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“मिस्टर रोबिन्द्रो!! आपकी क्लाइंट कहाँ है। कोर्ट का समय बर्बाद हो रहा है। आप तो इतने नामदार वकील हैं, समझते हैं। कहाँ है, मिस नीरजा घोष्।”, जज की आवाज गूंजी।
वही हुआ जिसका डर था।
माँ नहीं आयी। इतना समझाने पर भी, वो नहीं आयी।
“जज साहब! मेरे क्लाइंट की तबीयत ठीक नहीं है कृपया मुझे कुछ समय की मोहलत दीजिये।”, मैंने कहा।
“ठीक है रोबिन्द्रो दो दिन का समय है तुम्हारे पास। तुम्हारे आरोप बहुत गंभीर है। दुसरे पक्ष के मिस्टर ओरबिंदो चोकरोबर्ती भी बहुत रसूखदार हैं। “, जज साहब ने शब्दों को कड़क कर के कहा।

“जज साहब! नीरजा घोष मेरी माँ हैं, इस केस का तालुक मुझसे भी उतना ही जुड़ा है। मेरे अस्तित्व से जुड़ा है ये मुकदमा। मै भी अदालत का कीमती वक़्त ख़राब नही करना चाहता।” मेरे ऐसा कहते ही पूरी अदालत में सन्नाटा छा गया।
मुझे पांच साल हो गए थे इस अदालत में प्रैक्टिस करते हुए। डिक्टेशन लिखने वाला बाबू, दरवाजे पे मुनादी करने वाला , चौकीदार से लेकर, जज साहब के बगल मे खड़े लोगों तक सभी रोबिन्द्रो बाबू को जानते थे।
कटघरे में खड़ा आदमी अपने चश्मे के पीछे छिपी बूढी आँखों से मुझे घूर के देख रहा था।
शायद अपने जवानी के चेहरे से मेरे चेहरे की तुलना कर रहा था। मुझे और किसी के कुछ कहने या सोचने का कोई फर्क नही पड़ता लेकिन ये बूढी आँखों जो मेरे ऊपर टकटकी लगाये है, मेरे अंदर एक ज्वालामुखी को जन्म दे रही थी।
आदमी पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ ,गुस्सा दोनों मे जानवर पैदा कर देता है। मुझसे अच्छा ये कोइ नही समझता हजारो केस लडे है मैंने।
मुझ जैसे ऊँची फीस लेने वाले वकीलों को पढ़े लिखों का ही केस मिलता है।
लेकिन मुझे जानवर नहीं इंसान बने रहना है।
मुझे अपने साथ हुई नाइंसाफी का बदला कानूनी तरीके से लेना है। माँ भी अजीब हैं , कितने दिनों से इतना कुछ छुपा के बैठी हैं। पूरी जिंदगी अकेले गुजार दी इस आदमी की वजह से।
और अब जब मै उनको इन्साफ दिलाना चाहता हूँ, खामोश हो गयी हैं।
आज मुझे उनसे बात करनी ही होगी। मन में दृढ निश्चय करके मै घर की तरफ लौट गया।
“चलो ड्राईवर!! घर चलो।”, मैंने कार का दरवाजा खोलते हुए कहा।
“आज बड़ी जल्दी बाबू साहब!!”
पहले ही बहुत देर हो चुकी है रामू काका। आप घर चलिए।

