इंसान और फ़रिश्ता

कहते हैं ख़ुदा ने जब इंसान को पैदा करने और ज़मीन पर उसे अपना deputy/नायब बनाने का इरादा किया था तो फ़रिश्तों ने कहा था कि यह ज़मीन पर फ़साद फैलाएगा, लेकिन ख़ुदा ने न सिर्फ़ इंसान को बनाया बल्कि फ़रिश्तों से कहा कि इसे सज्दा करो। हालाँकि फ़रिश्ते बुराई से पाक थे, उन में गुनाह का जज़्बा रखा ही नहीं गया था, ख़ुदा के हुक्म को न मानने का वहाँ सवाल ही नहीं था क्यूँकि उनको उतनी ही अक़्ल दी गई जिसमें वो बस जो कहा जाए वो करें। और दूसरी तरफ़ इंसान, ग़लतियों का पुतला, अच्छाई है तो बुराई भी है, प्यार है तो नफ़रत भी है, यानी कई परस्पर विरोधी/मुतज़ाद चीज़ों का एक मुजस्समा। फिर भी इंसान को अफ़ज़ल/श्रेष्ठ माना, क्यूँ? क्यूँकि इंसान में तमन्नाएँ हैं, ख़िवाहिशें हैं, भूख है, हवस भी है, और उसके बावुजूद इन सब चीज़ों को बस में रख लेता है, साध लेता है। फ़रिश्तों के पास कुछ नहीं है, तो गुनाह न कर के कौनसा तीर मार लिया?
हम हमेशा किसी अच्छे इंसान को फ़रिश्ते से उपमा/ तश्बीह देते हैं जबकि फ़रिश्ते की क्या बिसात कि वो अच्छे और अज़ीम इंसान के पासंग भी हो पाए। हवस ही हमें इंसान बनाती है और फ़रिश्ते से हमें बुलन्द करती है।

मैंने यह सारी बात एक शेर में आज से पहले नहीं देखी थी, आज दिखा मनोज अज़हर का यह शेर

यह हवस ही है मुझे जिसने बचा रख्खा है
वरना इंसान से कब का मैं फ़रिश्ता हो जाऊँ

मैं अक्सर शेर की तशरीह/व्याख्या करने के हक़ में नहीं हूँ और यह भी बात है कि शेर की तशरीह पढ़ने वाले पर छोड़ देनी चाहिए, लेकिन क्यूँकि हमारे इस पेज का मक़सद उन लोगों तक शायरी का नशा और ख़ुमार पहुँचाना है जो इससे दूर हैं इसलिए हम कभी कभी मुफ़्त शराब भी बाँट देते हैं, जब लत लगेगी तो ख़ुद दौड़े आएँगे शराबी।

— अजमल सिद्दीक़ी (Ajmal Siddiqui)