सफ़र ..

सुबह से शाम तक बस इतना सफ़र तय कर पाता हूँ 
एक भीड़ से निकलता हूँ ,एक भीड़ में खो जाता हूँ

किधर जाना है,कहाँ रुकना है, मालूम नहीं कुछ भी
एक बार जो निकलूँ तो बस मुसलसल चला जाता हूँ

इस भीड़ में घिस गयी है पहचान मेरी अब 
आइने में देखूँ तो अजनबी नज़र आता हूँ

कई किरदार सौप रखें हैं ज़माने ने मुझको
तुम हर रोज मिलो मुझसे ,मैं हर रोज़ अलग नज़र आता हूँ

गुलिस्तां में बैठा था तो इक बूंद भी मयस्सर नहीं हुई मुझको
अब सहरा में बैठकर मैं अपनी तिश्नगी बुझाता हूँ

नशेमन सी हालत हो गयी है , मेरी ज़िन्दगी की अब 
एक तूफां आता नही कि मैं तिनका-तिनका बिखर जाता हूँ

उधर वो सोचते हैं ऐश में गुज़र रहे हैं वक़्त मेरे
इधर पुरा महीना बेच कर थोड़ी तन्खाव्ह पाता हूँ

सुबह से शाम तक बस इतना सफ़र कर पाता हूँ 
एक भीड़ से निकलता हूँ ,एक भीड़ में खो जाता हूँ

-अमन सिन्हा ‘अभि ‘