कार में बैठे हुए मै अपने अतीत के पन्नों में खो गया
मेरी माँ नीरजा घोष अपनी शर्तों पर जीने वाली जिंदादिल महिला थी। मै और माँ हम एक दूसरे के लिये पूरी दुनिया थे। माँ बहुत हँसमुख थी लेकिन जब भी मै बचपन में पापा के बारे मे पूछता। माँ कुछ कहती नहीं लेकिन बहुत खामोश हो जाती थी।
जब थोडा बड़ा हुआ तो कहा गया माँ का तलाक हुआ था। खून के रिश्ते तो भाग्य से मिलते हैं लेकिन प्यार से बुना हुआ रिश्ता बिखरता है तो बहुत तकलीफ होती होगी। इसलिये माँ से कभी पूछा ही नहीं।
अबकी बार बड़े दिन बाद नानी आई थी। मैंने बहुत बार महसूस किया की नानी हमेशा माँ से थोड़ी खिची खिंची रहती थी। हमेशा माँ के निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल उठा दिया करती थी।
वकील होने की वजह से हाव भाव से ही समझ जाता हूँ।
एक दिन उनसे बातों बातों में पूछ ही बैठा ।
नानी ने जो बताया उस पर यकीन नही हुआ।
मुझे जब से पता चला की माँ के साथ ये सब हुआ मुझसे रहा नही गया।
रात के वक़्त खाने की टेबल पर मेरे अंदर चल रही बेचैनी का उनको अहसास हो गया था।
“क्या हुआ रोबि?कुछ कहना चाहते हो!”, माँ ने पूछा।
“कुछ नहीं माँ!”, मैंने खाने की थाली में इस तरह देखा जैसे उसमे ही घुस जाऊंगा।
“रोबि! मै जानती हूँ, नानी माँ से तुम्हारी बात हुई थी। जो पूछना चाहते हो। पूछ सकते हो।”, माँ बहुत शांत थी।
दो तीन मिनट तक हम में से कोई नही बोला।
मेरे लिये ये तूफान के पहले वाली शांति थी। और माँ के लिए तूफान के गुजरने के बाद वाली।
“माँ मै उस आदमी के खिलाफ मुकदमा करना चाहता हूँ।मै इतना बड़ा वकील होकर आपके साथ हुई नाइंसाफी का बदला नही ले पाया तो ये सब महत्वहीन है।”, मै एक सांस में बोल गया।
“तुम्हे इस सब से ख़ुशी मिलेगी तो मै रोकूँगी नहीं। लेकिन मै अदालत मे नही जाउंगी। तुम अपने हिसाब से जो करना चाहो कर सकते हो।”, माँ कह के उठ कर चली गयी।
मैंने मन मन ही निश्चय किया की माँ को थोड़ी हिचक होगी।लेकिन मान जाएंगी। मेरा डीएनए टेस्ट ही काफी है प्रूव करने के लिए।मै उस आदमी को छोडूंगा नहीं।

अदालती प्रक्रिया सुरु हुई, और आज का दिन आ ही गया। केस छोटा ही था। सुरु में अपील नीरजा घोष के नाम से ही हुई था। मैंने सारे सुबूत इकठ्ठा किये। डीएनए टेस्ट को मैंने आखिरी हथियार के रूप में रखा था। 
माँ और ओरबिंदो live-in में रहते थे।
पड़ोसियों, ऑफिस वालों और करीबी दोस्तों को ढूंढना मुश्किल न था।
मैंने आसानी से प्रूव कर दिया । शादी का वादा करके धोखा देने वाले के लिये हमारे देश में कड़े कानून हैं।
लेकिन अचानक से बचाव पक्ष के वकील ने दलील दी की मिस्टर ओरबिंदो ने कभी शादी का वादा नही किया था।
बहुत ही अजीब दलील थी लेकिन माँ के कोर्ट आये बिना इसका जवाब नही दिया जा सकता।
इसीलिये माँ को लेने घर आ रहा हूँ।

तभी ड्राईवर काका बोले बाउजी घर आ गया है।
कार से उतर कर सीधेे माँ के कमरे में गया।
“माँ आपको कोर्ट चलना होगा। मै लगभग केस जीत गया हूँ। लेकिन बचाव पक्ष का वकील अजीब कुतर्क पर उतार आया है। अपने सारे पैंतरे आजमाँ रहा है।
कहता है की मेरे मुवक्किल ने कभी शादी का वादा नहीं किया था। आप चलिये प्लीज।”, मै वैसे ही जिद कर रहा था जैसे बचपन में प्ले स्टेशन के लिये करता था।
“रॉबी वो वकील ठीक कह रहा है। ओरबिंदो ने मुझे शादी का वादा नहीं किया था।”

“माँ फिर आपने ऐसा क्यूँ किया? ऐसा कैसे हो सकता है।आप मुझे सच बताइये।”,मैंने बेबसी से उनको देखा।

