्शन है जो किर्कगार्ड-नीत्शे-सार्त्र की दैहिक छवि से भी मेल नहीं खाता। किर्कगार्ड के मयंकानन में धर्मभीरुता परिलक्षित होती है , नीत्शे तो साक्षात विकट-प्रचण्ड दग्धकर्ता दर्शन-मार्तण्ड हैं , सार्त्र में जो शुक्रत्व परिलक्षित होता है , वह दृष्टिदोष युक्त स्थूल वृद्ध का है जो उनसे सर्वथा भिन्न है। किन्तु कामू दूसरे प्रकार के शुक्राचार्य हैं : वह जो सुरूप हैं , मनभावन हैं , जिनका दर्शन-श्रवण एकरूप मनमोहक-हितकारी है। इसके अलावा किर्कगार्ड-नीत्शे-सार्त्र मूलरूप से दार्शनिक हैं , जबकि कामू की आस्था पहले साहित्य में है। यह बात भी गुरूजी को अन्य की तुलना में कामू का ही सामीप्य प्रदान करती है।

इस प्रकार गुरूजी , दैहिक और वैचारिक दोनों प्रकार से मुझे कामू का प्रतिबिम्ब ही जान पड़ते हैं। उन्होंने जीवनभर जिन असाधारण झंझावातों को सहा है , उनसे उनके ऊपर दो ही प्रभाव पड़ सकते थे। या तो वे धर्मभीरुता के साथ ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार कर लेते और कष्टों-दुःखों का कारकत्व दैवी मंशा पर डालते हुए जीवन जीते अथवा वह करते जो उन्होंने वास्तविक रूप में किया। व्यर्थरूप में उसे अंगीकार करके जीवन-यापन करने में कोई नैराश्य की भावना नहीं है , सिसिफ़स के चरित्र को ओढ़ने के पीछे कोई निगेटिविटी नहीं छिपी है। वरन वह अपने साथ घटने वाली सुखद अथवा दुखद घटना के लिए वे किसी पारलौकिक शक्ति का मुँह नहीं ताकते , बल्कि उसे जस-का-तस स्वीकार करके उससे दो-दो-हाथ करते हैं। गुरूजी व्यर्थवादी-पुरुषार्थी हैं। अर्थ पाने लेने पर पुरुषार्थ करने की तुलना में उनसा जीवन जीवन जीना दुष्कर कार्य है किन्तु ज्यों ही समस्त कार्यों का उत्तरदायित्व व्यक्ति के स्वयं के कन्धों पर डाला जाता है , उसके स्कन्ध काँपने लगते हैं , बाहु डोलने लगते हैं। संसार के अधिसंख्य व्यक्ति अपना कर्मभार किसी न किसी काल्पनिक ईश्वर के सहारे उठाये फिरते हैं। उनमें उसकी निरुद्देश्यता को मानने में डर लगता है , वे उस अकेलेपन को सोच कर काँप उठते हैं।

क्या गुरूजी आरम्भ से सिसिफ़स-स्वरूप रहे होंगे ? पारम्परिक हिन्दू-परिवार में जन्म पाने के बाद कब और कैसे वे व्यर्थतावादी हो गये ? यह प्रश्न चाहता तो मैं उनसे इस लेख को लिखने से पहले पूछ सकता था। मगर इसे अपनी चेतना से स्वयमेव बूझना मुझे अधिक श्रेयस्कर जान पड़ा। हर व्यक्ति कोरी स्लेट बनकर ही जन्मता है , जन्मना प्रज्ञावान् होने ही कथाएँ मात्र कल्पना और फंतासी की उड़ाने हैं। गुरूजी भी वैसे ही श्यामल-स्वरूप जन्मे होंगे। फिर शनैः शनैः खड़िया से व्यक्तिगत-सामाजिक सुघटनाओं-दुर्घटनाओं की इबारत लिखते-लिखते उन्होंने अपना वर्तमान जीवन-दर्शन डिड्यूस किया होगा। धर्मसंस्कारों के बीच जीवनारम्भ करने के उपरान्त , बचपन और यौवन में घोर शारीरिक व आर्थिक कष्टों और गहन मनस्ताप से साक्षात्कार होने पर उनके अन्तर्मन को कथित-काल्पनिक ईश्वर की कृपालुता और धर्म की कर्मकाण्डी स्थूल आस्था की निरर्थकता-निस्सारता का बोध हो गया होगा। तभी उनके अन्तर में अस्तित्ववाद के अंकुर प्रस्फुटित हुए होंगे।

