कुए पर प्यासा

गौधूली वेला हो चुकी है। 
गौधूली का मतलब शाम होने से पहले का वो समय जब गायें खेतों से चरकर घर लौटती थी । उस समय सारा आकाश गायों के चलने से उड़ने वाली धूल से धूसरित हो जाता था।
और आज मैं अपनी प्यारी गाय श्यामा को आखिरी बार तिलक लगाके,उसकी पूजा करके, मन ही मन माफ़ी मांगता हुआ दूर किसी खेत में छोड़ने जा रहा हूँ।

कहते है स्त्री सबसे सहृदय होती है। ममता की मूरत होती है। लेकिन जब उनके परिवार और खासकर बच्चों पर संकट आ जाये तो उससे कठोर ह्रदय कोई और नहीं हो सकता है।
कितना कहा मैंने सावित्री को की श्यामा को इस तरह न छोड़े। लेकिन वो बिल्कुल अड़ गयी।
उसकी भी गलती नहीं। जहाँ खुद का जीना मुश्किल है वहाँ गाय की जिम्मेदारी कैसे ले।
किसी भी विपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित स्त्रियां ही होती हैं। सावित्री मीलों दूर से पानी ले कर आती है, मशीन की तरह लगी रहती है।
गाय जितनी सावित्री को प्यारी थी उतनी किसी को नही हो सकती थी। लेकिन मजबूरी इंसान को स्वार्थी बना ही देती है।

रास्ते भर मै सूनी आँखों से प्रकृति का तांडव देख रहा था।
सब कुछ सूखा पड़ा है। दूर दूर तक कोई पेड़ नही। कोई जगह नही जहाँ आदमी टिक कर बैठ जाये।
जिस रास्ते पर हर 100 मीटर पर प्याउ हुआ करती थी, यहाँ तक की पशुओं के लिये भी पीने के पानी का इंतजाम होता था। वहाँ 3 किलोमीटर चलने पर भी कुछ नही हैं।
पिछले 3 4 साल से बारिश कम कम हुई तो इस बार बिल्कुल ही नही हुई।
गांव में खेती पर ही जीवन निर्भर होता है और खेती पानी पर।

“और पानी!! वो तो अब बचा ही कहाँ है।”

मेरे देखते देखते क्या हालत हो गयी है गांव की। यूँ सालों बारिश का कम होना कोई नई बात नहीं है
लेकिन इस बार के सूखे ने जो भयावह हालात पैदा किये हैं शायद उसके लिए मै ,मेरा परिवार, मेरा गांव यहाँ तक की पूरा देश जिम्मेदार है।
मै बस यही सोचता हुआ चला जा रहा था। अचानक मेरी नजर सड़क के बाई ओर बने हरिया के घर पर चली गयी।
उसके घर के बाहर टेम्पो खड़ा था। पीछे एक मिनी ट्रक था जिसमे घर का सामान बंधा रखा था।
“ओह तो हरिया गांव छोड़ के जा रहा है”,मैंने मन ही मन सोचा।
इतनी देर में उस घर से एक नौजवान युवक निकला।
उसने मुझे आवाज दी,”राधे काका!! कहाँ जा रहे हो?”

मैंने ध्यान से आवाज देने वाले को देखा। हरिया का बेटा किशन आवाज लगा रहा था।
हरिया उम्र में मुझसे काफी बड़ा था। लेकिन उसके बच्चे मुझे काका ही कहते थे बचपन से।

मै सकपका गया। कैसे कहता की गाय को घर से दूर छोड़ने जा रहा हूँ।
मैंने बात बदलते हुए कहा,” वाह बेटा!! तुम तो बहुत बड़े हो गए हो। जब से शहर गए हो मिलना ही नही हो पाया।
बहुत दिनों बाद आना हुआ।”

