शकुन्तला और जूलियट

शकुन्तला का अन्त तो बहुत पहले हो गया था , अब जूलियट भी लुप्तप्राय है। जिन्होंने तब शकुन्तला को मार डाला था , वे ही अब जूलियट को भी मार रहे हैं।

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पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या

नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्।

आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः

सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्।।

( वन-देवताओं से भरे हुए तपोवन के वृक्षो ! — जो पहले तुम्हें पिलाये विना स्वयं जल नहीं पीती थी , जो आभूषणों के प्रति गहरे आकर्षण के बावजूद , तुम्हारे प्रति अतिशय स्नेह के कारण तुम्हारे कोमल पत्तों को हाथ नहीं लगाती थी , जो तुम्हारी नयी-नयी कलियों को देख-देख कर फूली नहीं समाती थी , वही शकुन्तला आज अपने पति के घर जा रही है। तुम सब इसे प्रेम से विदा तो दो ! )

( कण्व अपनी पुत्री शकुन्तला के लिए , प्रकृति से विदा माँगते हुए — जब वह दुष्यन्त के पास जा रही है। )

चतुर्थ अंक , नवाँ श्लोक :

अभिज्ञानशाकुन्तलम् ,

कालिदास .

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मैं शकुन्तला को नहीं तलाशता , मुझे पता है , वह नहीं मिलेगी। सत्रहवीं सदी में ज्ञानोदय की जो अग्नि-शिखाएँ यूरोप में उठीं और फिर जिन्होंने यूरोपीय उपनिवेशों को किसी दावानल की तरह अपने आग़ोश में ले लिया , शकुन्तला उन्हीं में जल मरी। पावक-प्रसार इतनी तेज़ी से हुआ कि वह बेचारी वल्कल-वसना आर्त्तनाद भी न कर सकी , भाप के इंजनों की छुकछुक और टरबाइनों के कर्कश कोलाहल ने उसकी वह करुण चीख़ भी दबा दी। मैंने शकुन्तला की व्यथा-कथा स्वयं नहीं देखी है , मेरा तब अस्तित्व नहीं था , इसलिए उस प्रकृति-पुत्री की मृत्यु की मुझे शोकानुभूति भी उस तीव्रता के साथ नहीं हुई । प्रत्येक युग के सुख-दुःख उसके परवर्ती लोग मात्र सुनकर ही जान पाते हैं और अच्छा या बुरा श्रवण दर्शन-जितना प्रभाव नहीं छोड़ पाता।

जनश्रुति के अनुसार निसर्ग-कन्या शकुन्तला का जन्म कालिदास के भारत में मालिनी नदी के तट पर घने वन में डेढ़-दो हज़ार साल पहले हुआ था। इस तरह से जब सत्रहवीं सदी में एनलाइटेनमेंट-रूपी वह आग का सैलाब उठा , तब तक वह पकी उम्र की वृद्धा हो चुकी थी। ( ‘बुढ़िया’ नहीं कहूँगा क्योंकि ‘बुढ़िया’ और ‘बुढ़ापा’ जैसे शब्द किसी व्यक्ति-वस्तु-भाव का अवसान बताते हैं जबकि ‘वृद्धि’ और ‘वृद्ध’ उत्थान। ) तब किसी ने नहीं सोचा था कि शकुन्तला का अन्त इतना सन्निकट है , उसका स्वास्थ्य इतनी शीघ्र बिगड़ जाएगा और इतनी जल्दी वह ‘वृद्धा’ और ‘बुढ़िया’ शब्दों को एक-दूसरे का पर्याय सिद्ध करती दिवंगत हो जाएगी। और ऐसा भी नहीं है कि दाहोपरान्त उस प्रकृति-पुत्री की बिगड़ती तबीयत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसका जन्म ज़रूर भारत में हुआ था , लेकिन अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में इस देश के अपने ही इतने दुःख-दर्द थे कि वह शकुन्तला पर यों अचानक आयी विपदा पर ध्यान ही न दे सका। अद्भुत बात यह रही कि जिसने उसे भयानक दाह दिया , उसीने वैद्यक और चिकित्सा भी दिये। उपनिवेशवाद-रोग से आक्रान्त शकुन्तला की जन्मभूमि की जगह उसकी रोग-शुश्रूषा का बेड़ा भी उस समय यूरोप ने ही उठाया। कॉलरिज , गेटे , रूसो , वर्डस्वर्थ , कीट्स , शेली और बायरन जैसे कवि-चिकित्सकों ने शकुन्तला के प्राण-तत्त्व के रक्षण का भरसक प्रयास किया , लेकिन तर्कवाद-उपनिवेशवाद-बाज़ारवाद की निरन्तर उठती अग्नि-लपटों के आगे उनकी एक न चली। परिणामतः कालिदास की भावजन्य तनया और कण्व की स्नेह-पोषिता पुत्री शकुन्तला का तापतप्त दग्धावस्था में निधन हो गया।