बीती सदी के साठ और सत्तर के वे दशक देश और दुनिया के लिए असाधारण उथलपुथल लेकर आये थे। शीतयुद्ध अपने चरम पर था और सोवियत संघ व अमेरिका एक दूसरे पर परमाणु अस्त्र ताने खड़े थे। भारत की चीन से लज्जाजनक पराजय हुई थी और देश गरीबी और भुखमरी से बुरी तरह जूझ रहा था। स्वतन्त्रता का नशा युवजन के मन से काफूर हो चला था। उन्हें लगता था कि उनकी पिछली पीढ़ी ने राष्ट्र की नींव डालने में ज़रूर कोई-न-कोई भारी चूक कर दी है। शास्त्री राजनीति पटल पर पुच्छल तारे से उभरे और चल दिये , इन्दिरा ने हरित क्रान्ति का सूत्रपात किया , पाकिस्तानी क्षेत्रवाद को धूल चटायी , ‘गरीबी हटाओ’ कहते हुए पोखरण में परमाणु-उच्छ्वास छोड़ा तो लगा कि शायद भटके राष्ट्र को सही दिशासूचक अन्ततः मिल ही गया है। मगर दुनिया में साम्यवाद-पूंजीवाद में तनातनी जारी थी। चन्द्रगामी रॉकेटों को देखने के लिए विश्व अपनी दृष्टि नभ की ओर कैसे उठाये रखता जब रक्तस्राव करते वियतनाम का क्रन्दन अनवरत उसके कान भेद रहा था।

तभी इधर जयप्रकाश के देशव्यापी आन्दोलन का प्रादुर्भाव हुआ , आपात्काल लगा , राजनैतिक आलोड़न-विलोड़न के बीच पंजाब में अलगाववाद जन्मा जिसने इन्दिराजी की बलि ले ली। दुर्भाग्य यहीं नहीं थमा , हिन्दू-सिख दंगे हुए और पंजाब आतंकवाद के अजगर की फाँस में आ गया जो निरन्तर कसती जाती थी। उधर वियतनामी व्रण भरने लगा तो ईरान-इराक़ में एक दूसरा नया व्रण बढ़ने लगा।

इन्दिरास्त के बाद राजीवोदय से अभी आस लगी ही थी कि तमिल अतिवादियों ने उन्हें अनस्तित्व में मिला दिया। जातिवाद और धर्मवाद के मधु-कैटभ के त्रास से कम्पित इस भारत-क्षीरसागर को त्राण दिलाने कोई नारायण नहीं आये। देश को मण्डल और कमण्डल के विषैले दंश लगे और चारों ओर साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ने लगा। उधर बर्लिन की दीवार ढहा कर और सोवियत संघ को ध्वस्त करके पूँजीपति ने अपनी चिरप्रतीक्षित विजय हासिल कर ही ली। तब से बाज़ारवाद बढ़ता गया-बढ़ता जा रहा है , व्यक्ति उत्तरोत्तर वस्तु बनता गया-बनता जा रहा है , मूल्यों का ह्रास होता गया-होता जा रहा है। इस्लामी आतंकवाद का निपीड़क स्फोट सर्वत्र दुःख दे रहा है , जो व्रणों में कर्क-महाव्रण है और जिसे उत्पन्न करने में पूँजीवादी तेल-बाज़ार की महती भूमिका है। बीसवीं सदी बीत चुकी है पर दुनिया इंसान के लिये बेहतर निवास न बन सकी है । वह आज भी मानो वहीं स्थित है जहाँ शतवर्ष पहले हुआ करती थी।

मोहभंग ! और मोहभंग ! अतिशय मोहभंग ! गुरूजी की जीवनगाथा उत्तरोत्तर बढ़ते मोहभंग की कथा है जिसमें अस्तित्ववाद पहले निषेधवाद बना होगा और फिर अन्ततः व्यर्थवाद में परिणत हो गया होगा। यह क्रमिक रूपान्तरण कब और कैसे हुआ होगा यह तो पता कर पाना मुश्किल है , पर आस्थावान् हिन्दू बालक का व्यर्थवादी वृद्ध में कायान्तरण एक ऐसा घटनाक्रम है जिसे मैं उनके सबसे बड़े कर्मोपदेश के रूप में देखता हूँ।

