मेरे शहर की लडकियाँ …

मेरे शहर की लडकियाँ 
हमेशा मेरे शहर में नहीं रहती 
चली जाती हैं किसी दुसरे शहर 
हमेशा के लिए
ब्याह रचा कर
और बदले में 
ठीक उसी अनुपात में 
आती हैं लडकियाँ किसी दुसरे शहर से 
उम्र भर यही बस जाने के लिए ,

मेरे शहर में लडकियों 
को फसलों की तरह सीचा जाता है 
फूलों की तरह पाला जाता है 
दीपक की तरह आँधियों से बचाया जाता है 
और फिर सौप दिया जाता 
किसी अजनबी के आँगन को रौशन करने के लिए

मेरे शहर की लडकियों 
को बड़े होने पर सिखाया जाता है 
सलीके से पेश आना,लड़कों से बातें न करना 
कम बोलना ,धीरे हँसना ,जवाब न देना,बर्तन धोना 
झाड़ू लगाना,खाना पकाना ,दुप्पटे सम्हालना 
पति के पाँव छूना
और सब कुछ चुपचाप सहन कर जाना

मेरे शहर की लड़कियों के 
सपनों पर लगा दिए जातें हैं पहरे,
जड़ दिए जाते हैं मोटे-मोटे तालें,
और लपेट दिए जातें है
काल्पनिक जंजीरे 
जिसे तोड़ने की हिम्मत वो कभी नही जुटा पाती

मेरे शहर की लडकियाँ
रोज जाती हैं स्कूल-कॉलेज
जहाँ वे सीखती हैं गणित-विज्ञान की कई विधायें 
अफ़सोस ! ससुराल में खाना बनाते समय algebra के सूत्र काम नहीं आते

मेरे शहर की लडकीयाँ जब चौक से गुजरती हैं 
तो दुपट्टा सम्हालते हुए 
आँखें झुका कर सरपट निकल जाती है 
और उनके पीछे कई आँखें
उसके ओझल हो जाने तक 
उसका पिछा किया करती हैं

मेरे शहर की लडकीयाँ न पान खाती हैं 
न सिगरट पीती हैं,न जीन्स पहनती हैं 
न देर रात तक घुमती हैं
और हर शाम सूरज ढलने से पहले लौट कर
दुपट्टा में दाग लगने से बचाने की कोशिश करती हैं

मेरे शहर के लड़की के 
जवान होते ही
उसके बाप के ललाट पर उभर आती हैं 
चिंता की कई रेखाएं 
जिसकी संख्या दहेज़ के रकम के समानुपाती होती हैं

मेरे शहर की लडकीयाँ 
जब मायके से विदा होती हैं 
तो वहीँ छोड़ आती हैं 
अपने कपड़े,चप्पल 
मेकअप-किट ,परिवार और 
अपने माँ-बाप का दिया उपनाम

मेरे शहर की लडकियाँ काट देती हैं 
अपनी तमाम उम्र 
चार-दीवारों के बीच 
समाज की रस्में-कसमें निभाते- निभाते

बड़ी अजीब हैं मेरे शहर की लड़कियाँ 
क्या तुम्हारे शहर में भी कोई ऐसी लड़की रहती है ?

-अमन सिन्हा ‘अभि’