A curious soul who believes that extraordinary can be found in everyday things which can and should be written about.
बहुत वक़्त गुज़रता है अब इन टार में घुली पीक की गंध लिए सड़कों पर रेंगता सा चलता है ये कारवाँ मोटरों का मेरे संग लगता है सबको तुझसे ही काम है, तेरी ओर ही जा रहे हैं दो तरफ़ा हैं ये तुड़ी-मुड़ी सड़कें पता नहीं कि जा रहे हैं या आ रहे हैं
मैं सोचता हूँ कौन से रंग का गुलाब लाऊँ तेरे लिए, आख़िर अपना रिश्ता क्या हैतू जो कह दे, वो बन जाऊँगा मैं इसीलिए आज फिर मोगरे के फूल ले आया हूँ
कुछ ही बरस हुए हैं उन सावनों को बीते जिनमें हम सन जाने को निकला करते थे जिन गड्ढों से शिकायतें हैं ज़माने भर को हम उन्हीं को दर-दर ढूँढा करते थे
ऐ इतवार तू ना जामैं तुझे संभाल कर अपने पास रखना चाहता हूँउस नए करारे दो सौ के नोट की तरहतुझे ख़र्च नहीं करना चाहता हूँफ़िर आएगा तू पता है मुझेऔर मैं फ़िर तुझे रोकूँगामुझे पता है, तू ना सुनेगा मेरीमैं फ़िर भी कोशिश करूँगा