संसार में दुःख सबपर पड़ते हैं , वेदना बहुतों को सताती है , लहूलुहान कई हो जाते हैं पर इन सबके बाद भी हर जीवन-गाथा व्यर्थतावाद को न तो चुनती है और न चुन सकती है। ज्यों-ज्यों कष्ट और पीड़ा की मार व्यक्ति पर पड़ती जाती है , वह ईश्वरीय आस्था को पकडे अपनी मुष्टिका को और ज़ोर से भींच लेता है। जीवन यदि यातनारूप धारण करता है तो वह उस परम सत्ता-रज्जु को छोड़ता नहीं बल्कि दोनों हाथों से और ज़ोर से पकड़ता है। और जब चीत्कार करता उसका कण्ठ रुँधने लगता है तब भी वह दयानिधे ! महाप्रभो ! करुणासिन्धो ! विशेषणों की झड़ी लगाता उसे तलाशता रहता है , जो असल में है ही नहीं। इसी छटपटाहट भरी चीख और पकड़ के साथ वह मर जाता है। यही अधिकांश इंसानों की जीवनगति है जो ईश्वर की कल्पना में जीवन का सार तलाशते हैं , पुण्य और पाप के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं , पुनर्जन्म-क़यामत-प्रलय-स्वर्ग-जन्नत-पैराडाइज़ वगैरह को सोचते हुए पूरी ज़िन्दगी काट देते हैं। यह विचार उनके गले उतर ही नहीं सकता कि जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है , मरने के बाद उनका कोई पुनर्जन्म नहीं होगा , न कोई क़यामत और प्रलय जैसी घटनाएँ घटेंगी , और न सद्कर्म करने वाले ऊर्ध्वलोकों और दुष्कर्म करने वाले अधोलोकों को जाएँगे।

साधारण जन कातर है , उसे मौत का ख़ौफ़ है। इसलिए वह ईश्वर गढ़कर जीवन में सार ढूँढ़ता है , स्वयं के साथ सद्घटना होने पर ईश्वर को आशीर्वाद के लिए धन्यवाद देता है और दुर्घटना हो जाने पर उसी के आगे झोली फैलाकर रुदन करता है। गुरूजी ने अपने जीवन में इसी कातरता पर विजय पायी है और जीवन को व्यर्थवादी माना है। वे महापाषाण ढोकर पर्वत-शृंग पर नित्य पहुँचाते रहने वाले सिसिफ़स से मुझे कम भी लगते हैं और ज़्यादा भी। कम इसलिए जान पड़ते हैं क्योंकि सिसिफ़स के विपरीत मानवदेह त्याग देने के बाद उन्हें इस अनर्थ-कर्म से छुटकारा मिल जाएगा । और अधिक इसलिए क्योंकि वे एक ही पहाड़ पर एक ही महाशिला को ढो कर नहीं पहुँचा रहे , छिहत्तर वर्षों में उन्होंने नित्य नये प्रस्तरों के संग नवीन पर्वतों का आरोहण किया है और निरन्तर करते जा रहे हैं।

गुरूजी मृत्यु से सामान्यजन की तरह क्यों नहीं डरते ? कई लोग यह दलील दे सकते हैं कि वे डरते होंगे , परन्तु उस डर को कहीं भीतर छिपाये रखते होंगे और हम उसे जान न पाते होंगे। परन्तु मृत्यु के प्रति उनकी निर्भयता उन सामान्य सिद्धान्तों पर आधारित नहीं है जिनका प्रयोग साधारण लोग अपने डर को छिपाने के लिए करते हैं। वे किसी ईश्वर को नहीं मानते , किसी कर्मफल के सिद्धान्त में विश्वास नहीं करते , किसी स्वर्ग-नरक में आस्था नहीं रखते , पुनर्जन्म-तिर्यग्योनि जैसी बातों को कपोलकल्पना कहते हैं। उनके अनुसार कोई आत्मा नामक तत्व है ही नहीं जिसे शस्त्र द्वारा छेदा न जा सके , आग द्वारा जलाया न जा सके , जल जिसे गीला न कर सके और वायु जिसे सोख न सके। जो कुछ है , जब तक है , यह शरीर भर है। जब यह शरीर नहीं रहेगा तो कुछ नहीं रहेगा , न कोई आत्मा बचेगी और न उसका पुनर्जन्म होगा। इसलिए बिना कोई बहाना बनाये और ईश्वर की ओर ताके , पूरी इच्छाशक्ति और तल्लीनता के साथ सद्कर्म किये जाने चाहिए। सार्त्र की सूक्ति ‘एग्जिस्टेंस प्रिसीड्स एसेंस’ को आत्मसात् करके वे अपना जीवन जीते चले आये हैं।