किशन ने जवाब दिया,”हाँ काका!! यहाँ बचा भी क्या है जो आता। माँ बापू को ही शहर बुला लेता था।
आज इनको भी शहर लिए जा रहा हूँ। हर साल सूखा पड़ रहा है।हर साल की यही परेशानी है।”

मैंने सहमति दिखाते हुए बुझे मन से हामी भर दी।

इतनी देर में हरिया भी लाठी टेकता हुआ बाहर आ गया।
“क्या बात है राधे!! तुम तो दिखाई नही पड़ते आजकल।”
“बस हरिया भाई यूँ ही काट रहे हैं जिंदगी!!”,मैंने जवाब दिया।
हरिया ने बात आगे बढ़ाते हुए पूछा,”अच्छा राधे एक बात तो बता !! वो गांव वालों और तुम्हारे पिताजी के बीच सुलह हुई या नही।”

हरिया का इशारा मेरे पिताजी से गांव वालों की चल रही नाराजगी की तरफ था।
मेरे पिताजी इस गांव के मुखिया रह चुके थे। हमारे घर के सामने एक कुँआ था। मेरे पिताजी ने अपनी रसूख से अतिक्रमण करके उस कुँए तक हमारे घर को बढ़ा लिया। वो कुँआ बहुत अच्छी जगह पर था। बहुत गहरा था। पहले पानी की कमी नही थी तो किसी गांव वाले को कोई दिक्कत नही थी।
लेकिन अब सूखा पड़ रहा है तो सभी गांव वाले उस कुँए पर पानी भरने आना चाहते थे।
लेकिन वो कुँआ कबका सूख चूका था। गांव वाले ये मानने को तैयार ही नहीं थे। गांव वाले चाहते थे की उस कुँए को और गहरा किया जाये। 
ऐसा नही है की पिताजी ने कोशिश नही की लेकिन उसके नीचे कठोर चट्टान थी और आगे खोदना संभव नही था।
पिताजी पुरानी नीतियों में बहुत विश्वास होने के कारन किसी नीची जाती वाले को अंदर नही घुसने देते थे।
बस इसी बात पर एक दिन कालू जो की दलितों में प्रमुख था, उसकी पिताजी से बहस हो गयी। वो जबरदस्ती अंदर घुस आया और सूखे कुँए को देख कर निराश होकर चला गया।

मेरे पिताजी को यह बहुत नागवार गुजरा। मैंने पिताजी को बहुत समझाया की ये भेदभाव कितनी गलत सोच है।
भेदभाव करने वाला व्यक्ति खुद कितना नीचे गिर जाता है।
लेकिन उनके मन में क्या चल रहा था उसको जान पाना मुश्किल था।
उस घटना के बाद वाद विवाद बढ़ता ही गया।
आज लगातार 4 सालों से सूखा पड़ने पर जमीदार और मजदूर सब एक ही श्रेणी में है।
पिताजी ये सब सहन नही कर पा रहे हैं।
हालाँकि मै उंच नीच में विश्वास नही करता लेकिन उनकी व्यथा मै समझता हूँ।
किसी राजा जैसी जिंदगी जीने वाले आदमी को परिस्थिति वश अपने सेवकों जैसा जीवन जीना पडे तो उसका अवसाद ग्रस्त होना तय है।

खैर हरिया को जवाब तो देना ही था।

मैंने उसे कहा,” नहीं हरिया अब सबकुछ कहाँ से ठीक होगा। बात बहुत बिगड़ चुकी है। गांव वाले गलत नहीं, पिताजी समझने की कोशिश नही करते ।शायद मौसम के साथ इंसान का मिजाज भी बदलता है।पिताजी का स्वभाव भी बिल्कुल सूखा हो गया है। मानवता की नमी भाप बनकर उड़ चुकी है।”

