रात
टूटी सड़कों पर पाँव लड़खड़ाते हैं,
खासकर तब
जब रात हो,
अनिश्चितताओं की बात हो।
जब माचिस की आखिरी तीली एलान करे
कि बहुत हो गया अब और नहीं,
हर राही अनजान कहे
कि बिखर जाना…पर और कहीं।
कलम थामे हुए हाथ कंपकपाते हैं
खासकर तब
जब मालूम हो
कि बाहर ठण्ड तो है ही नहीं।
जब हर निकलता अक्षर
कुछ चीखने को तैयार रहे,
और शब्दों में छुपा विराम कहे
कि ठिठुर जाना…पर और कभी।
रात अभी और गहरी होनी है
यह सोचकर तुम
दो-चार घूँट पानी पी लेना
और जब एहसास हो
कि प्यास मिटी नहीं
पर हलफ़ में प्यास अब बाक़ी भी नहीं
तब उसी रात में फिर लौट जाना।
हिचिकिचाना, मगर लौट जाना।
क्यूंकि रात में यह बात खास है
कि वह अपना लेगी तुम्हें
बिखर कर पहुँचो या ठिठुर कर,
लड़खड़ाकर पहुँचो या कंपकपाकर,
न सौदा होगा
न समझौता होगा
तुम्हारे पास एक और मौका होगा।
क्यूंकि तुम जटिल हो,
नामुमकिन नहीं
और यह रात रात है,
दिन नहीं।

