Jul 10, 2017 · 1 min read
मेरी रूह में है तू

मेरी रूह में है तू,
दरबदर, मैं इधर उधर,
फिर तूझे यूं क्यों ढुढूं ?
मेरा मन कहे, तू संग मेरे,
है हर पल, हर क्षण।
हर ज़र्रा ज़र्रा तेरे रंग में रंगे।
फिर क्यूं, इन बेजान मूर्तियों में,
कागज, अग्नि, शिलाओं में,
तेरे होने का ये आभास, ये अंधविश्वास,
हर शख्स में जगे।
आखिर क्यूं ?
अब तू ही बता, मेरे मालिक जरा,
क्या पाप हुए हैं, मुझसे भला?
जो तू यूं , मुझको ये दिन दिखलाता है।
हर क्षण को तू, मुझे मार मार,
एसे क्यूं तड़पाता है।
क्या नहीं मुझको ये हक ?
जिऊ जिंदगी अपनी खुशी खुशी,
बेख़ौफ़, होकर निडर।
मैं तो दीन हुं, दुखी हु,
तू तो दीनदयाल है,
क्या हुआ मेरे मौला ?
क्या मुझसे भी बुरा तेरा हाल है?
अब तू ही बता, तू ही कह,
मैं क्या करूं?
मैं क्या करूं?
मेरी रूह में है तू........।