एक ठंडी आह भरते हुए मैंने कहा,”सुनो जरा जाने से पहले किशन को घर ले आना। पिताजी देखेंगे तो खुश होंगे।मै अभी एक जरूरी काम निपटा कर आता हूँ।”
ऐसा कहकर मैंने सोचा पिताजी का थोडा मन हल्का होगा ।
उन्हें ख़ुशी होगी की गांव छोड़ते हुए हरिया ने मुझे याद किया। 
ख़ुशी से ज्यादा उनके अभिमान के पेड़ की सिचाई हो जायेगी।

हरिया और उसके बेटे किशन से विदा लेकर मै कुछ हरे से पेड़ पौधों के पास श्यामा को छोड़ आया।
मुझे पीछे मुड़कर देखने के हिम्मत नही हुई।

वापस आते आते 8 बज चुके थे। दूर से एक घर से धुँआ उठता हुआ दिखाई पड रहा था।
वो दिशा मेरे घर की ही थी।
मेरे मन में एक सिहरन सी उठ गयी।

कदम चलते चलते कब भागने की मुद्रा में आये पता ही नहीं चला।
मेरे घर के बाहर कुए के पास बनी फसल रखने की घास फूस से बनी झोपडी धू धू करके जल रही थी।

मेरी पत्नी और बच्चे बदहवास से उसे देख रहे थे। पूरा गांव इकठ्ठा हो गया था।

मुझे देखते ही वो चिल्लाई अंदर पिताजी हैं।
कुछ क्षण मै पत्थर जैसे जड़ हो गया। फिर अचानक से इधर उधर भागा, जोर से चिल्लाया ,अरे कोई आग बुझाओ। पानी लाओ कहीं से। जल्दी से पानी लाओ।

सन्नाटा पसर गया। सारे गांव वाले मेरा मुह ताकने लगे।
पानी कहाँ था।
मै भागकर अंदर गया और हांडा उठाया तो मेरी बीवी ने आकर मेरे हाथों से छीन लिया।

“पिताजी गुजर चुके हैं। एक हंडे से कुछ नही होगा।
मेरे बच्चे प्यासे मर जायेंगे। मै तुमसे भीख मांगती हूँ इसे छोड़ दो।”, सावित्री की आँखों से बेचारगी छलक रही थी।
शायद सावित्री ठीक ही कह रही थी। पानी सिर्फ सावित्री की आँखों में ही बचा था।

बाहर आकर कुँए की मुंडेर पर बैठ कर अपने जीवित पिता को राख होते देखता रहा।

पिताजी सावित्री और बच्चों का यूँ पानी के लिये भटकना बर्दाश्त नही कर पा रहे थे। चिड़चिड़े होने के कारण जब देखो तब गांव वालों से लड़ाई कर लेते।
जब उन्हें पता चला की मै आज शयामा को छोड़ने गया हूँ, उन्हें लगा की मै भी इन लोगों पर बोझ बन गया हूँ।

शोरगुल सुनकर हरिया और किशन भी आ गए।रात हो गयी थी पिताजी की अन्तिमक्रिया कल ही संभव थी। पूरा गांव वही बाहर खुले में जमीन पर बैठ गया।
सब इस नज़ारे से घबरा से गए थे। सभी आँखों में आँसू भर के बैठे थे।
पता नही आंसू पिता की दर्दनाक मौत पे थे या अपनी बेचारगी पे थे।

अचानक किशन ने सन्नाटा तोडा। 
“क्या चाहते हैं आप सब लोग। देख रहे हैं क्या हालात हैं।
क्या कभी किसी ने सोचा है ये सब क्यों हुआ। इस सब का जिम्मेदार कौन है। मै अपने माता पिता को शहर ले जाने वाला था। लेकिन कब तक हम ऐसे भागते रहेंगे।

आज इस गांव में पानी ख़त्म है कल शहर में होगा। हो सकता है आज शहर में जिंदगी आसान है लेकिन कल
मेरे बच्चों और पोतों की फिर से यही हालत होगी।”