“रॉबी!! मै ओरबिंदो से बहुत प्यार करती थी। आज से पचीस साल पहले सबकुछ इतना सीधा नहीं था। वो इक्कसवीं शताब्दी थी। हमारी नयी पीढ़ी से बदलाव की सुरुआत हुई थी। हम बहुत कंफ्यूज थे जब हमारे मतलब की बात होती थी हम सेक्युलर , मोर्डन बन जाते थे। कभी जाती धर्म सिरे से नकार देते थे। दुसरे ही दिन माँ बाप के बहाने से ‘ऐसा ही होता है’ कहके पतली गली ढून्ढ लेते थे।
शादी बोझ लगती थी। बड़े शहरों में खुले विचार वाले साथ में live in में रहने लगे थे।
मुझे ओरबिंदो को देखते ही प्यार हो गया था। उसे भी था शायद लेकिन प्यार की भी डिग्री होती हैं। पहले लोग like करते हैं, फिर crush होता है। फिर अगर दुसरे को भी आप पसंद हो तो love होता है। लेकिन रॉबी सिर्फ प्यार ही काफी नहीं, किसी भी संबंध का अंत आदत होती है।
आदत होना बहुत जरूरी है।
मुझे उसकी आदत थी, मैंने उसके साथ रहने का निर्णय किया। कितनी भी मोर्डन लड़की हो उसका सपना होता है, एक छोटा सा 2 bhk का घर हो जहाँ उसकी मर्जी चलती हो।
रही ओरबिंदो की बात , जब भी भविष्य की बात होती वो कहता रहता था की नहीं हो पायेगा।
मै पूछती की क्यों नही हो पायेगा, सामने से कोई तर्क नही आता बस जवाब आता “ बस नहीं हो पायेगा। हम दोनों अलग जाति से हैं, माँ पापा नही मानेंगे।
तुम्हे भी अभी लग रहा है, नीरु! एक वक़्त आएगा जब तुम्हारा अपना परिवार होगा तुम मुझे याद भी नही करोगी। वर्तमान में जियो बस इसको एन्जॉय करो।हसोगी की एक वक़्त तुम कितनी पागल थी।”

मै कहती एक बार दिल से कोशिश तो करो ओरबिंदो, मेरे लिये।हो सकता उन्हें पहले मै अच्छी ना लगूँ , लेकिन यकीन करो । मुझसे कोई ज्यादा देर तक नाराज नही रह सकता।
वो बोलता तुम ज्यादा समझदार समझती हो खुद को।
पता नही सपनो की किस दुनिया में रहती हो।

पूरी रात मै इस निश्चय मे निकालती की अब बस हुआ, यही वक़्त है बाहर निकल जाने का, लेकिन दुसरे दिन फिर वही नार्मल हो जाता।
उम्मीद कितनी भयावह होती है, मुझे तब नही पता था।
मै बहुत फ़िल्मी थी, हम आपके दिल में रहते हैं, फ्रेंड्स विद बेनिफिट्स, प्रपोजल, बहुत सारी मूवीज और सीरियल आते थे, जिनमे हमेशा बशर्त रिश्ते सुरु होते थे। लेकिन सबका अंत सुखद होता था।

कभी कभी मुझे ऐसा लगता था। जैसे मुझे कश्मीर जाना हो और ओरबिदो की केरल जाने वाली ट्रेन में सवार हूँ। जहाँ ओरबिंदो साथ भी था और मुझे याद दिलाता रहता था नीरु तुम किसी भी स्टेशन पे उतर सकती हो। कोई भी ट्रेन मिल जायेगी तुम्हे वापस कश्मीर जाने की। मेरा मन कह रहा होता था….’ओरबिंदो बहुत दूर आ गए हैं, क्या पता मुझे ट्रेन मिले न मिले मै स्टेशन पर ही छूट गयी तो।
क्या मै केरल नही जा सकती।’

और जैसे ओरबिंदो कह रहा हो की जा सकती हो लेकिन मेरे साथ नही।
ऐसा नहीं है मैंने ओरबिंदो के जाने के बाद जिंदगी में आगे बढ़ने की उम्मीद छोड़ दी थी। मैंने कोशिश की और लोगों को जिंदगी में शामिल करने की।

