Fight between Shoe and Cap and Me

पैर की जूती, सर की पगडी से हर दिन बहस करती 
कहती तुझे क्या पता कितना कष्ट है
तुझे क्या पता कितना भार है मुझ पर 
पगडी हमेशा प्रयास समझाने का करती 
पर इस टक्कर में मेर तबियत घुटती |

एक दिन इसी से आहात हो मैंने जूती को पगडी की जगह देने की ठानी 
निकल पड़ा मैं जुती को सर ले बाजार की तरफ 
जो देखता हँसता, कहता अजीब मुर्ख है, अजीब मुर्ख है 
रस्ते में मंदिर आया मैंने कहा चलो शंकर से मिल ले
लेकिन पुजारी को कहाँ पता की मेरे सर में जूती क्यूँ है 
उसने धक्का दे भगाया कहा तू शंकर की नहीं अक्ल की शरण में जा 
अब अक्ल का मंदिर मेरे देश में कहाँ मिलेगा, और सर पर जूती वाले की कौन सुनेगा ||

यही उदासी ले मैं आगे बढ़ा

फिर मैं लाला के घर पहुंचा कहा तुम्हारे व्यापार में मदद करूँगा 
वो समझा मैं उसे बर्बाद करूँगा 
झल्लाया वो मुझ पर ऐसे जैसे मांग लिए हो पैसे

अब तो सभी जूती वाले बाबू जी के नाम से पुकारते हैं 
और जूती से ही पहचान लगाते हैं 
मैंने भी पगडी को आराम दिया है और जूती को सर बाँध लिया है 
जूती की सलाह लेता हूँ और उसी का मान रखता हूँ