बगल वाले प्लॉट में

बगल वाले प्लॉट मेंआज की सुबह बेचैनी से भरी थी। वैसे नया कुछ नही है।
और in your late 20’s ये सबकी आदत हो जाती है।
हमेशा 1–2 दिन पहले से थोड़ा टेंशन होता था लेकिन यहाँ आने के बाद तो हफ्ते पहले से परेशान हूँ।
सोचा ऑन्टी से पूछ लूँ लेकिन वो झिझक नही जाती चाहे कितना भी मोर्डन होने का फितूर पल लें।
उन दिनों आपको कुछ नियम मानने पड़ते हैं और इन पर महिलाओं ने कभी बैठ कर बातें नही की इसलिये इसका कोई पैटर्न भी नही।
शुक्र है मेरी मम्मी थोड़ी तार्किक हैं और भगवान की पूजा के अलावा मुझे किसी चीज से परहेज नही करने देती, लेकिन यहाँ मैं किरायेदार हूँ।
बहुत फर्क है।
मुझे इन नियमों से गुरेज नही मेरी असली चिंता तो डस्टबिन का ना होना है। यहाँ घर के बाहर पूरी गली में दूर दूर तक कोई डस्टबिन नहीं। बस हर जगह कचरा जरूर दिख जाता है।
मिशन था कचरा फेकने की सुरक्षित जगह तलाशने का। एक दिन ऑफिस सफाई कर्मी से पूछा की कहाँ जाते हो ये सब रद्दी फेकने, वो बोला की वो खाली प्लॉट है ना मैडम! आपके रूम के बगल में वहीँ जाता हूँ।
वो खाली प्लॉट तो दिन में दस बार आता है रास्ते में लेकिन वो जगह तो बिल्कुल ओपन है एक तरफ सड़क, ठेला लगाकर बैठा आदमी तो दस बार बैंक में आता है, उसके बिल्कुल सामने

मेरा बैंक है। और वहां कितने सूअर घूमते रहते हैं जो की किसी के कुछ भी डालते ही उस कचरे की पोटली का तुरंत पोस्टमार्टम कर देते हैं।
ओह नहीं। इस से बुरा कुछ नही। 
आखिर ऑन्टी से पूछ ही लिया और सारे नियम भी सुन लिये लेकिन असली मुद्दा था की कचरा कहाँ फेकना है और जैसा मुझे अनुमान था प्लॉट ही आखिरी रास्ता था।
जब वहां ही डालना है तो सुबह अंधेरे से अच्छा कुछ नहीं लेकिन 8 बजे उठने वाली 6 बजे उठकर पजामे में बाहर जाये अंकल पक्का समझेंगे पर क्या किया जा सकता है।
लेकिन 8 बजे वाली को 6 बजे क़यामत भी नही उठा सकती उस दिन पता चला।
अब तो शर्मिंदगी से कोई नही बचा सकता यह सोच कर उसे थोडा टाल लेना ही बेहतर लगा।लंच टाइम में जब आउंगी तब डाल जाउंगी सोचकर सुबह प्लाट का निरीक्षण करते हुए बैंक गयी। टाइमिंग परफेक्ट होनी चाहिए न कोई देख रहा हो और सूअर मेरे जाने के बाद चीर फाड़ करे। इतने में दो लडकिया धीरे धीरे चलते हुए आयीं । उनके हाथों में एक काली पॉलीथीन थी। दुसरे हाथों से एक दुसरे का हाथ पकडे हुए। 
पॉलीथीन डालकर वो पी टी उषा से भी तेज भाग खड़ी हुईं। मन बड़ा खिन्न हुआ कैसे समाज में हम रहते हैं महिलाओं की बेसिक इतनी छोटी सी समस्या भी नही समझते और मैं भी शिकार हूँ। बहुत सोचा, मन परेशान था खुलेआम ऐसे कचरा फेकना सिद्धान्तों के खिलाफ था। मन को थोड़ी तसल्ली दी की आते हैं ना नगर पालिका वाले 10 -15 दिन में एक बार। 
आखिर कचरा वही डालना था बगल वाले प्लाट में। बहुत खुशि हुई थी स्वच्छ भारत अभियान का सुनकर।
आज 2 साल हो गए हैं अभी भी कचरा वहीँ डालती हूँ
बगल वाले प्लाट में

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