महात्मा


एक श्वेत नदी साबरमती से
चली सागर को मिलने दांडी;
एक रेत भरी मुट्ठी जो उठी
वो, प्रतिरोध की थी आँधी।
चप्पल सादी, धोती खादी,
पर नेतृत्व की हमारी शाही
ना था, ना है, और ना होगा
कभी गांधी जैसा क्रांतिकारी।

बन्दे में था दम,
वन्दे मातरम।

हाथ कभी न उठाते थे,
पर सर न कभी झुकाते;
गाल पे थप्पड़ खाते, पर
गालियों पे उतर न आते।
स्वराज की जंग को लड़ते
थे वे, अहिंसा के आधार पे..
क्योंकि आँख के बदले आँख..
माँग के यह संसार है अंधकार में।

बन्दे में था दम,
वन्दे मातरम।

सैकड़ों दिनों तक बापू जेल में रहे,
और हज़ारों मुश्किलें, उन्होंने सहे..
ताकि, पैतीस करोड़ की आबादी को
और उनके संतानों को आज़ादी मिले।
जब वो मरे, तो एक योद्धा की तरह
ना घुटनों पे — ना अपनी पीठ पे लेटे।
कातिल ने भी सबसे पहले, अपने
हाथ जोड़े और नतमस्तक हुए।

बन्दे में था दम,
वन्दे मातरम।

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