शकुन्तला मर गयी। और उसके साथ ही जलकर भस्म हो गया उसके पिताओं : कण्व और कालिदास का वह तपोवन , जहाँ कृष्णसार मृग-युगल अपनी सींगों से एक-दूसरे की आँखों की कोरों को खुजलाते निश्चिन्त घूमा करते थे , जहाँ वनज्योत्स्ना लता अपने प्रियतम रसाल-वृक्ष से प्रणयालिंगनबद्ध रहा करती थी और जहाँ कोकिल विदाई-गीत गाकर नीरव वन में व्याप्त भय को अपने सुरीले स्वरों से भेद देते थे।

मेरा मन शकुन्तला की विगत मृत्यु पर दुःखी तो होता है , मगर उतना नहीं। मैं अतीत का रोना नहीं रोता , क्योंकि मैं जानता हूँ कि वह बीत चुका है और कोई चाहकर भी उसे दुःखदान्त से सुखदान्त नहीं बना सकता। मगर मैं उसे बचाना चाहता हूँ जो आज मरणासन्न है , जो धीरे-धीरे शकुन्तला की तरह आज कालकवलित हो रही है।

वह जूलियट है , महाकवि शेक्सपीयर के ट्रैजिक नाटक ‘रोमियो एण्ड जूलियट’ की नायिका जो रोमियो से प्रगाढ़ प्रेम करती है और अन्त में उसे विषपान के बाद मरा जानकर अपने पेट में कटार भोंक कर अपनी इहलीला समाप्त कर लेती है। लेकिन शेक्सपीयर की भाव-जन्या और सामन्त कैप्यूलेट की वह भौतिक पुत्री उस कटार के घाव से नहीं मरती , वह तो मात्र उसकी व्यक्ति से समष्टि में मिलने की क्रिया-भर है। बड़े कवि यही जादू तो किया करते हैं , वे कृतियों के व्यक्ति-पात्र को समष्टि-पात्र बना कर उन्हें दीर्घजीविता का ऐसा वरदान दे देते हैं कि उनके जाने के बाद भी वे युगाब्दियों तक मानव-समाज में तात्त्विक रूप में आप्त-व्याप्त रहें।

कालिदास का देहावसान डेढ़-दो हज़ार वर्ष पूर्व ही हो गया , मगर शकुन्तला दीर्घायु हुई। शेक्सपीयर ने पार्थिव शरीर लगभग चार सौ साल पहले त्याग दिया लेकिन जूलियट आज तक जी रही है। मगर अब ? आगे ?

