जिंदगी इक जुआ

रंज ये नहीं कि मुहब्बत न हो पाई हासिल

गम ये, कि तब मैं नहीं था खुद में शामिल

नक्शों में गुम, रास्तों के हमसफर नहीं बनते

कैसे मील के पत्थर पे, वार दे वो मंज़िल

जिसके दिल न हो पानी, बसात कहाँ से लाए

सूखे कुएँ में चाँद दिखना , है खासा मुश्किल

लोग बुरे कम बदनाम ज़्यादा किए जाते हैं

पहलवान वक्त के दाँव,अक्सर उधर कातिल

ज़ाहीद रखियो मुहाफ मुझे,आती बद्तमीज़ी पे

बंधन का तय, इक रोज़, बगावत मुस्तकबिल

कुछ अपनी नीयतों पे मुझे, मुसलसल शक रहा

कुछ वादा भी आपका न था ऐतबार के काबिल

तू कौन सा रोज़ रोज़ हमारे घर चला आता है

जा, नहीं होते हम, तेरी बनाई फिरदौस में दाखिल

अक्ल ओ जोश जो न दिल ए मासूम के हमगवाह,

सजावार, कचहरी ए दुनिया में ठहरता मुवक्किल

डूबने से डरने वाले, पानी पे क्या चलेंगे “सागर”

कुश्ती ए तूफाँ, कश्ती ए इंसा का होता साहिल

More read here: http://www.sva-haa.com/

One clap, two clap, three clap, forty?

By clapping more or less, you can signal to us which stories really stand out.