किन्तु यहाँ प्रश्न फिर उठता है कि जब जीवन का कोई अर्थ नहीं और कोई परलोक अथवा ईश्वर नहीं तो सद्कर्म-दुष्कर्म क्यों किये जाएँ ? बल्कि सद्कर्म को सद्कर्म और दुष्कर्म को दुष्कर्म गुरूजी कैसे और क्यों मानते हैं ? यहाँ गुरूजी का दर्शन नीत्शे के निःसारवादी सोच के अनुसार यह तो मानते हैं कि मॉरल्स और मॉरैलिटी की कोई निरपेक्ष सत्ता है ही नहीं। पर फिर भी वे उन नीतिपरक सिद्धान्तों के अनुसार ही पुरुषार्थपूर्ण जीवन जीने को सही मानते हैं जिससे अधिकाधिक लोगों को किसी प्रकार से कोई दुःख न पहुँचे , उन नीतिपरक नियमों का चुनाव और उनके तले जीवनयापन करना मात्र उनकी व्यक्तिगत करुण-संवेदी इच्छा पर निर्भर है और इसका कोई अन्य सर्वमान्य ऑब्जेक्टिव आधार-अवलम्ब नहीं है।

गुरूजी हम लोगों से अपने देहावसान की चर्चा करते रहते हैं। पहले यदा-कदा यह विषय उठाते थे , अब अक्सर मृत्यून्मुख हो जाते हैं। हम लोग उन्हें खोना नहीं चाहते , यह जानते हुए भी कि देह नश्वर है — हम इस सत्य को भयभीत होकर नकारते हैं। कभी-कभी उनके शुभचिन्तक यह बहुश्रुत-बहुकथित कामना-वाक्य भी कह बैठते हैं कि , “ईश्वर आपको दीर्घायु करे ! “ उस समय उनकी आनन-भंगिमा पर वह व्यर्थवाद अपनी उपस्थिति साफ़ दर्शाता है।वे ‘ मृत्योर्मामृतं गमय’ के सिद्धान्त से विरोध दर्शाते हैं , उनका मृत्यून्मुख होना अमरत्व-ईप्सा लिए हुए नहीं है। वे इसलिए मृत्यु की बात करते हैं क्योंकि मृत्यु सत्य है , मरना एकदिन सबको पड़ता है , मगर उसमें किसी भगवान्-भगवती के माध्यम से अर्थ तलाशना यह बताता है कि आप उससे कितने डरे हुए हैं। वे अकेले-अनाथ रूप में प्राणत्याग की बात करते हैं , मेरी बुद्धि उन्हें सुनती-मानती भी है लेकिन कुछ ही देर में अनर्थवाद का वह ताना-बाना भावनाओं की तरंगों में प्लावित हो जाता है। आजकल हमारी हर महीने की दूसरी और चौथी फ़ैज़ाबादी शनिवारी शामें इसी भावप्लवनरोधी अनर्थवाद की शिक्षा देते-लेते गुज़रा करती हैं।

मैं चार वर्ष पहले उनके पास साहित्य-पिपासु बनकर गया था। किन्तु उनसे अनवछिन्न होती भेंटों ने मेरे मन में उस मौलिक तत्व का प्रादुर्भाव किया जो हर कर्मवृत्ति से पहले आता है। उन्होंने मुझे जीवन को स्थूलोत्तररूप में जीना सिखाया है , महाप्रस्तर को निरन्तर ढोते हुए पहाड़ की चोटी पर नैराश्यभाव से नहीं बल्कि उत्साह के साथ पहुँचाते रहने का मन्त्र दिया है। उनकी प्रेरणा , उनके प्रोत्साहन , उनकी आशंसा से मेरा विद्यानुराग दिन-दिन और-और बढ़ता जा रहा है। मेरे लेखन-मनन-चिन्तन के वे अनन्य प्रेरक-प्रभावक हैं। वे मेरे ज्ञान-गुरु हैं। वे मुझसे क्या गुरुदक्षिणा माँगते हैं , यह तो वे ही बता पाएँगे परन्तु मेरी ओर से उन्हें सर्वश्रेष्ठ गुरुदक्षिणा यही होगी कि शृंग की उत्तुंगता और महाशिला की गुरुता को मैं विना किसी परमसत्ता से आशीर्वाद माँगता , उसी उत्साह से उठाता जीवन व्यतीत करता चला जाऊँ। व्यर्थ किन्तु जिजीविषा से भरा जीवन जीते हुए साहित्य-सर्जन करने की मैं , उनके गुरुचरणों को प्रणाम करते हुए शपथ लेता हूँ।

“Injustice and filth they throw after the lonely one :but my brother, if you would be a star , you must not shine less for them because of that. And beware of the good and the just ! they like to crucify those who invent their own virtue for themselves-they hate the lonely one .” (Neitzsche)

( कॉपीराइट : स्कन्द शुक्ल। )

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