शकुन्तला विशुद्ध वन-कन्या थी , उसका अपने प्रणयी महाराज दुष्यन्त से गान्धर्व-परिणय उस वन के आश्रम में घटा था। अब वह दिवंगता हो चुकी है और उसका वह एकान्त-प्रेम भी। वन अब नहीं होते , आजकल अभयारण्य होते हैं। इतना लम्बा नाम होने के बावजूद न उनमें वन-सी विशदता है , न दुर्गमता। अपने नामों का अर्थोल्लंघन करते हुए वे जानवरों के लिए ‘भयारण्य’ हैं और मनुष्यों के लिए ‘अभय-सुरण्य’। इस तरह से ‘अभयारण्य’ शब्द के ‘अभय’ पर उन्हीं का कब्ज़ा हो चुका है , जिनके पुरखों ने कभी शकुन्तला की ह्त्या की थी। बेचारे जंगली जानवरों के पास क्रूर हँसी हँसती अभयारण्यों की ‘अरण्यता’ भर ही शेष रह गयी है।

वन बढ़ते नगरों को जगह देने के लिए मिटा दिये गये और शकुन्तला नहीं रही ; यहाँ तक तो दुःख का आघात भीषण किन्तु सह्य था। वन काटे गये , नगर बढ़े और उनमें उपवन शोभायमान होने लगे। कालिदास की सौन्दर्य-उदात्तता के इस संकुचन से हमने आख़िरकार समझौता कर लिया। न सही मृगों-सिंहों-गजों से भरे अरण्य , पपीहों-बुलबुलों-गिलहरियों से शोभित बाग़ीचे ही सही। अभी इतने बुरे दिन भी नहीं आये हैं। प्रकृति का वामनीकरण तो हुआ है , मगर वह अभी संजीव है। चलने दीजिए इस युगप्रवाह को , स्वीकारिए इसे , यही युगानुकूल है।

जूलियट का अपने रोमियो से प्रेम अपने ही घर के छज्जे पर परवान चढ़ता है। नीचे उस घर का उपवन है , जहाँ रोमियो छिपकर अपनी प्रेयसी के प्रेमोद्गार सुन रहा है। वह छज्जे से ऊपर चढ़ता है , और उनके बीच परस्पर स्वीकृति दर्शाता युगल-संयोग हो जाता है। मगर यहाँ इस दृश्य में सबसे उपेक्षित जो जान पड़ता है , वह नीचे घर का उपवन है।

उपवन से आवृत रहना रोमियो के चरित्र-निर्माण के लिए ज़रूरी है , ताकि वह अपनी जूलियट के मनोभावों को बिना किसी दुराव-छिपाव के सुन सके। उपवन से निकल कर अनावृत होना और फिर छज्जे पर चढ़ना रोमियो की एकांगी प्रेमनिष्ठा को उभारता है , उसे बड़ा ऊँचा दर्ज़ा प्रदान करता है। छज्जे से झाँकती उसकी प्रेयसी जिस ऊँचाई पर अवस्थित है , वह गम्य है ; रोमियो अपने प्राण की परवाह न करते हुए उस तक पहुँचता है और उसके समक्ष परिणय का औपचारिक प्रस्ताव रखता है।

मैं कालिदास और शेक्सपीयर के बीच एक अद्भुत आत्मीयभाव देखता हूँ , एक ऐसा बन्धुत्व जो उनसे प्रस्फुटित होकर उनके नाटकों के पात्रों और दृश्यों में भी समा गया है। जिस तरह शेक्सपीयर कालिदास के अनुज हैं , उसी तरह रोमियो दुष्यन्त का छोटा भाई है। उसकी प्रणयिनी जूलियट शकुन्तला की परम प्रिय अनुजा है। और-तो-और इटली के वेरोना शहर के उस कैप्यूलेट भवन का वह उपवन भी भारत की मालिनी नदी के तट पर फैले उस वन का ही लघुतर भ्रातृ है।

किन्तु कालिदास से शेक्सपीयर तक का यह कालप्रवाह कई अशुभ घटनाओं का साक्षी भी है। वह सघन वन अब उपवन बन गया है , कण्व के उस सुरम्य आश्रम के जगह कैप्यूलेट-भवन ने ले ली है , पराक्रमी चक्रवर्त्ती दुष्यन्त को षोडशवर्षीय उद्दाम रोमियो ने स्थानापन्न कर दिया है और निसर्ग-कन्या शकुन्तला छज्जे पर अवस्थित कुमारी जूलियट द्वारा विस्थापित हो गयी है।

