ghazal

आज उसके मज़ार पर दिया चढ़ा दिया, 
कल शाम जिसे जीते-जी सूली चढ़ा दिया।

लोरी सुनाने की जब ताक़त ही न बची, 
चूल्हे पे देग़ची ही को ख़ाली चढ़ा दिया।

मेरे हिस्से का तो उस में कुछ था ही नहीं,
लड़कपन में अपना हाथ आगे बढ़ा दिया।

मैंने कहा दुनिया में अकेला बहुत हूँ मैं,
उसने मुझे रूहानियत का पाठ पढ़ा दिया।