लेकिन कुछ दिन बाद जब पता चला ओरबिंदो ने लव मैरिज की किसी और जाति की लड़की से।
शायद कहीं न कहीं कुछ टूट गया था।
मुझे कोई ऐसा चाहिए था जो मुझ पर मेहनत करे , मुझे दोबारा से जोड़ दे। और उसके लिए वक़्त चाहिए था। वक़्त कहाँ है आजकल किसी के पास।

कुछ देर रुक कर माँ ने कहा।
“ रॉबी तुम मेरे बेटे नहीं, तुम गोद लिये हुए हो। ओरबिंदो जैसे लोग, जिन्हें सफ़र सुरु होने से पहले पता होता है की कहाँ उतरना है। 
वो पीछे कुछ छुट न जाये इसका ध्यान रखते हैं। इसलिये ओरबिंदो ऐसी गलती नहीं कर सकता था।
मै नही चाहती थी की तुम्हे ये सब पता चले।
तुम्हे गोद लेना इतना आसान नहीं था। बहुत क़ानूनी अड़चन आती है किसी अविवाहित महिला या पुरूष को बच्चों को गोद लेने में।
तुम मेरे लिये कुछ करना चाहते हो तो इन कानूनों को सरल करने की लड़ाई करो।
प्यार खो देने से ज्यादा भयानक अकेले हो जाने का दर्द होता है। ऐसे समय में कोई छोटी सी उम्मीद भी तिनके का सहारा होती है।
एक छोटे से मुस्कुराते हुए बच्चे को देखकर लोग गलत कदम उठाने से बच सकते हैं।
मै बस यही कहना चाहती हूँ। आगे तुम्हारी मर्जी।

लेकिन याद रखो नफरत से दूर रहो जितना हो सके।
मैंने कबका नफरत करना छोड़ दिया है। जिंदगी में बस प्यार मायने रखता है। अगर उसे मुझसे सच में प्यार था तो मै उसकी जिंदगी में एक खालीपन छोड़ आई हूँ, और अगर प्यार नहीं था तो……नही था। उसे स्वीकार करने मे ही भलाई है।”, माँ की कहानी सुन कर मै स्तब्ध था।
तभी रामू काका आये। बाबू साहब कोई आपसे मिलने आया है।
मैंने बाहर आके देखा । मिस्टर ओरबिंदो खड़े थे।
“मिस्टर रोबिन्द्रो!! मै आपसे आपके केस के बारे में बात करना चाहता हूं। उस केस में…..”
मैंने उनकी बात काट कर कहा।

“सर रोबिन्द्रो नहीं, रोबिन्द्रो नीरजा घोष !!

मै वो मुकदमा वापस ले रहा हूँ। आपके लिये एक बात और जाननी जरुरी है।
मै आपकी संतान नहीं हूँ। मुझे नीरजा माँ ने गोद लिया था।मुझे भी आज ही पता चला। मेरे नाम के पीछे कोई सरनेम नहीं था। हर समय मुझे सफाई देनी पड़ती थी। शायद ये भी एक वजह थी आप से नफरत करने की।

लेकिन वो सरनेम मेरे पास हमेशा से ही था। आप इत्मिनान से घर जा सकते हैं।”

मिस्टर ओरबिंदो बाहर की तरफ जाने लगे। अचानक दरवाजे पर रुक कर उन्होंने मुड के देखा।
“क्या मै नीरजा से मिल सकता हूँ?”, उन्होंने ने पूछा।

“नहीं!! आप जिस नीरजा को जानते थे वो 19 साल की बच्ची थी । आज की नीरजा घोष 45 साल की परिपक्व महिला है। आपकी क्या कहानी थी, आपकी क्या मजबूरियाँ थी। अब वो जानने की इच्छा ना मेरी है और ना माँ की।
हो सकता है आप जिंदगी में बहुत कामयाब हों और आपको जिन्दगी में बहुत बेहतर साथी मिला हो। लेकिन वो नीरजा घोष नहीं ।”, मै कहकर माँ के कमरे की तरफ चल दिया।

वो आदमी पता नहीं कब तक वहां खड़ा रहा।
पर उसे नही पता माँ को मै कब का कश्मीर ले आया हूँ।

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