यहाँ तक जो कुछ घटा था , वह रुचिकर न सही पर स्वीकार्य था। लेकिन अब ? अब उपवन काटे जा रहे हैं और छज्जों की ऊँचाई भी बढ़ती जा रही है। जूलियट निरन्तर रोमियो की पहुँच से ऊपर , बहुत ऊपर उठती जा रही है। वह नादान अब छिपकर अपनी प्रियतमा को सुन नहीं सकता , क्योंकि नीचे छिपने के लिए उपवन ही नहीं है और बहुत ऊँची हो चुकी जूलियट की मधुर स्वीकारोक्ति नीचे तक पहुँच ही नहीं पाती। अब वह दिन आ चुका है जब जूलियट इतनी ऊपर अवस्थित है कि उसकी आवाज़ तो दूर , उसका दर्शन भी नीच खड़े रोमियो के लिए असम्भव है। उपवन न होने के बाद भी वह उसे नीच देख नहीं पा रही और न वह चढ़ कर इतने ऊपर आ सकता है। या शायद नीचे खड़े रोमियो में अब जूलियट की दिलचस्पी नहीं रही , उसके पास निहारने के लिए कोई अन्य ऊँचा गगनचर प्रेमी है जिसे नीचे से ऊपर छज्जे पर चढ़ने की ज़रूरत ही नहीं क्योंकि वह सीधे हेलीकॉप्टर से उसकी छत पर उतरने को आतुर है।

राजकपूर अपनी फ़िल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ में शकुन्तला का पुनर्प्रस्तुतीकरण नहीं कर सके , उनकी वह पहाड़ी लड़की गंगा उसकी महज़ धुँधली प्रतिच्छाया भर है। न राजीव कपूर चक्रवर्ती सम्राट् हुए विना दुष्यन्त के क़रीब पहुँच सकते थे और न पूर्णरूपेण वनवासिनी हुए विना मन्दाकिनी शकुन्तला ही हो सकती थीं। शकुन्तला को दोबारा आज कदापि नहीं जिया जा सकता लेकिन अब सबसे दुखद सच यह नज़र आ रहा है कि आगे जूलियट को भी नहीं जिया जा सकेगा।

अब छज्जे के ऊपर नाचती लड़कियाँ कम होती जा रही हैं और उन्हें देख कर दीवाने होते लड़के लुप्तप्राय। अब ‘अजब प्रेम की गज़ब कहानी’ में छज्जे पर खड़ी कैटरीना कैफ़ में नज़र आती जूलियट की प्रतिच्छाया का लोप सन्निकट है।

यह उद्दाम प्रीति का अवसानकाल है , हम प्रकृतिस्थ प्रणय के अन्धकारयुग में जी रहे है । कैप्यूलेट-भवन के नीचे उपवन के पेड़ों पर कुल्हाड़ियाँ चल रही हैं और एक साथ तीनों मर रहे हैं — उपवन , रोमियो और उसकी जूलियट।

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Yea, noise? Then I’ll be brief. O happy dagger,

This is thy sheath. There rust and let me die.

( अरे यह कैसा शोर ! मुझे शीघ्रता करनी होगी ! प्रिय कृपाण , यह देह ही तुम्हारे लिए म्यान हुई। जाओ , इसमें समाकर ज़ंग खाओ और मुझे मरने दो। )

( जूलियट का कथ्य स्वयं से , आत्महत्या करते समय )

पाँचवाँ एक्ट , तीसरा सीन :

रोमियो एण्ड जूलियट ,

विलियम शेक्सपीयर .

( कॉपीराइट : स्कन्द शुक्ल। )

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