अचानक से कालू बोला ,” किशन !! ज्यादा भाषण मत दो। हम सब पिछले चार साल से यही सोच कर एक दुसरे को दोष दे रहे हैं। कोई उपाय है तो बताओ।
नही तो ऑटो पकड़ के शहर चले जाओ। बहुत आसान है दोष देना। “

किशन दो मिनिट रुका। 
“आज मै तुम लोगों को एक कहानी सुनाता हूँ, कहानी है एक गांव की। एक छोटे से गांव की , और उसके कम पढ़े लिखे लोगों की।
जो इस समय धरती माँ को चाहिए उसके लिये पढ़ा लिखा होने की जरूरत भी नहीं है। सिर्फ दो हाथ और दिल में जज्बात होने चाहिए।
वो छोटा सा गांव है , राजस्थान के एक जिले राजसमन्द में। उस गांव का नाम है पीपलान्द्रि।
उस गांव में लोगों ने एक उपाय किया। जब भी किसी के घर में बेटी जन्मती उन घरवालो को 101 पेड़ लगाने होते। आम, आँवला, नीम कई तरह के वो उस लड़की के साथ ही बड़े होते। पेड़ों की छाया में एलोवीरा के पेड़ लगा दिए। उनके आचार जैल बनाके बेचने लगे।
कोई मर भी जाता तो उसकी याद में 11 पेड़ लगा देते।

आज उस गांव में हरियाली का आप अंदाज लगा सकते हो। आप सब लोग पैसो के चक्कर में ऐसी फसले लगा रहे हो जो बहुत पानी मांगती हैं।
ये फसले गांव के पर्यावण को भी नही जचती।
आप सब लोग फसल लगाने से पहले एक बैठक क्यों नही करते की कौन व्यक्ति कौनसी फसल ऊगायेगा।

ये जो रंगाई की फैक्टरी है इसके मालिक को बोलो की अपने फैक्टरीे से निकलने वाले गन्दे पानी को रीसायकल करे नहीं तो अपनी फैक्ट्री को ताला लगाये।

अपने नित्यकर्म के लिए बाथरूम बनाओ। ताकि तालाबो झीलो के पास मल की गन्दगी न जमा हो।
हम सबको सारे झीलो तालाबो को साफ़ करना चाहिए।
इस साल मानसून विभाग ने बहुत अधिक बारिश होने की सूचना जारी की है। 
इस का फायदा उठाना होगा। यूँ मायूस कब तक बैठे रहेंगे।
इस साल अमृत बरसेगा सारे छतो के नालों को जोड़ के टैंको में पानी इकट्ठा कर लेना होगा।
ये संकट हम सबकी देन है इसे दूर भी हमें ही करना है।”

किशन ने उपाय सूझा दिया था। लेकिन अमल हमें ही करना था।
एक पल को मुझे इन गांव वालों से नफरत हुई, पिताजी की मृत्यु की मुख्य वजह यही थे।
लेकिन वो बेचारे तो मेरे साथ दुःख में खड़े थे। अगर आज मै उठ खड़ा होकर किशन की कही गयी बातों को गांव वालोँ से कहूँगा तो वो समझ जायेंगे।
किशन की सारी बाते अच्छी लगने लगी क्योंकि यही इस समस्या का हल है।
सबके साथ आये बिना विकास कैसे होगा।

इन्ही विचारों में खोये हुए कब सवेरा हो गया पता ही नही चला। सारे गांव वाले वहीँ बैठे थे पूरी रात।पिताजी को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने लगे तभी जानी पहचानी घण्टियों की आवाज आने लगी।
मैंने मुड़कर देखा तो दरवाजे पर श्यामा खड़ी थी।

आखिर जानवर ने भी हार नही मानी और अपना रास्ता ढूंढ लिया।
हम तो इंसान है, हमें भी रास्ता मिल जायेगा है ।
बस चल पड़े तो मंजिल पर पहुच ही जायेंगे।

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